भाजपा को 54 सीटें! सर्वे ने शायद टिकट वितरण समिति से भी पहले कर लिया काम—पत्रकारिता को सलाम!
प्रत्याशी घोषित नहीं, सीटों का हिसाब तैयार!
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव अभी दरवाजे पर दस्तक ही दे रहा है, प्रत्याशियों के नामों पर पार्टियों में मंथन भी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन एक मीडिया समूह ने चुनावी भविष्यवाणी का ऐसा पहाड़ खड़ा कर दिया है कि लगता है चुनाव आयोग को अब सिर्फ तारीख घोषित करने की औपचारिकता ही बाकी है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
सर्वे का दावा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को 54 सीटें और कांग्रेस को 14 सीटें मिल सकती हैं। बाकी दो सीटों का क्या होगा, यह शायद सर्वे की अगली किस्त में बताया जाएगा!
सबसे मजेदार सवाल यही है कि जब अधिकांश सीटों पर प्रत्याशी तक घोषित नहीं हुए, तब मतदाताओं ने आखिर किसे देखकर वोट देने का मन बना लिया? क्या मतदाताओं ने भविष्य की भाजपा और कांग्रेस की उम्मीदवार सूची पहले ही डाउनलोड कर ली है? या फिर सर्वे करने वालों के पास ऐसी कोई विशेष दूरबीन है, जिससे उन्हें 2027 का विधानसभा परिणाम आज ही दिखाई दे गया?
इसी बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को लेकर भी राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह साफ नजर नहीं आ रही है। कभी रुद्रपुर, कभी चंपावत और कभी खटीमा से चुनाव लड़ने की चर्चाएं सामने आती हैं। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री खुद किस सीट से मैदान में उतरेंगे, जब इस पर असमंजस बना हुआ है? यदि मुख्यमंत्री की सीट ही तय नहीं है और उनके पक्ष में आ रहे सर्वे भी उत्साहजनक नहीं बताए जा रहे, तो फिर पूरे चुनाव का गणित इतनी निश्चितता से कैसे तैयार कर लिया गया?
इसके बावजूद कुछ बाबूजी यह लिखने में जुटे हैं कि मुख्यमंत्री को जोड़ते हुए भाजपा को 24 सीटें मिलेंगी। अब यह 24 सीटों का आंकड़ा किस आधार पर निकाला गया है, यह भी किसी अगले सर्वे, अगले बयान या अगली राजनीतिक गणित की प्रतीक्षा कर रहा है। एक तरफ भाजपा के लिए 54 सीटों का दावा है, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री के नाम के साथ 24 सीटों का हिसाब—आखिर जनता किस आंकड़े पर भरोसा करे?
सर्वे में उम्र, सामाजिक वर्ग और विभिन्न मुद्दों के आधार पर समर्थन के आंकड़े भी पेश किए गए हैं। मुख्यमंत्री के फैसलों पर 88 प्रतिशत समर्थन, देवभूमि की पहचान के सवाल पर 70 प्रतिशत समर्थन और अलग-अलग सामाजिक वर्गों में समर्थन का प्रतिशत भी बड़ी सफाई से सामने आ गया।
अब सवाल यह है कि क्या चुनाव सिर्फ मुख्यमंत्री के नाम पर लड़ा जाएगा? विधानसभा चुनाव में स्थानीय प्रत्याशी, क्षेत्रीय समस्याएं, विधायक का प्रदर्शन, बेरोजगारी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, पलायन और स्थानीय समीकरण भी कोई चीज होते हैं या नहीं?लगता है कि इस बार मतदाता मतदान केंद्र पर जाने से पहले ही मीडिया के सर्वे को देखकर अपना वोट तय कर चुके हैं। ईवीएम भी शायद सोच रही होगी—“भाई, मुझे बुलाया क्यों जा रहा है?”
लगता है कि इस बार मतदाता मतदान केंद्र पर जाने से पहले ही मीडिया के सर्वे को देखकर अपना वोट तय कर चुके हैं। ईवीएम भी शायद सोच रही होगी—“भाई, मुझे बुलाया क्यों जा रहा है?”
और सबसे बड़ा सवाल—
जब मुख्यमंत्री की सीट ही तय नहीं हुई, प्रत्याशी घोषित नहीं हुए और सर्वे उनके पक्ष में भी नहीं आ रहा, तो 54 या 24 सीटें किसके नाम लिख दी गईं?
कल को अगर सर्वे गलत निकला तो शायद नई हेडलाइन होगी—
“जनता ने सर्वे को ही गलत साबित कर दिया!”
