संपादकीय,उत्तराखंड की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, मगर चुनावी जमीन तैयार होने लगी है। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है और विपक्ष सरकार को घेरने के लिए मुद्दों की तलाश में है। इसी बीच हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण यज्ञ’ ने राजनीति को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां सवाल केवल भाजपा और कांग्रेस का नहीं रह गया है।
—आस्था के मंच पर राजनीति बेनकाब हुई।”
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
सवाल अब हिंदू आस्था, सनातन परंपरा, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक ध्रुवीकरण का बन गया है।
8 अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा हुई। इसके बाद 10 अगस्त को एक हिंदू संगठन की ओर से वहां शुद्धिकरण यज्ञ और गंगाजल छिड़काव किया गया। आयोजकों ने इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा आयोजन बताया। कांग्रेस ने इसे जातिगत भेदभाव और दलित विरोधी मानसिकता से जोड़ा। इस विवाद ने राजनीतिक रंग ले लिया और कांग्रेस की ओर से कार्रवाई की मांग उठी। भाजपा ने इस आयोजन से अपना संबंध होने से इनकार किया है।
यहीं से वह सवाल जन्म लेता है, जिसे उत्तराखंड की जनता के सामने गंभीरता से रखा जाना चाहिए—
क्या यह हिंदू धर्म की परंपरा थी, या राजनीतिक संदेश देने का प्रयास?
और अगर यह धार्मिक परंपरा थी तो कांग्रेस को इससे आपत्ति क्यों?
दूसरी ओर, अगर इसे राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया तो भाजपा को यह स्पष्ट करना होगा कि हिंदुत्व की राजनीति के नाम पर धार्मिक भावनाओं को चुनावी ध्रुवीकरण का माध्यम बनाने की अनुमति किस सीमा तक दी जा सकती है।
हवन को राजनीति की अदालत में क्यों खड़ा किया जा रहा है?
उत्तराखंड में हवन कोई नई चीज नहीं है।
देवभूमि के गांवों से लेकर शहरों तक जब नया घर बनता है तो गृह प्रवेश से पहले पूजा होती है। नया प्रतिष्ठान शुरू होता है तो गणेश पूजन और हवन होता है। नई दुकान खुलती है तो पूजा-अर्चना की जाती है। विवाह संस्कार में अग्नि को साक्षी माना जाता है। भागवत कथा होती है तो हवन होता है। श्रीमद्भागवत कथा, रामकथा, देवी भागवत, यज्ञ, मंदिर उत्सव और धार्मिक आयोजनों में अग्निहोत्र की परंपरा आज भी कायम है।
किसी नए भवन में प्रवेश से पहले शांति और मंगल के लिए हवन होता है।
किसी नए व्यवसाय की शुरुआत में पूजा होती है।
किसी धार्मिक आयोजन के बाद कई स्थानों पर शुद्धिकरण की स्थानीय परंपराएं निभाई जाती हैं।
ऐसे में यह कहना कि हवन या शुद्धिकरण की प्रक्रिया अपने आप में जातिवादी या छुआछूत की मानसिकता है, हिंदू धार्मिक परंपराओं की व्यापकता को एक ही घटना के आधार पर परिभाषित करना होगा।
लेकिन दूसरी तरफ एक महत्वपूर्ण सीमा भी है।
अगर किसी व्यक्ति की जाति के आधार पर उसे अशुद्ध मानकर कोई धार्मिक प्रक्रिया की गई हो, तो वह गंभीर सामाजिक और कानूनी विषय है।
यानी सवाल हवन का कम और उसके उद्देश्य का अधिक है।
यही अंतर राजनीतिक दलों को समझना होगा।
कांग्रेस से सीधा सवाल—क्या सनातन परंपराओं को राजनीति के चश्मे से देखा जाएगा?
कांग्रेस लगातार सामाजिक न्याय, संविधान और समानता की बात करती है। यह उसका राजनीतिक अधिकार है।
लेकिन उत्तराखंड में कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि यहां का समाज धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यह वही उत्तराखंड है जहां घर-घर में देवताओं की पूजा होती है। जहां कुलदेवता और ग्रामदेवता की परंपरा आज भी जीवित है। जहां जागर की संस्कृति है। जहां नंदा देवी की आराधना होती है। जहां चारधाम हैं। जहां हर गांव की अपनी धार्मिक आस्था और परंपरा है।
ऐसे समाज में अगर कांग्रेस किसी धार्मिक अनुष्ठान को सीधे जातिवाद या छुआछूत के राजनीतिक फ्रेम में रखती है तो उसे जनता के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी आपत्ति हवन से है या कथित जातिगत मंशा से?
यह अंतर जितनी जल्दी कांग्रेस स्पष्ट करेगी, उतनी ही स्वस्थ राजनीतिक बहस संभव होगी।
कांग्रेस को यह भी बताना होगा कि क्या वह उत्तराखंड की परंपरागत पूजा-पद्धति को सम्मान देती है।
अगर जवाब हां है तो उसे स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिए—
पूजा हमारी आस्था है, हवन हमारी परंपरा है, राम हमारी सांस्कृतिक चेतना हैं और संविधान हमारा लोकतांत्रिक आधार है।
इनमें टकराव पैदा करने की आवश्यकता किसे है?
भाजपा से भी सवाल—हिंदुत्व का चेहरा केवल चुनाव तक सीमित तो नहीं?
भाजपा स्वयं को हिंदुत्व और सनातन संस्कृति की राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करती है।
राम मंदिर से लेकर सनातन संस्कृति तक भाजपा ने देश की राजनीति में धार्मिक मुद्दों को प्रमुखता दी है।
उत्तराखंड में भी भाजपा के लिए हिंदुत्व एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार रहा है।
लेकिन हिंदुत्व का अर्थ क्या है?
क्या हिंदुत्व केवल चुनावी मंच पर भगवान राम का नाम लेने का नाम है?
क्या हिंदुत्व केवल धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक समर्थन में बदलने का माध्यम है?
या हिंदुत्व का अर्थ समाज में धर्म, संस्कृति, परंपरा, समानता और मानव गरिमा का संरक्षण भी है?
यदि कोई संगठन धार्मिक कार्यक्रम करता है और भाजपा उसका हिस्सा नहीं है, तो भाजपा को स्पष्ट दूरी बनानी चाहिए।
अगर किसी धार्मिक आयोजन में जातिगत भेदभाव का तत्व प्रमाणित होता है, तो भाजपा को खुलकर उसका विरोध करना चाहिए।
क्योंकि हिंदुत्व की ताकत समाज को जोड़ने में है, समाज को बांटने में नहीं।
राहुल गांधी के खिलाफ मामला—राजनीतिक लड़ाई अब थाने तक
हल्द्वानी विवाद ने कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर दिया है। राहुल गांधी के खिलाफ भी इस विवाद से जुड़े बयान को लेकर मामला दर्ज होने की खबर सामने आई है।
अब सवाल यह है कि क्या धार्मिक विवादों का समाधान राजनीतिक बयानबाजी से होगा या कानून और जांच के माध्यम से?
यदि किसी नेता के बयान में कानून का उल्लंघन हुआ है तो जांच हो।
यदि किसी संगठन ने किसी व्यक्ति का जातिगत अपमान किया है तो जांच हो।
यदि किसी धार्मिक आयोजन को गलत राजनीतिक रंग दिया गया है तो उसके तथ्य सामने आएं।
लेकिन सड़क से लेकर सोशल मीडिया और फिर थाने तक पहुंचती राजनीतिक लड़ाई उत्तराखंड के सामाजिक ताने-बाने के लिए शुभ संकेत नहीं है।
रुद्रपुर में भी बढ़ा विवाद—रामलीला कमेटी पर कार्रवाई की मांग
हल्द्वानी के बाद रुद्रपुर में भी विवाद का असर दिखाई दिया। पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल और कांग्रेस नेताओं की ओर से रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पुलिस से संपर्क और थाने का घेराव किया गया।
यह घटनाक्रम बताता है कि धार्मिक आयोजन और राजनीतिक विवाद अब एक-दूसरे से तेजी से जुड़ते जा रहे हैं।
रुद्रपुर और हल्द्वानी दोनों कुमाऊं की राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जमीन हैं।
ऐसे में 2027 से पहले धार्मिक विवादों का विस्तार चुनावी राजनीति के लिए संकेत माना जा सकता है।
लेकिन यहां प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
प्रशासन को हर शिकायत की निष्पक्ष जांच करनी होगी।
किसी राजनीतिक दल के दबाव में कार्रवाई का संदेश भी नहीं जाना चाहिए और किसी धार्मिक संगठन को कानून से ऊपर होने का संदेश भी नहीं जाना चाहिए।
क्या उत्तराखंड में ‘केरल मॉडल’ जैसी वैचारिक राजनीति का खतरा है?
उत्तराखंड की राजनीति का स्वभाव अलग रहा है।
यहां राज्य आंदोलन की अपनी विरासत है। यहां पहाड़ और मैदान के सवाल हैं। पलायन है। रोजगार है। शिक्षा और स्वास्थ्य है। पर्यटन है। वन और जमीन के सवाल हैं।
इसके बीच यदि राजनीति धीरे-धीरे धार्मिक और वैचारिक टकराव की ओर बढ़ती है तो उत्तराखंड का मूल एजेंडा पीछे जा सकता है।
केरल का उदाहरण अक्सर वैचारिक राजनीति, संगठित राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक ध्रुवीकरण के संदर्भ में दिया जाता है।
उत्तराखंड को ऐसी राजनीति से सावधान रहना होगा।
देवभूमि को विकास की राजनीति चाहिए।
युवाओं को रोजगार चाहिए।
पलायन रोकने की नीति चाहिए।
पहाड़ों में अस्पताल चाहिए।
स्कूल चाहिए।
किसानों को बाजार चाहिए।
शहरों में यातायात और जल निकासी चाहिए।
व्यापारियों को सुरक्षित वातावरण चाहिए।
और धार्मिक पर्यटन को बेहतर आधारभूत ढांचा चाहिए।
इन सवालों के बीच यदि चुनाव का केंद्र केवल यह बन गया कि कौन ज्यादा हिंदू है और कौन कम हिंदू, तो जनता के वास्तविक सवाल पीछे छूट जाएंगे।
लेकिन हिंदू आस्था को भी कटघरे में खड़ा करना स्वीकार्य नहीं
यहां एक और बात उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए।
हिंदू धर्म की पूजा-पद्धतियों पर राजनीतिक सुविधा के अनुसार प्रश्नचिह्न लगाना भी उचित नहीं है।
हवन को समझे बिना उसे छुआछूत कहना गलत है।
पूजा को समझे बिना उसे रूढ़िवाद कहना गलत है।
शुद्धिकरण की हर परंपरा को जातिगत भेदभाव कहना भी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं।
सनातन परंपरा हजारों वर्षों से अनेक रूपों में विकसित हुई है।
यहां वैदिक यज्ञ भी है और भक्ति भी।
यहां मंदिर पूजा भी है और ध्यान भी।
यहां कथा भी है और लोकदेवताओं की परंपरा भी।
उत्तराखंड में जागर भी है और गंगा आरती भी।
इसी विविधता ने हिंदू संस्कृति को जीवित रखा है।
इसलिए किसी एक विवाद के आधार पर पूरी धार्मिक परंपरा को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।
हिंदू समाज सब देख रहा है
2027 का मतदाता आज से राजनीतिक घटनाओं को देख रहा है।
वह देख रहा है कि कौन धर्म का सम्मान करता है।
वह देख रहा है कि कौन धर्म को चुनावी हथियार बनाता है।
वह यह भी देख रहा है कि कौन हिंदू आस्था पर सवाल उठाता है।
और वह यह भी देख रहा है कि कौन हिंदुत्व के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश करता है।
उत्तराखंड का हिंदू समाज भावनात्मक जरूर है, मगर राजनीतिक रूप से भोला नहीं।
वह मंदिर जाता है तो मतदान केंद्र भी जाता है।
वह रामलीला देखता है तो सरकार का काम भी देखता है।
वह हवन करता है तो सड़क और रोजगार का हिसाब भी मांगता है।
यही कारण है कि 2027 का चुनाव केवल धार्मिक भावनाओं पर तय होगा, ऐसा मान लेना किसी भी दल के लिए जोखिमपूर्ण होगा।
मिशन-2027: धर्म बनाम धर्म नहीं, राजनीति बनाम राजनीति
आने वाला चुनाव उत्तराखंड की राजनीतिक दिशा तय करेगा।
भाजपा के पास हिंदुत्व और विकास का एजेंडा होगा।
कांग्रेस सामाजिक न्याय, संविधान और सत्ता विरोधी माहौल को मुद्दा बनाने का प्रयास करेगी।
क्षेत्रीय दल राज्य की अस्मिता, रोजगार और मूल निवास जैसे प्रश्न उठाएंगे।
ऐसे में हल्द्वानी का विवाद एक संकेत है कि आने वाले महीनों में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दे राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं।
लेकिन दोनों राष्ट्रीय दलों को यह समझना होगा कि उत्तराखंड को धर्मयुद्ध नहीं, विकास युद्ध चाहिए।
अंतिम सवाल—राम किसके हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है।
राम केवल भाजपा के नहीं।
राम केवल कांग्रेस के भी नहीं।
राम उत्तराखंड के करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हैं।
रामलीला मैदान किसी एक राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं।
हवन किसी पार्टी का कार्यक्रम नहीं।
मंदिर किसी राजनीतिक दल का कार्यालय नहीं।
सनातन किसी चुनावी घोषणा-पत्र का विषय भर नहीं।
आस्था व्यक्ति की आत्मा से जुड़ी होती है।
इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस यदि हिंदू धार्मिक परंपराओं को सम्मान देती है तो उसे स्पष्टता के साथ सामने आना होगा।
भाजपा यदि हिंदुत्व की राजनीति करती है तो उसे भी यह सुनिश्चित करना होगा कि हिंदुत्व के नाम पर किसी नागरिक का अपमान या सामाजिक विभाजन राजनीति का माध्यम न बने।
और प्रशासन को दोनों से समान दूरी रखकर कानून के अनुसार काम करना होगा।
उत्तराखंड का संदेश साफ है—
हवन होगा तो आस्था के साथ होगा।
पूजा होगी तो श्रद्धा के साथ होगी।
रामलीला होगी तो मर्यादा के साथ होगी।
राजनीति होगी तो मुद्दों के साथ होगी।
धर्म को सम्मान चाहिए, राजनीतिक संरक्षण नहीं।
सनातन को सम्मान चाहिए, चुनावी ठेकेदारी नहीं।
और उत्तराखंड को ऐसी राजनीति चाहिए जो उसकी संस्कृति, आध्यात्मिक स्वाभिमान और सामाजिक सद्भाव—तीनों की रक्षा करे।
मिशन-2027 की असली परीक्षा यही है कि राजनीतिक दल उत्तराखंड की आस्था को वोट बैंक समझते हैं या उसकी आत्मा।
क्योंकि देवभूमि का मतदाता सब देख रहा है।
और जब वह मतदान केंद्र तक पहुंचेगा, पांच साल की राजनीति, आस्था के प्रति रवैया, सामाजिक व्यवहार और विकास का पूरा हिसाब लेकर जाएगा।
