नंदलाल की भट्ठी पर चला बुलडोजर, उठे ब्राह्मणवाद और सामाजिक न्याय के सवाल45 साल पुरानी लोहार की दुकान उजड़ी, भाजपा के पदाधिकारी नंदलाल के परिवार की रोजी-रोटी संकट में; रुद्रपुर में दलित और देसी समाज के बीच बढ़ती बेचैनी पर हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की नजर

Spread the love



रुद्रपुर। रुद्रपुर में सड़क चौड़ीकरण और विकास परियोजनाओं के नाम पर हुई बुलडोजर कार्रवाई ने एक बार फिर सामाजिक न्याय, गरीबों के पुनर्वास और जातिगत असमानता के सवाल खड़े कर दिए हैं। रोडवेज के पीछे प्रस्तावित आईएसबीटी परियोजना के आसपास हुई कार्रवाई से प्रभावित परिवारों में बड़ी संख्या दलित और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की बताई जा रही है। इन्हीं प्रभावित परिवारों में नंदलाल का परिवार भी शामिल है, जिसकी करीब 45 वर्षों पुरानी लोहार की दुकान बुलडोजर कार्रवाई की भेंट चढ़ गई।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


नंदलाल और उसके भाई की दुकान रुद्रपुर के आम लोगों के लिए वर्षों से उपयोगी रही। किसान की दरांती, फावड़ा, चाकू या लोहे का कोई औजार हो, किसी ट्रक अथवा मशीन का जाम पुर्जा गर्म करके खोलना हो या हथौड़े की चोट से लोहे को सही आकार देना हो, इस परिवार की तपती भट्ठी लोगों के काम आती रही। इसी छोटी दुकान से नंदलाल अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। परिवार में बेटियों की संख्या अधिक है और कई बच्चे अभी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। रोज की कमाई से आटा, चावल, सब्जी, चायपत्ती और घर की दूसरी आवश्यकताएं पूरी होती थीं।
सबसे मार्मिक स्थिति उस समय सामने आई जब दुकान पर बुलडोजर चलने के दौरान नंदलाल ने अपनी रोजी बचाने की गुहार लगाई। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में वह भावुक अवस्था में सहायता मांगता दिखाई दिया। कैमरे चलते रहे, वीडियो वायरल हुआ और चर्चा भी हुई, मगर एक परिवार की रोजी-रोटी का सवाल अपनी जगह खड़ा रहा।
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नंदलाल लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा बताया जाता है। वह पार्टी के ओबीसी मोर्चे में पदाधिकारी के रूप में कार्य करता रहा है और अपने क्षेत्र में भाजपा के लिए लगातार सक्रिय रहा। जिस व्यक्ति ने वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाया, चुनावों में संगठन के लिए काम किया और अपने मोहल्ले में पार्टी के प्रत्याशी के पक्ष में लोगों को जोड़ने का प्रयास किया, आज वही व्यक्ति अपनी रोजी-रोटी के लिए सड़क पर खड़ा दिखाई दिया।
रुद्रपुर के महापौर विकास शर्मा ब्राह्मण समाज से आते हैं। इस तथ्य को किसी व्यक्ति की नीयत का प्रमाण मानना उचित नहीं है, मगर जब एक दलित परिवार की आजीविका बुलडोजर कार्रवाई से उजड़ती है और नगर सत्ता की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति की भूमिका पर सवाल उठते हैं तो सामाजिक न्याय का मुद्दा स्वाभाविक रूप से सामने आता है। सवाल जाति से अधिक सत्ता के व्यवहार का है। क्या विकास की कीमत हमेशा गरीब और कमजोर परिवार ही चुकाएंगे? क्या किसी दुकान को हटाने से पहले उसके पुनर्वास और वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की गई? क्या प्रभावित परिवारों को पर्याप्त अवसर दिया गया?
आईएसबीटी परियोजना को लेकर भी जनता के बीच कई सवाल हैं। यह निर्माण लंबे समय से चर्चा में है और इसकी गति को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। आसपास की जमीन और दुकानों पर पहले भी कार्रवाई की घटनाएं सामने आती रही हैं। स्थानीय लोग परियोजना की अनुमानित लागत, कार्यदायी संस्था, निर्माण की समयसीमा, स्वीकृत नक्शे और परियोजना में प्रस्तावित सुविधाओं की सार्वजनिक जानकारी चाहते हैं।
पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि पूर्ववर्ती सरकारों के समय बड़े निर्माण कार्यों के स्थान पर सूचना पट लगाए जाते थे, जिनमें परियोजना की लागत, कार्य शुरू होने की तारीख, पूर्ण होने की संभावित अवधि और कार्यदायी संस्था जैसी जानकारी दी जाती थी। आईएसबीटी परियोजना को लेकर ऐसी सार्वजनिक और स्पष्ट जानकारी की मांग अब स्थानीय स्तर पर उठ रही है।
परियोजना को लेकर राजनीतिक और कारोबारी प्रभाव से संबंधित कई चर्चाएं भी क्षेत्र में चल रही हैं। कुछ लोग निर्माण को लेकर गंभीर आरोप लगाते हैं और प्रभावशाली लोगों की कथित भूमिका की बात करते हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। सरकार और प्रशासन के पास इन सवालों का सबसे बेहतर जवाब परियोजना की पूरी डीपीआर, टेंडर प्रक्रिया, भूमि की स्थिति, लागत, कार्यदायी संस्था और अब तक हुए खर्च का विवरण सार्वजनिक करके देने का अवसर है।
नंदलाल का मामला केवल एक दुकान टूटने का मामला भी नहीं है। यह उस बड़े सामाजिक प्रश्न को सामने लाता है कि आजादी के दशकों बाद भी दलित और गरीब परिवार आर्थिक सुरक्षा के लिए कितने असुरक्षित हैं। आरक्षण की आवश्यकता इसी ऐतिहासिक सामाजिक और आर्थिक असमानता के संदर्भ में समझी जानी चाहिए। शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अवसरों की बराबरी के लिए संवैधानिक संरक्षण आज भी महत्वपूर्ण है।
हिंदुत्व और हिंदू धर्म को ब्राह्मणवाद के समान मानना उचित नहीं है। भारत की संत परंपरा ने जन्म आधारित ऊंच-नीच को कई बार चुनौती दी है। सवाल उस सामाजिक मानसिकता का है जो किसी मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊंचा या नीचा समझती है। यदि गरीब दलित और पिछड़े समाज को केवल चुनाव के समय वोटर और बाकी समय राजनीतिक भीड़ का हिस्सा समझा जाएगा तो सामाजिक न्याय की बात अधूरी रहेगी।
रुद्रपुर में दलित और देसी समाज के बीच भी अब अपने अधिकारों को लेकर राजनीतिक चेतना बढ़ने की जरूरत महसूस की जा रही है। इस शहर के निर्माण में छोटे कारीगरों, मजदूरों, किसानों और दुकानदारों का बड़ा योगदान रहा है। रामपुरा जैसे पुराने क्षेत्रों से लेकर आज के विकसित रुद्रपुर तक हजारों परिवारों ने अपनी मेहनत से शहर को आकार दिया है। विकास की किसी भी परियोजना में इन परिवारों की आजीविका और सम्मान की सुरक्षा भी विकास का हिस्सा होनी चाहिए।
नंदलाल की भट्ठी में वर्षों तक आग जलती रही। उसी आग से लोहे को आकार मिलता रहा और परिवार का भविष्य चलता रहा। बुलडोजर ने दुकान की दीवारें गिरा दीं, मगर अब सवाल यह है कि उस परिवार के भविष्य को कौन आकार देगा?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स इस पूरे विषय को सामाजिक न्याय, दलित अधिकार, आरक्षण, गरीबों के पुनर्वास और कथित ब्राह्मणवादी मानसिकता के व्यापक संदर्भ में उठाएगा। आने वाले समय में “ब्राह्मणवाद और सामाजिक न्याय” विषय पर कम से कम 50 एपिसोड की श्रृंखला के माध्यम से ऐसे सवाल जनता और सत्ता के सामने रखे जाएंगे।
नंदलाल की लड़ाई सिर्फ एक दुकान की लड़ाई नहीं है। यह उस व्यवस्था से सवाल है जिसमें विकास की सड़क बनाते समय सबसे पहले गरीब की रोजी का रास्ता बंद हो जाता है।


Spread the love