

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के बाजपुर में आवारा कुत्तों का आतंक चरम पर पहुंच चुका है। बीते 24 घंटों में 60 से अधिक लोग कुत्तों के हमले का शिकार हुए हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक पर कुत्तों के झुंड ने हमला किया, जिससे पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। सवाल यह है कि इंसानों की जिंदगी की सुरक्षा ज्यादा अहम है या फिर तथाकथित कुत्ता प्रेम?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर (उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी)
रैबीज वैक्सीन की भारी मांग, अस्पताल में अफरा-तफरी?उपजिला चिकित्सालय बाजपुर में स्थिति अभूतपूर्व हो गई है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. पी.डी. गुप्ता बताते हैं कि सामान्य दिनों में कुछ मामले आते हैं, लेकिन एक ही दिन में 58 लोगों को रैबीज इंजेक्शन देना स्वास्थ्य विभाग के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया। अस्पताल में रैबीज वैक्सीन की भारी मांग है और स्वास्थ्यकर्मी पूरी ताकत से जुटे हैं। सोचने वाली बात है कि यह सिर्फ शुरुआत है, अगर कुत्तों के झुंड का आतंक यूं ही जारी रहा तो क्या होगा?
प्रशासन हरकत में, लेकिन स्थायी समाधान जरूरी?SDM अमृता शर्मा ने मामले को गंभीर बताते हुए जांच के आदेश दिए हैं। प्रशासन अब आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाने की बात कर रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी घटना होने का इंतजार क्यों किया गया? जनता महीनों से शिकायत कर रही थी कि मोहल्लों में कुत्ते झुंड बनाकर घूमते हैं, बच्चों को स्कूल जाते समय डर लगता है, बुजुर्ग सैर पर भी नहीं जा पाते।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और पशु प्रेमियों का विरोध?यह घटना ऐसे समय में हुई है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को शेल्टर होम भेजने का आदेश दिया। पशु-प्रेमियों ने इसका जोरदार विरोध किया और मानव अधिकारों से ज्यादा कुत्ता अधिकारों की दुहाई दी। लेकिन बाजपुर की घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इंसानों की जान सस्ती हो गई है? क्या एक ही दिन में 60 लोगों को कुत्तों द्वारा काटे जाने के बाद भी हमें सिर्फ पशु-प्रेम का पाठ पढ़ाया जाएगा?
स्थानीय लोग डरे, रात को बाहर निकलना मुश्किल?बाजपुर के मोहल्ला पहाड़ी कॉलोनी और आसपास के इलाकों में लोग अब घरों से बाहर निकलने से कतराने लगे हैं। रात में कुत्तों के झुंड सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं। लोग बताते हैं कि भौंकने और गुर्राने की आवाज से रात में चैन की नींद तक मयस्सर नहीं होती। पांच दिनों में सात लोगों को काटने वाला एक कुत्ता आज भी खुलेआम घूम रहा है।
कटाक्ष: इंसान या कुत्ता – किसकी रक्षा होगी?यह दुखद विडंबना है कि जहां एक ओर अस्पतालों में रैबीज वैक्सीन के लिए लाइन लगी है, वहीं दूसरी ओर कुछ कथित पशु-प्रेमी सोशल मीडिया पर ‘डॉग्स आर फ्रेंड्स’ का नारा लगाकर इंसानी पीड़ा का मजाक बना रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो जल्द ही हालात ऐसे होंगे कि अस्पतालों में इंसानों से ज्यादा कुत्ता-प्रेम का इलाज करना पड़ेगा।
बाजपुर की यह घटना सिर्फ एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुकी है। यह सवाल हर शहर और कस्बे से पूछा जाना चाहिए – “क्या इंसानों के जीने का हक आवारा कुत्तों के अधिकारों से कमतर है?” प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी होगी, शेल्टर होम की व्यवस्था करनी होगी और रैबीज वैक्सीन का पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करना होगा। वरना ‘डॉग लवर्स’ के खोखले नारे और ‘बाजपुर की जमीनी हकीकत’ के बीच इंसान की जान ही सबसे सस्ती साबित होगी।
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