चमोली। उत्तराखंड की हिमालयी धरती पर शनिवार, 5 सितंबर 2026 को आस्था, परंपरा और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा कैलाश की ओर रवाना हो गई। मां नंदा की डोली के प्रस्थान के साथ ही पूरा क्षेत्र “जय मां नंदा” के जयघोष से गूंज उठा। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक धार्मिक यात्रा के साक्षी बने।
मां नंदा की डोली को विदा करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु कुरुड़ पहुंचे थे। डोली के दर्शन और मां का आशीर्वाद लेने के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। जैसे ही डोली ने सिद्धपीठ से कैलाश की दिशा में प्रस्थान किया, वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। विदाई के इस भावुक क्षण में कई श्रद्धालुओं की आंखें नम दिखाई दीं। लोगों ने हाथ जोड़कर मां नंदा से यात्रा के निर्विघ्न, सुरक्षित और मंगलमय होने की प्रार्थना की।
मां नंदा की बड़ी जात केवल एक धार्मिक पदयात्रा भर नहीं है। यह उत्तराखंड की लोक आस्था, पहाड़ी संस्कृति, पारंपरिक देवी-देवता व्यवस्था और हिमालय से जुड़े जनजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति मानी जाती है। इस यात्रा में श्रद्धालु कठिन हिमालयी रास्तों पर मां की डोली के साथ कदम मिलाते हुए कैलाश की ओर बढ़ते हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
पांच दिन तक चले धार्मिक अनुष्ठान के बाद विदाई
सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिवसीय विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया। इन दिनों कुरुड़ में धार्मिक वातावरण बना रहा। विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना में हिस्सा लिया और मां नंदा के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
परंपरा के अनुसार मां नंदा को उत्तराखंड की बेटी के रूप में देखा जाता है। लोकमान्यता में मां नंदा का मायके से कैलाश स्थित ससुराल की ओर प्रस्थान एक भावनात्मक धार्मिक यात्रा के रूप में देखा जाता है। इसी कारण मां की विदाई का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए भावुक क्षण बन जाता है।
करीब 280 किलोमीटर की कठिन हिमालयी यात्रा
कुरुड़ से शुरू हुई बड़ी जात यात्रा लगभग 280 किलोमीटर की कठिन हिमालयी पदयात्रा है। यह यात्रा ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों, दुर्गम पगडंडियों, बुग्यालों और हिमालयी पड़ावों से होकर आगे बढ़ेगी।
सामान्य नंदा लोकजात यात्रा में मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए वेदनी बुग्याल तक पहुंचती है। बड़ी जात का स्वरूप इससे विस्तृत है और इस यात्रा में डोली को आगे होमकुंड तक ले जाने की परंपरा बताई जाती है।
होमकुंड में मुख्य धार्मिक अनुष्ठान प्रस्तावित है। यहां पूजा-अर्चना और धार्मिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद बड़ी जात यात्रा का समापन होगा।
यात्रा का हिमालयी चरण श्रद्धालुओं के लिए शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऊंचाई बढ़ने के साथ मौसम तेजी से बदलता है। रास्तों में कठिन चढ़ाई, ठंड, बारिश, बर्फबारी और दुर्गम भूभाग यात्रियों की परीक्षा लेते हैं। इसके बावजूद मां नंदा के प्रति आस्था श्रद्धालुओं को इस कठिन यात्रा के लिए प्रेरित करती है।
गांव-गांव होगा मां नंदा की डोली का स्वागत
कुरुड़ से रवाना होने के बाद मां नंदा की डोली निर्धारित पड़ावों से होते हुए हिमालय की ओर बढ़ेगी। यात्रा के मार्ग में आने वाले गांवों में श्रद्धालु पारंपरिक तरीके से डोली का स्वागत करेंगे।
कहीं पूजा-अर्चना होगी, कहीं ढोल-नगाड़ों के साथ मां का अभिनंदन किया जाएगा और कहीं ग्रामीण सामूहिक रूप से मां की डोली के दर्शन कर आशीर्वाद लेंगे। इस दौरान स्थानीय लोक संस्कृति और परंपराओं की झलक भी दिखाई देगी।
यह रहेगा यात्रा का प्रमुख मार्ग
5 सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से तीनों डोलियां कैलाश के लिए रवाना हुईं। इसके बाद यात्रा विभिन्न हिमालयी पड़ावों से गुजरते हुए आगे बढ़ेगी।
12 सितंबर को यात्रा रामणी पहुंचेगी। यहां विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मिलन होगा। यह धार्मिक दृष्टि से यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
रामणी के बाद यात्रा आला, सितेल और कनोंल होते हुए आगे बढ़ेगी। 15 सितंबर को मां नंदा की डोली वाण स्थित प्रसिद्ध लाटू मंदिर पहुंचेगी, जहां प्रवास प्रस्तावित है।
वाण से यात्रा गैरोली पाताल की ओर बढ़ेगी। इसके बाद मां नंदा की डोली हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों की ओर प्रस्थान करेगी।
18 सितंबर को मां नंदा की उत्सव डोली वेदनी बुग्याल पहुंचेगी। यहां सप्तमी की विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी।
19 सितंबर को यात्रा बगुवावासा, पातरनचैणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली होते हुए शिलासमुद्र पहुंचेगी। यह यात्रा का अत्यंत दुर्गम और महत्वपूर्ण हिमालयी चरण होगा।
इसके बाद यात्रा होमकुंड की ओर बढ़ेगी। 30 सितंबर को होमकुंड में मुख्य धार्मिक अनुष्ठान प्रस्तावित है। पूजा-अर्चना और धार्मिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद बड़ी जात यात्रा के समापन की प्रक्रिया पूरी होगी।
12 साल बाद बड़ी जात को लेकर उत्साह
मां नंदा की बड़ी जात को लेकर चमोली सहित पूरे उत्तराखंड में विशेष उत्साह है। लंबे अंतराल के बाद आयोजित हो रही इस यात्रा में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी है।
पर्वतीय समाज के लिए मां नंदा केवल एक देवी का स्वरूप नहीं, लोकजीवन और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मां नंदा की डोली के साथ चलना श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक कर्तव्य और भावनात्मक अनुभव दोनों माना जाता है।
यात्रा के दौरान स्थानीय गांवों में पारंपरिक आतिथ्य, लोकगीत, ढोल-दमाऊं और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा दिखाई देगी। इससे उत्तराखंड की लोक संस्कृति को भी व्यापक स्तर पर पहचान मिलेगी।
आखिर राजजात के बजाय बड़ी जात क्यों?
वर्ष 2026 में मां नंदा की यात्रा को लेकर सबसे महत्वपूर्ण विषय यात्रा के स्वरूप और आयोजन को लेकर सामने आया मतभेद है।
नौटी की श्री नंदा देवी राजजात समिति द्वारा 2026 में मुख्य राजजात की तैयारियां की जा रही थीं। प्रस्तावित कार्यक्रम में यात्रा की शुरुआत नौटी से और शुरुआती पड़ाव इड़ाबधाणी रखा गया था।
कुरुड़ पक्ष ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई। कुरुड़ से जुड़े लोगों का कहना रहा कि मां नंदा की यात्रा की परंपरा में कुरुड़ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और यात्रा की ऐतिहासिक एवं धार्मिक परंपरा में कुरुड़ की भूमिका को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।
कुरुड़ पक्ष के लोगों ने देहरादून स्थित पर्यटन विभाग के कार्यालय पहुंचकर यात्रा के मार्ग में कुरुड़ को शामिल करने की मांग भी रखी थी।
कुरुड़ पक्ष का कहना है कि इस धार्मिक यात्रा की पारंपरिक पहचान “बड़ी जात” के रूप में रही है। समय के साथ इसे “राजजात” के नाम से अधिक पहचान मिली। कुरुड़ पक्ष का यह भी दावा है कि समय के साथ यात्रा आयोजन में कांसुआ के कुंवर और नौटी गांव से जुड़े लोगों की भूमिका बढ़ती गई और कुरुड़ की भूमिका अपेक्षाकृत कम होती गई।
इसी ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा को आधार बनाकर कुरुड़ पक्ष ने 2026 में अपनी परंपरा के अनुसार बड़ी जात निकालने का निर्णय लिया।
2026 में दो यात्राओं की स्थिति कैसे बनी?
इस वर्ष नंदा देवी यात्रा को लेकर दो अलग-अलग आयोजन सामने आने की प्रमुख वजह यही परंपरागत और आयोजन संबंधी मतभेद रहे।
नौटी राजजात समिति ने मौसम, मलमास और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यात्रा की व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए मुख्य राजजात को 2026 से आगे बढ़ाकर 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया।
समिति की चिंता का प्रमुख कारण यात्रा का हिमालयी चरण था। सितंबर के दूसरे पखवाड़े में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम तेजी से बदल सकता है। बर्फबारी, ओलावृष्टि और बारिश के कारण यात्रियों के सामने कठिन परिस्थितियां पैदा होने की आशंका रहती है।
होमकुंड सहित ऊंचाई वाले निर्जन क्षेत्रों में यात्रियों के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाओं की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण विषय रही। प्रशासन की ओर से भी परिस्थितियों पर पुनर्विचार के लिए समिति को पत्र भेजे जाने की बात सामने आई।
यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए नौटी पक्ष ने मुख्य राजजात को 2027 में कराने का निर्णय लिया।
दूसरी ओर कुरुड़ पक्ष ने अपनी परंपरा के अनुसार 2026 में ही बड़ी जात यात्रा निकालने का फैसला किया। इसी निर्णय के तहत 5 सितंबर को कुरुड़ से मां नंदा की डोली कैलाश के लिए रवाना हुई।
नंदा राजजात का ऐतिहासिक क्रम
मां नंदा देवी की राजजात यात्रा को सामान्यतः 12 वर्ष के अंतराल से जोड़ा जाता है। हालांकि इतिहास में प्रत्येक यात्रा ठीक 12 वर्ष बाद आयोजित हुई हो, ऐसा क्रम लगातार दिखाई नहीं देता।
उपलब्ध ऐतिहासिक क्रम के अनुसार 1968 के बाद 1987 में यात्रा हुई। इसके बाद 2000 में आयोजन हुआ। वर्ष 2012 में यात्रा प्रस्तावित थी, मगर 2013 की भीषण आपदा के कारण इसे आगे बढ़ाना पड़ा और बाद में 2014 में यात्रा आयोजित हुई।
इसी ऐतिहासिक क्रम, धार्मिक परंपरा और आयोजन की भूमिका को लेकर 2026 में यात्रा के स्वरूप पर बहस सामने आई।
एक ओर मौसम और व्यवस्थाओं को देखते हुए नौटी पक्ष ने मुख्य राजजात को 2027 में कराने का निर्णय लिया, दूसरी ओर कुरुड़ पक्ष ने अपनी धार्मिक परंपरा के अनुरूप 2026 में बड़ी जात निकालने का निर्णय कायम रखा।
मां नंदा की यात्रा में समाई उत्तराखंड की लोकसंस्कृति
बड़ी जात की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें धर्म और लोकजीवन एक साथ दिखाई देते हैं। मां की डोली के साथ चलने वाले श्रद्धालुओं के बीच पहाड़ी लोकगीत, पारंपरिक वाद्य, देव डोलियां, छंतोलियां और स्थानीय धार्मिक परंपराएं यात्रा को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती हैं।
यह यात्रा उत्तराखंड के उन गांवों को भी जोड़ती है, जिनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान पीढ़ियों से मां नंदा की आराधना से जुड़ी हुई है।
मां नंदा की डोली जिस गांव से गुजरती है, वहां श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह दिखाई देता है। लोग अपने घरों और गांवों को सजाते हैं, डोली की पूजा करते हैं और मां से परिवार, गांव और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
आस्था के साथ सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
लगभग 280 किलोमीटर की यह यात्रा ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र से होकर गुजरेगी। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल है। मौसम में अचानक बदलाव, दुर्गम रास्ते, ऑक्सीजन की कमी, बारिश और संभावित बर्फबारी जैसी परिस्थितियों को देखते हुए यात्रियों को सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा।
यात्रा से जुड़े धार्मिक उत्साह के साथ प्रशासन और आयोजन समितियों के सामने व्यवस्थाओं को बनाए रखने की चुनौती भी रहेगी। विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्वास्थ्य, संचार, भोजन, पानी और आपातकालीन सहायता जैसी सुविधाएं महत्वपूर्ण होंगी।
कैलाश की ओर बढ़ी मां की डोली
कुरुड़ से निकल चुकी मां नंदा की डोली अब हिमालय की कठिन राहों पर आगे बढ़ रही है। हजारों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ शुरू हुई यह यात्रा उत्तराखंड की सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को एक बार फिर जीवंत कर रही है।
डोली के साथ चल रहे श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने का मार्ग नहीं, मां के प्रति समर्पण और आस्था की परीक्षा भी है। हर पड़ाव पर पूजा, हर गांव में स्वागत और हर जयकारे के साथ मां नंदा की यात्रा आगे बढ़ेगी।
5 सितंबर से शुरू हुई इस बड़ी जात का अंतिम लक्ष्य होमकुंड है, जहां 30 सितंबर को मुख्य धार्मिक अनुष्ठान प्रस्तावित है। इसके साथ ही इस ऐतिहासिक यात्रा का धार्मिक चरण पूर्ण होगा।
मां नंदा की डोली के प्रस्थान के साथ उत्तराखंड के हिमालयी अंचल में एक बार फिर वही पारंपरिक स्वर गूंज उठा है—“जय मां नंदा।”
यह यात्रा उत्तराखंड की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जिसमें हिमालय केवल पर्वत नहीं, आस्था का केंद्र है; देवभूमि केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, लोकविश्वास और संस्कृति की पहचान है।
मां नंदा की डोली सकुशल कैलाश पहुंचे।
सभी श्रद्धालुओं की यात्रा मंगलमय हो।
मां नंदा राजराजेश्वरी सब पर अपनी कृपा बनाए रखें।
जय मां नंदा राजराजेश्वरी।
जय मां नंदा।
जय उत्तराखंड।
