

रुद्रपुर के शैलजा फार्म में नगर निगम द्वारा की गई ताजा कार्रवाई केवल एक अतिक्रमण हटाने की प्रशासनिक कवायद नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता पर सीधा प्रहार है, जो वर्षों से आस्था, साधु-संत और धार्मिक गतिविधियों की आड़ में सरकारी जमीनों को हड़पने का दुस्साहस करती रही है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
मुख्यमंत्री के ‘जीरो टॉलरेंस’ के संकल्प के अनुरूप नगर निगम ने जिस दृढ़ता और पारदर्शिता के साथ लगभग 6 एकड़ बेशकीमती सरकारी भूमि को कब्जामुक्त कराया, वह प्रशंसा के योग्य है।
यह कोई छोटा-मोटा अतिक्रमण नहीं था। वर्षों से झोपड़ियों, अवैध निर्माणों और कथित धार्मिक गतिविधियों के सहारे एक पूरा अवैध साम्राज्य खड़ा कर दिया गया था। प्रशासन को लंबे समय से इसकी शिकायतें मिल रही थीं, लेकिन अब जाकर निर्णायक कार्रवाई हुई। तड़के शुरू हुई इस मुहिम में जिस तरह से पुलिस बल, निगम प्रशासन और आधुनिक तकनीक—ड्रोन निगरानी, वीडियोग्राफी और मैपिंग—का इस्तेमाल किया गया, उसने साफ कर दिया कि अब अवैध कब्जों के लिए कोई “सेफ ज़ोन” नहीं बचा है।
कार्रवाई के दौरान बाबा बालक राम द्वारा सरकारी कार्य में बाधा डालने का प्रयास इस बात का प्रमाण है कि ऐसे कब्जाधारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। पुलिस द्वारा तत्काल हिरासत में लेना यह संदेश देता है कि अब दबाव, हंगामा या धार्मिक भावनाओं का सहारा लेकर कानून को बंधक नहीं बनाया जा सकता। प्रशासन ने यह भी सराहनीय कार्य किया कि सामान को सुरक्षित निकलवाकर, पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड कर, भविष्य में किसी तरह के झूठे आरोपों की गुंजाइश खत्म कर दी।
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कब्जामुक्त कराई गई भूमि को तत्काल घेराबंदी कर सुरक्षित किया गया और उस पर सरकारी स्वामित्व का स्पष्ट बोर्ड लगाया गया। यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि भविष्य में कोई फिर से उसी जमीन पर कब्जा जमाने की हिम्मत न कर सके। साथ ही, इस भूमि को जनहित की योजनाओं के लिए सुरक्षित रखने की घोषणा यह दर्शाती है कि प्रशासन की मंशा केवल तोड़फोड़ तक सीमित नहीं, बल्कि विकास की ओर केंद्रित है।
शैलजा फार्म की यह कार्रवाई उन तमाम लोगों के लिए चेतावनी है, जो सोचते हैं कि मंदिर, मठ या साधु का चोला ओढ़कर सरकारी जमीन पर कब्जा करना आसान है। आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन आस्था के नाम पर कानून का मज़ाक उड़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि इसी तरह निष्पक्ष, तकनीकी और साहसिक कदम उठाए जाते रहे, तो निश्चित रूप से उत्तराखंड में सरकारी जमीनों पर वर्षों से जमे अतिक्रमण के किले एक-एक कर ढहते जाएंगे।




