रूद्रपुर उत्तराखंड में साइबर अपराध अब केवल तकनीकी ठगी नहीं रह गया है, बल्कि यह मानसिक आतंक का रूप ले चुका है। डिजिटल अरेस्ट जैसे काल्पनिक शब्दों का भय दिखाकर साइबर ठगों ने एक महिला से सवा करोड़ रुपये से अधिक की जीवनभर की पूंजी हड़प ली।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यह घटना न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि आम नागरिकों की डिजिटल जागरूकता और प्रशासनिक चेतावनी तंत्र की कमजोरियों को भी उजागर करती है।
अल्मोड़ा जनपद के दनिया थाना क्षेत्र स्थित मिर्तोला आश्रम निवासी चित्रा अय्यर साह के साथ हुई यह घटना बताती है कि साइबर अपराधी अब खुद को ट्राई, सीबीआई और अन्य संवैधानिक संस्थाओं का अधिकारी बताकर लोगों को मानसिक रूप से बंधक बना रहे हैं। ‘आधार कार्ड के दुरुपयोग’ और ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ जैसे गंभीर आरोपों का डर दिखाकर महिला को यह विश्वास दिलाया गया कि वह जांच के दायरे में हैं और किसी से संपर्क करने पर तत्काल गिरफ्तारी हो जाएगी। यही वह बिंदु है, जहां डर विवेक पर भारी पड़ जाता है।
‘सीक्रेट सुपरविजन अकाउंट’ जैसी मनगढ़ंत प्रक्रिया के नाम पर महिला से 1 करोड़ 20 लाख रुपये एक झटके में निकलवा लेना इस बात का प्रमाण है कि ठग न केवल तकनीकी रूप से दक्ष हैं, बल्कि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में भी माहिर हो चुके हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इतने बड़े लेनदेन के बावजूद बैंकिंग सिस्टम में कोई अलर्ट या हस्तक्षेप नहीं हुआ।
यह मामला केवल एक महिला की ठगी का नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि आखिर साइबर अपराधों को लेकर सरकारी एजेंसियों की जन-जागरूकता मुहिम कितनी प्रभावी है। ट्राई, पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी कभी भी फोन या व्हाट्सएप पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं करती—यह तथ्य अब हर नागरिक तक पहुंचना चाहिए।
पुलिस ने धारा 318(4) बीएनएस और 66डी आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन असली चुनौती अपराध के बाद नहीं, बल्कि अपराध से पहले रोकथाम की है। जरूरत है कि डिजिटल भय के इस नए हथियार के खिलाफ सरकार, बैंक और मीडिया मिलकर एक सशक्त और निरंतर अभियान चलाएं।
क्योंकि अगर डर ही कानून बन जाएगा, तो ठगों की गिरफ्त से कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।

