उत्तराखंड का अजय नेतृत्व: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और तीसरे कार्यकाल की जनपरिकल्पना

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रुद्रपुर,उत्तराखंड की आत्मा केवल पहाड़ों, नदियों और हिमालयी शिखरों में नहीं बसती, बल्कि उसकी चेतना उसकी लोकपरंपराओं, आस्था, संस्कार और सामूहिक स्मृति में जीवित रहती है। यही कारण है कि जब देवभूमि में मेले लगते हैं, तो वे केवल आयोजन नहीं होते—वे समाज की सांस्कृतिक नब्ज़ बन जाते हैं। ऐसे आयोजनों में जनता और नेतृत्व के बीच जो आत्मीय संवाद होता है, वही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


हाल के उत्तरकाशी दौरे में देवतुल्य जनता से मिला अपार स्नेह, प्रेम और विश्वास इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उत्तराखंड की जनता आज भी अपने नेतृत्व को केवल सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक आकांक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में देखती है। यह विश्वास, यह अपनत्व, और यह भावनात्मक जुड़ाव किसी राजनीतिक प्रबंधन का परिणाम नहीं, बल्कि जन-जन तक पहुँची नीतियों, संवेदनशील निर्णयों और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रतिफल है।
धामी युग: स्थिरता का प्रतीक, विश्वास का आधार
उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद बीते 25 वर्षों में प्रदेश ने राजनीतिक अस्थिरता के कई दौर देखे। सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, नीतियाँ बदलीं, लेकिन जनता के मन में स्थायित्व की अनुभूति दुर्लभ रही। ऐसे समय में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का नेतृत्व एक अपवाद बनकर उभरा है।
यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील, भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण और राजनीतिक रूप से जटिल राज्य में कोई मुख्यमंत्री लगातार रिकॉर्ड तोड़ कार्यकाल पूरा करे। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल का रिकॉर्ड टूटना केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि जनस्वीकृति का प्रमाण है। यह इस बात का संकेत है कि जनता ने धामी को केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्हें अपना नेता माना है।
विरोध के शोर में भी जनसमर्थन का समुद्र,
संवेदनशील और भावनात्मक मुद्दे पर व्यापक विरोध, प्रदर्शन और राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद यदि कोई नेतृत्व जनता के बीच जाकर उसी विश्वास के साथ स्वीकार किया जाता है, तो यह असाधारण राजनीतिक पूंजी होती है। कुमाऊँ से लेकर गढ़वाल तक, जहाँ-जहाँ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहुँचे, वहाँ हजारों-हजारों की भीड़ उनका स्वागत करने उमड़ी।
सड़कों के दोनों ओर खड़ी महिलाएँ, पुष्पवर्षा, पारंपरिक वाद्ययंत्र, लोकगीत—यह सब किसी प्रशासनिक निर्देश से नहीं होता। यह जनता के मन का उत्सव होता है। शायद आज़ादी के बाद उत्तराखंड में किसी भी राजनेता का ऐसा स्वतःस्फूर्त, भावनात्मक और ऐतिहासिक स्वागत विरले ही देखा गया हो।
अजय नेता की परिभाषा: संख्या नहीं, संकल्प
विरोध के स्वर लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन जब पूरे राज्य में विरोध करने वालों की संख्या लाख के आसपास भी नहीं पहुँचती और दूसरी ओर जनसभाओं में लाखों का समर्थन दिखाई देता है, तो राजनीतिक गणित स्वतः स्पष्ट हो जाता है। धामी सरकार को न आज खतरा है, न भविष्य में दिखता है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की पड़ताल में 13 जिलों में जनता से हुए संवाद में एक बात स्पष्ट रूप से सामने आई—लोग मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की तुलना सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करते हैं। यह तुलना सत्ता की नहीं, नेतृत्व की है। यह तुलना कार्यशैली, निर्णायक क्षमता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की है।
संस्कृति, आस्था और आध्यात्मिक उत्तराखंड का पुनर्जागरण
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक विरासत को शासन के केंद्र में रखा। देवभूमि की पहचान केवल पर्यटन से नहीं, बल्कि धार्मिक चेतना से है—और धामी सरकार ने इसे समझा।
चमोली जनपद के नीती गाँव में स्थित टिम्मरसैंण महादेव की गुफा हो या शीतकालीन यात्रा का पुनर्जीवन—यह केवल पर्यटन योजनाएँ नहीं, बल्कि आस्था के मार्ग हैं। पौराणिक मंदिरों का संरक्षण, लोक वाद्ययंत्रों जैसे ढोल–दमाऊँ, बाघ यंत्र, हुड़का की पुनर्स्थापना, लोक उत्सवों को सरकारी संरक्षण—यह सब एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का संकेत है।
उत्तराखंड की जिस आत्मा को लंबे समय तक उपेक्षित किया गया, उसे धामी सरकार ने प्रथम पंक्ति में खड़ा किया।
हिंदुत्व का उत्तराखंडी स्वरूप
आज जब पूरा देश हिंदुत्व को लेकर गर्व का अनुभव करता है, तब उत्तराखंड में उसका स्वरूप आक्रामक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और संरक्षणात्मक है। धामी सरकार ने यह स्पष्ट किया कि उत्तराखंड की संस्कृति पर किसी भी प्रकार का सांस्कृतिक हमला स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अवैध कब्जों पर बुलडोज़र की कार्रवाई ने यह भी संदेश दिया कि कानून सबके लिए समान है। इस दृढ़ता ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। फर्क केवल इतना है कि जहाँ योगी मॉडल प्रशासनिक सख़्ती का प्रतीक है, वहीं धामी मॉडल सांस्कृतिक चेतना और संवेदनशील शासन का संतुलन है।
राष्ट्रीय राजनीति में धामी की उपस्थिति
मध्य प्रदेश हो, बिहार हो या अन्य राज्य—जहाँ भी चुनावी माहौल होता है, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की एक झलक पाने को जनसैलाब उमड़ पड़ता है। यह केवल पार्टी का समर्थन नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का आकर्षण है।
यह भीड़ इतिहास लिखती है—और धामी उस इतिहास के नायक बन चुके हैं।
मातृशक्ति का सम्मान, केवल नारा नहीं
धामी सरकार के कार्यकाल में मातृशक्ति के लिए किए गए कार्य उल्लेखनीय हैं। स्वयं सहायता समूहों को सशक्त करना, महिला उद्यमिता को बढ़ावा, लोकल उत्पादों को बाज़ार देना—यह सब महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाता है।
यह वही उत्तराखंड है जहाँ महिलाएँ पहाड़ की रीढ़ रही हैं, और धामी सरकार ने उस रीढ़ को सम्मान दिया है।
तीसरे कार्यकाल की जनआकांक्षा
2027 की ओर बढ़ते उत्तराखंड में चाहे कितनी भी राजनीतिक उथल-पुथल हो, धरने–प्रदर्शन हों, तंबू गाड़े जाएँ—जनता का रुझान स्पष्ट है। पुष्कर सिंह धामी केवल मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना के वाहक बन चुके हैं।
उनकी लोकप्रियता बुलडोज़र से नहीं, बल्कि संस्कृति के संरक्षण से बनी है। यह लोकप्रियता सत्ता की नहीं, संस्कार की देन है।
अजेय नेतृत्व की स्वीकृति
उत्तराखंड की जनता स्वयं भविष्य की परिकल्पना कर रही है। यह परिकल्पना स्पष्ट है—स्थिर, सांस्कृतिक रूप से सजग, आध्यात्मिक रूप से समृद्ध और निर्णायक नेतृत्व।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आज उत्तराखंड के अजय नेता हैं—और यह उपाधि किसी दल ने नहीं, बल्कि देवतुल्य जनता ने दी है।
तीसरे कार्यकाल के लिए शुभकामनाएँ केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जनभावना की अभिव्यक्ति हैं।
उत्तराखंड आगे बढ़ रहा है—संस्कृति के साथ, विश्वास के साथ और धामी के नेतृत्व में।


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