अंकिता भंडारी केस: VIP अज्ञात हैं, पर आवाज़ें पहचान ली जाती हैं? VIP का नाम लेना अपराध है, सवाल पूछना साज़िश और चुप रहना देशभक्ति

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अंकिता भंडारी केस: VIP अज्ञात हैं, पर आवाज़ें पहचान ली जाती हैं
VIP का नाम लेना अपराध है, सवाल पूछना साज़िश और चुप रहना देशभक्ति बन चुका है। अंकिता भंडारी हत्याकांड में हत्या से ज़्यादा खतरनाक सच बोलना साबित हो रहा है। जांच आरोपियों पर नहीं, सवाल उठाने वालों पर केंद्रित है—यही आज का न्याय और सिस्टम की संवेदनशीलता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

अंकिता भंडारी हत्याकांड में एक बार फिर सच्चाई नहीं, बल्कि सिस्टम की प्राथमिकताएँ उजागर हुई हैं। कथित ‘वीआईपी’ का नाम सामने आता है—लेकिन जांच का रुख अचानक मोड़ लेता है। वीआईपी की ओर नहीं, बल्कि नाम लेने वालों की ओर।
अब हरिद्वार पुलिस ने उर्मिला सनावर के खिलाफ जांच के लिए SIT बना दी है। सवाल यह नहीं कि जांच क्यों हो—सवाल यह है कि किसकी और क्यों। जो महिला सार्वजनिक मंच पर सवाल उठाती है, आरोप लगाती है, उसे जांच के दायरे में लाना तो त्वरित है, लेकिन जिन पर उंगली उठी—उन पर न तो राज्य सरकार जांच कराएगी, न CBI बुलाएगी।
यह वही “न्याय” है, जिसमें आरोप से ज़्यादा आवाज़ खतरनाक मानी जाती है।
सरकार का संदेश साफ है—
VIP का नाम लेना अपराध है,
सवाल पूछना साज़िश है,
और चुप रहना देशभक्ति।
यह भी संयोग ही है कि हर बार “सबूत नहीं हैं” का राग उन्हीं जगहों पर अलापा जाता है, जहाँ सत्ता की सांसें जुड़ी हों। SIT बनती है, लेकिन दिशा तय रहती है—सत्य की खोज नहीं, कथावाचक की पड़ताल।
अंकिता के लिए न्याय अब भी फाइलों में कैद है, और सिस्टम कैमरे के सामने “संवेदना” व पर्दे के पीछे “सुविधा” साध रहा है। अगर सच में जांच होती, तो शायद डर आवाज़ उठाने वालों को नहीं, नाम छुपाने वालों को लगता।
इस देश में अब सवाल यह नहीं रहा कि अपराध किसने किया,
बल्कि यह है कि किसने बोला।


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