

रुद्रपुर।कांग्रेस के कलेक्ट परिसर में हुए धरना-प्रदर्शन के दौरान व्यापार मंडल अध्यक्ष संजय जुनेजा का एक सवाल सीधे ज़मीर पर चोट कर गया— “अंकिता भंडारी जैसे गंभीर मामले में आपका समाज कहाँ है?” यह सवाल उन्होंने पत्रकार अवतार सिंह बिष्ट से किया, और यही सवाल आज रुद्रपुर की जागरूक जनता भी पूछ रही है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)
तीन साल होने को आए, लेकिन रुद्रपुर में आज तक अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर पर्वतीय समाज की ओर से कोई सशक्त, संगठित और मुखर कैंडल मार्च, धरना या ज्ञापन क्यों नहीं दिखा? जब पूरे उत्तराखंड में न्याय की आवाज़ गूंजी, तब रुद्रपुर में पर्वतीय समाज की सामूहिक उपस्थिति क्यों नदारद रही?
4 तारीख को निकाले गए कैंडल मार्च की जानकारी जरूर दी गई, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आवाज़ उतनी बुलंद थी, जितनी होनी चाहिए थी?
यह वही रुद्रपुर है, जहाँ सुषमा पंत जैसी पर्वतीय महिला को समाज और सिस्टम ने मिलकर “लावारिस” घोषित कर दिया। उसका अंतिम संस्कार सरकार को लावारिस के रूप में करना पड़ा। न समाज सड़कों पर उतरा, न कोई बड़ा विरोध, न कोई सामूहिक आत्मग्लानि। क्या सुषमा पंत का अपराध सिर्फ़ इतना था कि वह न तो वीआईपी थी और न ही किसी राजनीतिक रसूख का हिस्सा?
अंकिता भंडारी की हत्या ने पूरे राज्य को झकझोरा, लेकिन रुद्रपुर में पर्वतीय समाज की खामोशी ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए।
क्या हमारी सामाजिक चेतना सिर्फ़ सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मेलों और मंचों तक सीमित है?
क्या अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस हमने कहीं गिरवी रख दिया है?
व्यापार मंडल अध्यक्ष संजय जुनेजा सहित कई गैर-राजनीतिक, प्रतिष्ठित नागरिकों ने इस चुप्पी पर खुलकर नाराजगी जताई है। यह नाराजगी किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि एक पूरे समाज की निष्क्रियता से है।
अब समय है आत्ममंथन का। क्योंकि इतिहास गवाह है—
जब समाज बोलता नहीं, तब अन्याय और मजबूत होता है।
और जब समाज चुप रहता है, तब चुप्पी भी अपराध के पक्ष में खड़ी मानी जाती है।
पर्वतीय समाज के लिए यह खबर आरोप नहीं, बल्कि एक आईना है।
सवाल अब भी वही है—
अंकिता और सुषमा के बाद भी अगर हम नहीं जागे, तो फिर कब?




