

उत्तराखंड सरकार को आज एक सीधा और असहज सवाल सुनना चाहिए—
आप हिंदुत्व की राजनीति किसके लिए करते हैं? पोस्टरों के लिए या परंपराओं के लिए?
जब चुनाव आते हैं, तो भगवा झंडा लहराता है।
जब मंदिरों की बात होती है, तो “संविधान-संविधान” का जाप शुरू हो जाता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह कैसी दोहरी नीति है?
अगर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर सवाल उठता है, तो उत्तराखंड सरकार और उसके समर्थक अचानक संविधान के अनुच्छेदों के ज्ञाता बन जाते हैं। लेकिन कोई यह बताने की हिम्मत करे—
क्या मस्जिद में गैर-मुस्लिम प्रवेश संविधान से तय होता है?
क्या चर्च की धार्मिक मर्यादाएँ किसी अनुच्छेद से चलती हैं?
क्या वक्फ बोर्ड अपने फैसले लेने से पहले सुप्रीम कोर्ट की फाइल पलटता है?
फिर हिंदू धर्म में ही ऐसा क्या “दोष” है कि उसे हर बार संविधान की कसौटी पर चढ़ाया जाता है?
भारतीय जनता पार्टी को यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए—
हिंदू धर्म कोई सरकारी विभाग नहीं है, जो नोटिफिकेशन से चले।
हिंदू धर्म वेदों से चलता है, गीता से चलता है, परंपरा और आस्था से चलता है।
संविधान राज्य के लिए है,
धर्म आत्मा के लिए।
उत्तराखंड के मठाधीशों, साधु-संतों और धर्माचार्यों से भी आज सवाल है—
आप कब तक चुप रहेंगे?
जब चार धाम की पवित्रता पर बहस हो और आप “कानूनी विशेषज्ञों” की भाषा बोलें, तो यह जागरण नहीं, आत्मसमर्पण कहलाता है।
सरकार अगर सच में हिंदुत्व की पक्षधर है, तो वह यह साहस दिखाए कि हिंदू मंदिरों को हिंदुओं के सिद्धांतों से चलने दे।
और अगर ऐसा नहीं कर सकती, तो कम से कम यह नाटक बंद करे कि वह हिंदू हितैषी है।
हिंदू धर्म संविधान से नहीं बंधा।
संविधान अगर बचेगा, तो इसी सभ्यता की नींव पर बचेगा।
अब निर्णय का समय है—
या तो आस्था के साथ खड़े होइए,
या फिर खुलकर कह दीजिए कि यह हिंदुत्व सिर्फ चुनावी जुमला है।




