बसंत पंचमी: विद्या, विवेक और भारतीय चेतना का उत्सव

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रुद्रपुर,माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि भारतीय संस्कृति में केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, सृजन और नवचेतना का प्रतीक दिवस है। यही वह दिन है, जब सनातन परंपरा के अनुसार विद्या, बुद्धि और वाणी की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ। इसी कारण बसंत पंचमी को भारतवर्ष में श्रद्धा, आस्था और साधना के साथ मनाया जाता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


बसंत पंचमी प्रकृति और मनुष्य—दोनों के भीतर नवजीवन के संचार का पर्व है। खेतों में पीली सरसों लहलहाती है, पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं और मानव-मन में आशा, सृजन तथा ज्ञान की अभिलाषा जाग्रत होती है। पीला रंग केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि सात्विकता, विवेक और चेतना का प्रतीक भी है।
मां सरस्वती और ज्ञान-संस्कृति
हिंदू मान्यता में मां सरस्वती केवल पुस्तकों की देवी नहीं हैं, बल्कि वे विवेक, संयम और नैतिक बोध की भी अधिष्ठात्री हैं। आज जब समाज भौतिक प्रगति की दौड़ में नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है, तब बसंत पंचमी हमें स्मरण कराती है कि ज्ञान बिना संस्कार के अधूरा है।
यही कारण है कि इस दिन विशेष रूप से छात्रों, शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों द्वारा मां सरस्वती की आराधना की जाती है। विद्या का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि मानव को श्रेष्ठ नागरिक बनाना है—और यही मां सरस्वती का मूल संदेश है।
व्रत, पूजन और साधना का महत्व
धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि बसंत पंचमी के दिन किया गया व्रत, पूजन और जप अत्यंत फलदायी होता है। श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और पीले वस्त्र धारण कर मां सरस्वती को पीले पुष्प, फल और मिष्ठान अर्पित करते हैं।
विशेष रूप से “ह्रीं वाग्देव्यै ह्रीं ह्रीं” मंत्र का जप साधक के वाणी-दोष, भ्रम और मानसिक अस्थिरता को दूर करता है—ऐसी मान्यता है।
छात्रों के लिए विशेष संदेश
आज का विद्यार्थी वर्ग तीव्र प्रतिस्पर्धा, तनाव और लक्ष्यहीनता से जूझ रहा है। ऐसे समय में बसंत पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर आत्मानुशासन और आत्मविश्वास का दिवस बन सकती है।
कलम, पुस्तक और विद्या का सम्मान करना—यही मां सरस्वती की सच्ची पूजा है।
दान और सेवा: ज्ञान की पूर्णता
बसंत पंचमी पर स्नान, दान और सेवा का भी विशेष महत्व है। किसी जरूरतमंद बच्चे को कलम, कॉपी या शिक्षा-सहायता देना मां सरस्वती को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ मार्ग माना गया है। क्योंकि ज्ञान तब ही पूर्ण होता है, जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
समकालीन समाज के लिए संदेश
2017 का भारत तेजी से बदल रहा है, लेकिन यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रगति का आधार विवेक होना चाहिए, न कि केवल तकनीक। बसंत पंचमी हमें चेताती है कि अगर शिक्षा से संस्कार निकल गए, तो समाज दिशाहीन हो जाएगा।
निष्कर्ष
बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की आत्मा का उत्सव है। यह पर्व हमें ज्ञान को अहंकार नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनाने की प्रेरणा देता है।
मां सरस्वती की कृपा तभी स्थायी होती है, जब जीवन में सत्य, संयम और सद्भाव का वास हो।
यही बसंत पंचमी का शाश्वत संदेश है।


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