परंपरा, ज्योतिष और सुरक्षा के सम्मान में 2027 का निर्णय

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उत्तराखंड की आस्था, संस्कृति और हिमालयी चेतना की सबसे विराट यात्रा नंदा देवी राजजात को लेकर नंदा राजजात समिति ने एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी निर्णय लिया है। प्रस्तावित वर्ष 2026 में होने वाली राजजात यात्रा को स्थगित करते हुए अब इसे वर्ष 2027 में आयोजित करने का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


यह निर्णय केवल तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि लोक-परंपरा, ज्योतिषीय गणना, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और ऐतिहासिक तथ्यों के सम्मान का सामूहिक निष्कर्ष है।
क्यों स्थगित हुई 2026 की राजजात यात्रा
समिति के अनुसार 2026 में यात्रा आयोजन के पीछे तीन प्रमुख कारण सामने आए—
1. मलमास और ज्योतिषीय जोखिम
विद्वान ज्योतिषाचार्यों की गणना के अनुसार वर्ष 2026 में राजजात के लिए शुभ और सुरक्षित मुहूर्त उपलब्ध नहीं थे।
इसके साथ ही उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सितंबर माह के दौरान हिमस्खलन, अतिवृष्टि और मौसम की अनिश्चितता को गंभीर जोखिम माना गया।
2. श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोपरि
पूर्व अनुभव बताते हैं कि इसी अवधि में प्राकृतिक आपदाओं ने भारी जन-धन हानि पहुंचाई है। समिति का स्पष्ट मत है कि आस्था के नाम पर किसी भी प्रकार का जोखिम स्वीकार्य नहीं हो सकता।
3. प्रारंभ स्थल को लेकर ऐतिहासिक विवाद
राजजात के प्रारंभिक स्थल को लेकर कुरूड़ (नंदा धाम) और नौटी गांव के बीच लंबे समय से मतभेद रहा है।
इतिहासकारों और लोक-परंपराओं के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि—
‘बड़ी राजजात’ का मूल और पौराणिक प्रारंभ स्थल कुरूड़ (नंदा धाम) रहा है।
नौटी गांव को बाद के कालखंड में राजपरिवार से जोड़कर देखा गया, किंतु इतिहास, लोककथाओं और प्राचीन परंपराओं में कुरूड़ की केंद्रीय भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
कुरूड़ को प्राथमिकता : इतिहास का पुनर्स्मरण
उत्तराखंड के कई प्रतिष्ठित इतिहासकारों और लोकसंस्कृति विशेषज्ञों का मत है कि
नंदा देवी की राजजात मूलतः ‘नंदा धाम कुरूड़’ से ही प्रारंभ होती रही है।
यह स्थल—
देवी नंदा की प्राचीन उपासना का केंद्र
लोक परंपराओं में ‘मायका’ के रूप में प्रतिष्ठित
बड़ी राजजात की सांस्कृतिक धुरी
रहा है।
इस दृष्टि से समिति का निर्णय इतिहास-सम्मत और परंपरा-संरक्षक माना जा रहा है।
अगला महत्वपूर्ण चरण : बसंत पंचमी 23 जनवरी 2026
यद्यपि यात्रा 2027 में होगी, लेकिन उसकी धार्मिक औपचारिक शुरुआत इससे पहले—
बसंत पंचमी | 23 जनवरी 2026
को गढ़वाल के कंसुआ गांव में राजकुंवर द्वारा
नंदा देवी मंदिर में ‘मनौती’ (मन्नत) के माध्यम से की जाएगी।
इसके पश्चात—
विद्वान ज्योतिषाचार्यों द्वारा
पंचांग, नक्षत्र और लोक परंपराओं के आधार पर
2027 की राजजात की सटीक तिथि, मार्ग और कार्यक्रमों की विधिवत घोषणा की जाएगी।
राजजात 2027 : परंपरा और प्रशासन दोनों की परीक्षा
समिति ने राज्य सरकार से मांग की है कि—
नंदा राजजात को कुंभ मेले की तर्ज पर विशेष प्राधिकरण दिया जाए
अनुमानित 5,000 करोड़ रुपये का समुचित बजट सुनिश्चित हो
क्योंकि 2027 में—
30 से 50 लाख श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान है
यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि हिमालय का महाकुंभ है।
निष्कर्ष
नंदा देवी राजजात को 2027 तक स्थगित करने का निर्णय किसी दबाव या विवाद का परिणाम नहीं, बल्कि
आस्था, इतिहास, ज्योतिष और सुरक्षा—चारों के संतुलन का परिणाम है।
कुरूड़ (नंदा धाम) को प्राथमिकता देकर समिति ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि—
राजजात राजनीति से नहीं, परंपरा से चलेगी।
और यही इस हिमालयी महायात्रा की आत्मा है।


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