

देवव्रत महेश रेखे: वैदिक साधना से रचा गया 200 वर्षों बाद का इतिहास, काशी बनी साक्षी
काशी। भारत की सनातन परंपरा, हजारों वर्षों की वैदिक साधना और मंत्र-संस्कृति की जीवंत धरोहर एक बार फिर काशी में अपने पूर्ण वैभव के साथ प्रकट हुई, जब मात्र 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा के ‘दंडक्रम पारायण’ को 50 दिनों में, बिना किसी त्रुटि के, 2000 से अधिक वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के साथ पूर्ण कर दिया। यह उपलब्धि बीते दो सौ वर्षों में पहली बार काशी में किसी एक साधक द्वारा एकाकी रूप में संपन्न हुई, जिसने न केवल विद्वानों, साधकों और संत समाज को, बल्कि पूरे देश को आध्यात्मिक गर्व से भर दिया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी।
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इस ऐतिहासिक वैदिक साधना की गूंज काशी की गलियों से होती हुई राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँची। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं इस युवा वेदमूर्ति की साधना की प्रशंसा करते हुए इसे भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया।
क्या है दंडक्रम पारायण? – वैदिक साधना का सर्वोच्च शिखर
‘दंडक्रम पारायण’ वैदिक परंपरा में मंत्रों के उच्चारण की सबसे कठिन और दुर्लभ विधि मानी जाती है। इसमें मंत्रों को इस प्रकार जोड़ा जाता है कि वे आगे-पीछे, क्रमशः और उलटे क्रम में भी शुद्धता के साथ बोले जाएं।
यह केवल स्मरण शक्ति का नहीं, बल्कि सांस, स्वर, उच्चारण, छंद, लय और शुद्धता की चरम परीक्षा होती है। एक भी मात्रा या स्वर की त्रुटि पूरे पारायण को अपवित्र कर सकती है।
विशेषज्ञ वैदिक विद्वानों के अनुसार, दंडक्रम पारायण को पूर्ण करने में सामान्यतः कई वर्षों की तैयारी लगती है, लेकिन देवव्रत महेश रेखे ने इसे 50 दिनों की अखंड साधना और कठोर तप के साथ सिद्ध करके दिखा दिया। यही कारण है कि उनकी यह उपलब्धि आज वैदिक इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज की जा रही है।
2000 मंत्र, 50 दिन, एक साधक – अद्भुत तप और अनुशासन
देवव्रत ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा के 2000 से अधिक मंत्रों का उच्चारण प्रतिदिन कई घंटों तक लगातार किया। इस दौरान उन्होंने अत्यंत संयमित दिनचर्या का पालन किया—
- ब्रह्ममुहूर्त में जागरण
- शुद्ध आहार, अल्प भोजन
- मौन, संयम और ब्रह्मचर्य
- निरंतर ध्यान और स्वाध्याय
वैदिक परंपरा के अनुसार, इस तरह की साधना केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का भी चरम साधन होती है। काशी के वरिष्ठ पंडितों का कहना है कि इतनी कम उम्र में इस स्तर की स्थिरता और एकाग्रता दुर्लभ है।
काशी में दो सौ वर्षों बाद एकाकी दंडक्रम पारायण
काशी के वैदिक इतिहास में यह एक अत्यंत दुर्लभ घटना मानी जा रही है। काशी विद्वत परिषद के अनुसार, बीते करीब दो सौ वर्षों में यह पहला अवसर है जब किसी युवा साधक ने एकाकी रूप से पूरा दंडक्रम पारायण संपन्न किया हो।
इससे पहले इस प्रकार के पारायण सामूहिक रूप में या आंशिक रूप में ही होते रहे हैं।
29 नवंबर को महमूरगंज स्थित शृंगेरी मठ में देवव्रत का भव्य नागरिक अभिनंदन किया गया, जिसमें देशभर से आए वेदाचार्य, शंकराचार्य परंपरा से जुड़े संत, आचार्य और विद्वान बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
काशी तमिल संगमम् में मुख्यमंत्री योगी द्वारा सम्मान
नमो घाट, काशी तमिल संगमम् कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंच से देवव्रत महेश रेखे को सम्मानित किया। उन्होंने कहा—
“देवव्रत जैसे युवा यह प्रमाणित करते हैं कि भारत की सनातन परंपरा केवल अतीत नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र का जीवंत भविष्य है। जिस उम्र में आज का युवा भौतिक आकर्षण में उलझा रहता है, उस उम्र में देवव्रत ने वेदों को जीवन बना लिया—यह पूरे आध्यात्मिक जगत के लिए प्रेरणा है।”
मुख्यमंत्री ने देवव्रत की स्मरण शक्ति, साधना, आत्मानुशासन और तप को भारत की गौरवशाली ऋषि-परंपरा की आधुनिक कड़ी बताया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की सार्वजनिक प्रशंसा
देवव्रत की उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी पहुँची। पीएम मोदी ने उनके प्रयास की खुलकर सराहना की और इसे वैदिक ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण का शुभ संकेत बताया। प्रधानमंत्री की इस प्रशंसा के बाद देशभर में देवव्रत महेश रेखे को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई।
महाराष्ट्र से काशी तक – तप, त्याग और तपस्या की यात्रा
देवव्रत महेश रेखे मूल रूप से महाराष्ट्र से हैं। बाल्यकाल से ही उनका झुकाव वेद, मंत्र और सनातन परंपरा की ओर रहा। पारिवारिक वातावरण भी वैदिक संस्कारों से ओत-प्रोत रहा।
किशोरावस्था में ही उन्होंने यह संकल्प ले लिया था कि वे वेदों को केवल पढ़ेंगे नहीं, बल्कि उन्हें जीकर दिखाएंगे।
उन्हें आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ पारंपरिक गुरुकुलीय शिक्षा भी मिली। मोबाइल, मनोरंजन और सोशल मीडिया से दूर रहकर उन्होंने स्वयं को पूर्णतः वेदाध्ययन और साधना में समर्पित कर दिया। आज जिस उम्र में अधिकांश युवा करियर, प्रतियोगिता और भौतिक सफलता की दौड़ में रहते हैं, उसी उम्र में देवव्रत आध्यात्मिक शिखर पर खड़े दिखाई देते हैं।
काशी विद्वत परिषद द्वारा विशेष सम्मान
काशी विद्वत परिषद ने देवव्रत को विशेष रूप से आमंत्रित कर उनका औपचारिक सम्मान किया। परिषद के वरिष्ठ आचार्यों ने उन्हें “वर्तमान युग का वेदमूर्ति” बताया और कहा कि —
“देवव्रत जैसे साधक सिद्ध करते हैं कि वेद केवल ग्रंथ नहीं, जीवंत चेतना हैं। यदि सही साधना हो तो आज भी वैदिक परंपरा अपने पूर्ण तेज के साथ जीवित है।”
परिषद ने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए यह भी कहा कि आने वाले वर्षों में वे देश और विश्व में वैदिक ज्ञान के प्रमुख दूत बन सकते हैं।
देवव्रत और वैदिक संस्कृति का नवजागरण
देवव्रत की साधना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे सनातन समाज के लिए चेतना का नया सूर्य बनकर उभरी है। यह उस धारणा को भी तोड़ती है कि आज की पीढ़ी आध्यात्मिक मूल्यों से दूर जा रही है।
देवव्रत जैसे युवा यह प्रमाणित कर रहे हैं कि आधुनिकता और अध्यात्म साथ-साथ चल सकते हैं।
आज जब विश्व योग, ध्यान और भारतीय दर्शन की ओर फिर से आकर्षित हो रहा है, तब देवव्रत जैसे साधक भारत की सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक शक्ति को और अधिक मजबूत कर रहे हैं।
विद्वानों की दृष्टि में देवव्रत की उपलब्धि
काशी के वरिष्ठ वैदिक आचार्य और शोधकर्ताओं का मत है कि दंडक्रम पारायण केवल मंत्रोच्चारण नहीं, बल्कि ध्वनि विज्ञान, श्वास-प्रश्वास और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वैज्ञानिक प्रयोग भी है।
शुद्ध उच्चारण से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें वातावरण को शुद्ध करती हैं और साधक के भीतर अद्भुत ऊर्जा का संचार करती हैं।
देवव्रत द्वारा किया गया यह पारायण इस बात का प्रमाण है कि वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन विज्ञान हैं।
सनातन भविष्य की ओर संकेत
देवव्रत महेश रेखे का संपूर्ण व्यक्तित्व सनातन भारत के भविष्य की झलक देता है—
जहां तकनीक और परंपरा टकराती नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं।
जहां युवा केवल उपभोग का नहीं, बल्कि साधना और सेवा का मार्ग चुनते हैं।
आज देवव्रत देश के लाखों युवाओं के लिए एक आदर्श बनकर उभरे हैं, जिन्होंने यह दिखा दिया कि इच्छाशक्ति, अनुशासन और श्रद्धा से असंभव को भी संभव किया जा सकता है।
आध्यात्मिक भारत की नई पहचान
काशी की धरती पर हुआ यह महायज्ञ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक उद्घोष है—
कि भारत आज भी अपनी वैदिक चेतना में जीवंत है,
कि आज भी ऋषि परंपरा का दीप बुझा नहीं,
और कि आज भी 19 वर्ष का युवा वेदों को जीवन बना सकता है।
देवव्रत महेश रेखे का यह तप, यह साधना और यह सिद्धि आने वाले वर्षों में वैदिक पुनर्जागरण के ऐतिहासिक अध्याय के रूप में स्मरण की जाएगी।
देवव्रत महेश रेखे की 50 दिनों की अखंड वैदिक साधना, 2000 मंत्रों का दंडक्रम पारायण, काशी में दो सौ वर्षों बाद रचा गया इतिहास, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा मिली सार्वजनिक सराहना—ये सभी केवल सम्मान नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की विजय पताका हैं।
यह उपलब्धि केवल एक युवक की नहीं, समूचे भारत की आध्यात्मिक चेतना की उपलब्धि है।
देवव्रत आज केवल एक नाम नहीं रहे—वे भारत की वैदिक आत्मा के जीवंत प्रतीक बन चुके हैं।




