

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की यह छवि—जहां वे पोलीभीत रोड पर एक ठेले से मक्का उठाकर स्वयं भूनते हैं, खाकर मुस्कुराते हैं और वहां मौजूद महिला को अपने हाथों से भुट्टा थमाते हैं—सिर्फ एक “नेचुरल मोमेंट” नहीं है। यह एक बारीक राजनीतिक पटकथा है जिसमें हर अंगारे में जनभावनाओं की तपिश पकाई जा रही है, और हर मक्का, अपने भीतर चुनावी रणनीति का स्वाद समेटे हुए है।✍️ अवतार सिंह बिष्ट,
संवाददाता,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी!यह दृश्य उसी दिन सामने आया जिस दिन मुख्यमंत्री ने अपने गांव नगरा तराई में मतदान किया और फिर खटीमा स्थित ऐतिहासिक भारामल बाबा मंदिर में जलाभिषेक कर भंडारे में जमीन पर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। श्रद्धा, सेवा, सरलता और सादगी के ये सभी रंग जब एक साथ एक फ्रेम में आते हैं, तो चुनावी राजनीति की बड़ी स्क्रिप्ट तैयार होती है, जो सीधे जनता की भावनाओं में सेंध लगाती है।
भुट्टा और राजनीति : क्या सच में यह सिर्फ भूख थी?ऐसा भला क्यों होता है कि जब-जब चुनाव होते हैं, तब-तब नेता जनता के बीच भुट्टा खाते, पकोड़े तलते, चाय बनाते या झाड़ू लगाते नजर आते हैं? क्या यह सिर्फ उनका मानवीय पहलू है, या यह उनके मीडिया मैनेजमेंट का सुनियोजित प्रदर्शन?
मुख्यमंत्री धामी ने मक्का उठाया, भूना, खाया और खिलाया। इस एक कार्य में संवेदनशीलता, सहभागिता और सहजता तीनों नजर आते हैं—परंतु, इसे अनदेखा करना भी राजनीति की समझदारी नहीं होगी। इस मक्के को भी चुनाव की भट्टी पर भुना गया है, और यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि “मुख्यमंत्री आम जनमानस से कितना जुड़ा हुआ है।”
भुट्टे के बहाने मतदाता का मन भुनाना?जनता को लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादे, योजनाएं और घोषणाएं होती हैं। लेकिन भावनात्मक अपील का सबसे मजबूत जरिया होता है – छवि निर्माण।
एक ऐसे युग में जहां नेताओं से जनता ने दूरी बना ली है, वहां जमीन पर बैठकर प्रसाद खाना या भुट्टा ठेले से खरीदना उस “दूरी” को “निकटता” में बदलने की राजनीतिक युक्ति है।
जब मुख्यमंत्री खुद मक्का भूने और दूसरों को भी खिलाएं, तो संदेश यह जाता है – मैं भी तुम्हारे जैसा हूं, तुम्हारे बीच का हूं।
यह नेता नहीं, नौकर बनने की राजनीति है। और चुनावी समय में यह सबसे मजबूत हथियार बन जाता है।
चुनावी मक्का : अकेले खा गए या जनादेश भी खा जाएंगे?अब सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह मुख्यमंत्री भुट्टा अकेले खा गए, क्या पंचायत चुनाव में भी भाजपा पूरे मक्के की फसल अकेले काटने जा रही है?
क्या यह इशारा था कि “हम मेहनत से मक्का भूनते हैं, बाकी दल तो सिर्फ ठेले के पास मंडराते हैं”?इस प्रतीकात्मक भुट्टा यदि सही दिशा में ‘पक’ गया, तो धामी सरकार इसे चुनावी परिणामों की प्लेट में सजा कर परोस सकती है। अगर नहीं, तो यह एक वायरल वीडियो मात्र बनकर रह जाएगा—जिसकी गर्मी सोशल मीडिया तक ही सीमित होगी।
राजनीतिक भाष्य : मुख्यमंत्री की भुट्टा खाती तस्वीर का मनोविश्लेषण भूमि से जुड़ाव का प्रतीक: ठेले से मक्का खरीदना मुख्यमंत्री की उस छवि को मजबूत करता है, जहां वे जमीन से जुड़े हुए हैं। यह शहरी नहीं, देहाती नेतृत्व की ब्रांडिंग है। स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का संकेत: उत्तराखंड के कृषि उत्पादों, खासकर मक्का को बाजार से जोड़ने के प्रयास का यह सूक्ष्म प्रतीक था। यह वोकल फॉर लोकल की उस नीति से भी मेल खाता है जिसे प्रधानमंत्री बार-बार दोहराते हैं।प्रचार योग्य और प्रचारकृत: मुख्यमंत्री की यह तस्वीर “व्हॉट्सएप” और “फेसबुक” की चुनावी टोली के लिए एक बेहतरीन कंटेंट पीस है—जिसे वोटरों की भावनाओं को गरम रखने के लिए बार-बार परोसा जाएगा।
मक्का तो भुन गया, अब देखना यह है कि वोट कितने पकते हैं?धामी की यह ‘भुट्टा राजनीति’ निश्चित ही उनके विपक्ष को सोचने पर मजबूर करती है। विपक्षी दल अगर इसे “ड्रामा” कहें तो वे भावनात्मक जुड़ाव की उस राजनीति को नहीं समझ पा रहे जो आज की इमेज-बेस्ड पॉलिटिक्स की असली जान है।उत्तराखंड के गांव-गांव में जब यह तस्वीर पहुंचेगी—एक मुख्यमंत्री जो मंदिर में पूजा करता है, जनता के बीच बैठकर प्रसाद खाता है, पौधा लगाता है, और सड़क किनारे मक्का भूनकर खिलाता है—तो यह एक असाधारण संदेश देगा:यह मुख्यमंत्री सिर्फ कुर्सी पर नहीं बैठता, बल्कि ज़मीन की भट्टी पर जनता की उम्मीदें भी भूनता है—और उन्हें सलीके से परोसना जानता है।”अब देखना यह है कि इस मक्के की महक मतपेटियों तक पहुंचेगी या नहीं।




