उत्तराखंड,अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि सत्ता, संरक्षण और सबूत मिटाने की संगठित साजिश का प्रतीक बन चुका है। इस प्रकरण में अब जिस भाजपा महिला नेता—तत्कालीन यमकेश्वर की जिला पंचायत सदस्य—का नाम उभरकर सामने आ रहा है, उसने जांच की दिशा को और गंभीर बना दिया है। उर्मिला राठौड़ द्वारा लगाए गए आरोपों पर जिस तरह से संबंधित नेता खुद को अलग करने का प्रयास कर रही हैं, वह उनकी भूमिका को साफ करने के बजाय और अधिक संदिग्ध बनाता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि कोई जिला पंचायत सदस्य सीधे देश की सत्तारूढ़ पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के निरंतर संपर्क में कैसे रह सकती है? क्या यह सामान्य राजनीतिक व्यवहार है, या फिर यह किसी असाधारण संरक्षण और प्रभाव की ओर इशारा करता है? जब देशव्यापी जिम्मेदारी संभालने वाला राष्ट्रीय महासचिव किसी “स्थानीय” पदाधिकारी से लगातार संपर्क में रहता है, तो स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है।
दूसरा गंभीर पहलू वह तस्वीर है जिसमें उक्त महिला नेता खुद को प्रशासनिक अधिकारी की तरह प्रस्तुत करती दिखती हैं। क्या जिला पंचायत सदस्य का दर्जा प्रशासनिक अधिकारी के समकक्ष होता है? यदि वह चुनाव से पहले किसी प्रशासनिक पद पर थीं, तो नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ने का आत्मविश्वास कहां से आया? क्या यह भरोसा पहले से किसी बड़े राजनीतिक संरक्षण के कारण था?
उर्मिला राठौड़ के आरोपों में देहरादून की प्रीमियम लोकेशन में महंगे फ्लैट, कार और अन्य सुविधाओं का जिक्र है। सवाल सीधा है—क्या ये संपत्तियां जनसेवा से अर्जित की गई हैं या आय के स्रोत कुछ और हैं? यही नहीं, पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ और अन्य बड़े नेताओं से संबंधों के प्रमाण भी सामने रखे गए हैं, जो इस पूरे नेटवर्क को और संदेह के घेरे में लाते हैं।
भाजपा से दिया गया इस्तीफा भी कई सवाल खड़े करता है। एक सामान्य कार्यकर्ता का पत्र सीधे प्रदेश अध्यक्ष और प्रतिलिपि राष्ट्रीय अध्यक्ष को जाना, यह दर्शाता है कि संपर्क साधारण नहीं थे। यह स्वयं में बड़े नेताओं से करीबी की तस्दीक करता है।
सबसे गंभीर आरोप वनांतरा रिजॉर्ट कांड के दिन की मौजूदगी और कॉल डिटेल्स से जुड़ा है। उर्मिला राठौड़ का दावा है कि वीआईपी मूवमेंट वाले दिनों में किस सक्रिय नंबर से, कितनी बार दुष्यंत कुमार, रिजॉर्ट मालिकों और अन्य नेताओं से बातचीत हुई—यह सब कॉल डिटेल रिकॉर्ड से स्पष्ट हो सकता है। यदि ऐसा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच अनिवार्य है।
—इस मामले को केवल यह कहकर नहीं टाला जा सकता कि “बड़ा नेता शामिल था” या “महिला है, पहाड़ की है, इसलिए कैसे दोषी हो सकती है।” उत्तराखंड को यदि राष्ट्रीय दलों की राजनीति ने नुकसान पहुंचाया है, तो उसमें ‘अपने ही लोगों’ की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। पूरी आशंका है कि इस हत्याकांड में ऐसे चेहरे शामिल हैं जो इसी राज्य के मूल निवासी और पहाड़ी हैं।
यदि साक्ष्य मिटाने के आरोपों में घिरी इस भाजपा महिला नेता की पूरी पृष्ठभूमि की निष्पक्ष जांच हुई, तो कई चौंकाने वाले तथ्य और चेहरे सामने आ सकते हैं। इसलिए अब अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच को केवल दुष्यंत कुमार तक सीमित रखने के बजाय उर्मिला राठौड़, सुरेश राठौड़ और पूर्व जिला पंचायत सदस्य आरती गौड़ के एंगल से भी गहराई से खंगालना समय की मांग है। सच चाहे जितना भी असहज हो, न्याय के लिए उसका सामने आना अनिवार्य है।

