संपादकीय | रुद्रपुर में जनप्रतिनिधि पर हमला: कानून-व्यवस्था, राजनीति और जनता के आक्रोश की कसौटी

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रुद्रपुर। तिलक राज बहेड़ के सुपुत्र एवं पार्षद सौरभ राज बहेड़ पर हुए हमले के विरोध में आवास विकास, रुद्रपुर स्थित आवास पर महापंचायत का आयोजन किया गया। पंचायत में कानून-व्यवस्था को लेकर तीखे सवाल उठाए गए। पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल,पूर्व मेयर प्रत्याशी मोहन खेड़ा, गुलशन सिंधी मेट्रोपोलिस के अध्यक्ष देवेंद्र शाही, वरिष्ठ नेता जनार्दन सिंह,सहित बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे। महापंचायत को तिलक राज बहेड़  ने संबोधित करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल है। अपराधी बेखौफ है, हरीश मल्होत्रा ने अपराधियों पर त्वरित कार्रवाई की मांग की। कार्यक्रम का संचालन उद्योग व्यापार मंडल अध्यक्ष संजय जुनेजा ने किया।

महापंचायत के दौरान रुद्रपुर  सी ओ सिटी भी मौके पर पहुंचे। उन्होंने  विधायक तिलक राज बेहड़ से मुलाकात कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली। इसके बाद सी ओ सिटी ने महापंचायत में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि पुलिस मामले को अत्यंत गंभीरता से ले रही है। उन्होंने स्पष्ट आश्वासन दिया कि हमले से जुड़े सभी पहलुओं की गहन जांच की जा रही है और बहुत जल्द पूरे प्रकरण का खुलासा किया जाएगा। एसएसपी के आश्वासन के बाद उपस्थित लोगों में कुछ हद तक संतोष देखा गया, हालांकि जनता ने शीघ्र कार्रवाई की मांग की

रुद्रपुर नगर निगम के वार्ड–39 से निर्वाचित पार्षद सौरव राज बेहड़ पर हुआ कायरतापूर्ण हमला केवल एक व्यक्ति पर किया गया अपराध नहीं है, बल्कि यह घटना उत्तराखंड की कानून-व्यवस्था, राजनीतिक संस्कृति और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। हमले को 36 घंटे से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अभी तक न तो हमलावरों की पहचान हो सकी है और न ही किसी की गिरफ्तारी। यह स्थिति अपने-आप में चिंताजनक है और जनता के भीतर असंतोष तथा आक्रोश को जन्म दे रही है।
घटना की गंभीरता और संदर्भ
यह हमला कोई सुनसान इलाके में नहीं, बल्कि वर्तमान विधायक और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के आवास से मात्र 100 मीटर की दूरी पर हुआ। जिस शहर में सत्ता का केंद्र, प्रशासनिक अमला और पुलिस व्यवस्था इतनी निकट हो, वहां एक जनप्रतिनिधि पर इस तरह की हिंसक वारदात होना सामान्य अपराध नहीं कहा जा सकता। प्रारंभ में इसे “साधारण मारपीट” मानने की कोशिश की गई, लेकिन जब यह स्पष्ट हुआ कि पार्षद को फ्रैक्चर हुआ है, तब यह मामला स्वतः ही एक गंभीर साजिश की ओर इशारा करने लगा।
यह सवाल स्वाभाविक है कि जब एक विधायक के पुत्र, जो स्वयं निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं, सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक की सुरक्षा की क्या गारंटी है?
जनता का आक्रोश और सड़कों पर उतरती राजनीति
आज विधायक आवास पर सैकड़ों समर्थकों की मौजूदगी, मीडिया का भारी जमावड़ा और लोगों के चेहरों पर दिखता आक्रोश इस बात का प्रमाण है कि यह घटना अब व्यक्तिगत नहीं रही। यह मामला धीरे-धीरे जनाक्रोश और राजनीतिक बहस का केंद्र बनता जा रहा है। लोग केवल यह नहीं जानना चाहते कि हमला किसने किया, बल्कि यह भी पूछ रहे हैं कि—
हमलावर अब तक पुलिस की पकड़ से बाहर क्यों हैं?
क्या यह राजनीतिक दबाव, आपसी रंजिश या संगठित अपराध का मामला है?
क्या सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वालों को भी अब कानून का संरक्षण नहीं मिल पा रहा?
पुलिस की भूमिका: सक्रियता या औपचारिकता?
पुलिस प्रशासन यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता कि “जांच चल रही है”। इस तरह की संवेदनशील घटनाओं में पहले 24–48 घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इन्हीं घंटों में अपराधियों की पहचान, सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल्स और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
यदि इतने महत्वपूर्ण समय में भी पुलिस के हाथ खाली हैं, तो यह या तो जांच में ढिलाई का संकेत है या फिर किसी अदृश्य दबाव की ओर इशारा करता है।
राजनीतिक संरक्षण की आशंका
उत्तराखंड की राजनीति में यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी हमले के पीछे राजनीतिक संरक्षण की चर्चा हुई हो। बीते वर्षों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई या तो देर से हुई या फिर अधूरी रही। सौरव राज बेहड़ पर हमला भी अब उसी श्रेणी में रखा जाने लगा है।
जनता के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि क्या हमलावरों को किसी राजनीतिक छत्रछाया का भरोसा है? यदि ऐसा है, तो यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक संकेत है।

यह भी संभव है कि यह घटना किसी पूर्व नियोजित साजिश के बजाय रुद्रपुर में आमतौर पर देखे जाने वाले छोटे विवाद से भड़की हो। साइड देने, गलत दिशा में वाहन चलाने या अचानक कहासुनी जैसी स्थितियां कई बार मारपीट में बदल जाती हैं। हालांकि, चोट की गंभीरता ने इसे साधारण घटना से आगे खड़ा कर दिया है।


सोशल मीडिया पर उबाल
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म—फेसबुक, एक्स (ट्विटर), व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम—पर यह मुद्दा तेजी से वायरल हो रहा है।
पोस्टों में सवाल उठ रहे हैं:
“जब विधायक के बेटे सुरक्षित नहीं, तो आम आदमी कैसे बचेगा?”
“क्या रुद्रपुर में अपराधियों का मनोबल इतना बढ़ गया है?”
“कानून-व्यवस्था केवल कागजों में ही मजबूत है क्या?”
यह डिजिटल आक्रोश केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासन के प्रति घटते भरोसे का प्रतीक है।
पूरे उधम सिंह नगर और उत्तराखंड में हलचल
यह मामला अब रुद्रपुर तक सीमित नहीं रहा। उधम सिंह नगर से लेकर देहरादून तक राजनीतिक हलचल तेज है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष स्थिति को “अलग-थलग घटना” कहकर संभालने की कोशिश में है। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाएं अलग-थलग नहीं होतीं; ये व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को उजागर करती हैं।
जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर प्रश्न
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं। यदि वे ही असुरक्षित होंगे, तो जनहित के मुद्दे कौन उठाएगा? पार्षद सौरव राज बेहड़ पर हमला इस बात का संकेत है कि स्थानीय स्तर पर अपराधियों का मनोबल बढ़ा हुआ है और उन्हें कानून का भय नहीं रहा।
आगे की राह: केवल बयान नहीं, ठोस कार्रवाई
कल 20 जनवरी 2026 को आयोजित आपात बैठक केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। यह बैठक—
निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग,
दोषियों की शीघ्र गिरफ्तारी,
और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस रणनीति
का मंच बने, यही अपेक्षा है।

कानून-व्यवस्था पर सवाल और पुलिस की तत्परता की परीक्षा?रुद्रपुर के आवास विकास चौकी क्षेत्र में पार्षद श्री सौरभ बेहड के साथ हुई मारपीट की घटना ने न केवल स्थानीय राजनीति बल्कि आमजन की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीसीटीवी में महज छह सेकंड में अंजाम दी गई यह वारदात इस बात का संकेत है कि अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हैं और वे जनप्रतिनिधियों तक को निशाना बनाने से नहीं हिचक रहे।
घटना की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री मणिकांत मिश्रा का स्वयं अस्पताल पहुंचकर पार्षद का हालचाल लेना और दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई के निर्देश देना प्रशासनिक संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का परिचायक है। यह कदम न केवल पीड़ित के मनोबल को बढ़ाता है, बल्कि पुलिस तंत्र की सक्रियता का भी संदेश देता है।
सीसीटीवी फुटेज में स्पष्ट है कि तीन अज्ञात हमलावर योजनाबद्ध तरीके से आए, दो ने पार्षद को स्कूटी से गिराकर मारपीट की और तीसरा बाइक पर बैठा निगरानी करता रहा। यह किसी आकस्मिक झगड़े से अधिक, एक सोची-समझी आपराधिक घटना प्रतीत होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि शहर की गलियों में इस तरह की हिंसा आखिर किस संरक्षण में पनप रही है?
विधायक से बातचीत और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जांच तेज करना सराहनीय है, लेकिन जनता की अपेक्षा इससे कहीं आगे की है। अब आवश्यकता है कि आरोपियों की शीघ्र गिरफ्तारी हो, उनके पीछे के मकसद और नेटवर्क का पर्दाफाश किया जाए और ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया जाए कि भविष्य में कोई भी कानून को हाथ में लेने की हिम्मत न करे।

रुद्रपुर में आयोजित महापंचायत का सफल संचालन उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष संजय जुनेजा ने किया। उन्होंने कार्यक्रम को सुव्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाते हुए वक्ताओं को मंच प्रदान किया और जनता की भावनाओं व मुद्दों को प्रभावी रूप से सामने रखने में अहम भूमिका


यह घटना पुलिस प्रशासन के लिए एक परीक्षा भी है—केवल आश्वासन नहीं, बल्कि त्वरित और कठोर कार्रवाई ही विश्वास बहाल कर सकती है। कानून का डर और न्याय का भरोसा, दोनों एक साथ दिखने चाहिए।


सौरव राज बेहड़ पर हुआ हमला उत्तराखंड की कानून-व्यवस्था के लिए लिटमस टेस्ट है। यदि इस मामले में दोषियों को जल्द और सख्त सजा नहीं मिली, तो यह संदेश जाएगा कि अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और कानून कमजोर।
आज जनता देख रही है, मीडिया देख रहा है और पूरा प्रदेश देख रहा है कि सत्य और न्याय की इस लड़ाई में जीत किसकी होती है—अपराधियों की या कानून की।


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