देश इस समय एक ऐसे चुनावी विवाद के दौर से गुजर रहा है, जिसका सीधा संबंध लोकतंत्र की सबसे बुनियादी ताकत—मतदाता और उसका वोट—से है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दल देशभर में आंदोलन कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के माध्यम से करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध, विश्वसनीय और त्रुटिरहित बनाना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
यहां सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने का नहीं है। सवाल यह है कि भारत के लोकतंत्र में एक भी पात्र नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित न हो और एक भी अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से मतदान न करे।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।
मतदाता सूची में सफाई गलत नहीं, लेकिन तरीका पारदर्शी होना चाहिए
यदि किसी मतदाता की मृत्यु हो चुकी है, कोई व्यक्ति स्थायी रूप से अपना निवास बदल चुका है या एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है तो ऐसे नामों को मतदाता सूची से हटाना आवश्यक है। यदि चुनाव आयोग ऐसा नहीं करता तो वही राजनीतिक दल बाद में फर्जी या डुप्लीकेट मतदाताओं का आरोप लगाकर आयोग को कठघरे में खड़ा करेंगे।
इस दृष्टि से मतदाता सूची का पुनरीक्षण लोकतंत्र विरोधी कदम नहीं है।
बल्कि सही मायने में देखें तो साफ मतदाता सूची ही निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है।
लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जहां इस सफाई की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाता का नाम भी कट जाए। किसी गरीब, मजदूर, प्रवासी, किरायेदार, छात्र या ऐसे व्यक्ति का नाम केवल दस्तावेजी कठिनाई के कारण हट जाता है, जो वास्तव में उस क्षेत्र का पात्र मतदाता है, तो यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा प्रहार है।
इसलिए चुनाव आयोग की जिम्मेदारी केवल नाम हटाने की नहीं, बल्कि नाम हटाने के बाद उस व्यक्ति को सुनवाई और सुधार का अवसर देने की भी है।
13.3 करोड़ का आंकड़ा—राजनीतिक आरोप या वास्तविक संकट?
कांग्रेस और विपक्षी दलों की ओर से देशभर में करीब 13.3 करोड़ नाम मतदाता सूची से बाहर होने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा है। यह दावा राजनीतिक रूप से बेहद गंभीर है।
लेकिन लोकतांत्रिक पत्रकारिता का दायित्व है कि किसी भी राजनीतिक दावे को सीधे अंतिम सत्य न मान लिया जाए।
यदि 13.3 करोड़ नाम हटे हैं तो अगला सवाल होना चाहिए—इनमें कितने मृत मतदाता थे? कितने डुप्लीकेट थे? कितने स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए? कितने ऐसे थे जिनका पता नहीं चला? और सबसे महत्वपूर्ण—कितने वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए?
कांग्रेस को देश के सामने यह आंकड़ा रखना चाहिए।
केवल यह कहना कि करोड़ों नाम काट दिए गए, जनता में आशंका पैदा करता है। लेकिन यदि कांग्रेस के पास बूथवार और मतदाता-वार प्रमाण हैं कि वास्तविक मतदाताओं को हटाया गया है तो उसे उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए।
आंदोलन तभी मजबूत होगा जब उसके पास राजनीतिक नारे नहीं, ठोस प्रमाण होंगे।
क्या कांग्रेस का आंदोलन गलत है?
नहीं।
लोकतंत्र में विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है। विपक्ष का काम यह सुनिश्चित करना भी है कि संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने पर जनता की आवाज संसद और सड़क तक पहुंचे।
यदि किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर किया गया है तो कांग्रेस का उसके पक्ष में खड़ा होना लोकतांत्रिक रूप से उचित है।
लेकिन कांग्रेस से एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए—
क्या हर हटाया गया नाम वैध मतदाता है?
यदि नहीं, तो केवल संख्या के आधार पर पूरे SIR को लोकतंत्र विरोधी बताना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि मतदाता सूची में मृत और डुप्लीकेट नाम बनाए रखना भी लोकतंत्र के साथ अन्याय है।
इसलिए कांग्रेस को अपना आंदोलन “सभी हटे नाम वापस लाओ” के बजाय “हर पात्र मतदाता का नाम वापस लाओ” के सिद्धांत पर केंद्रित करना चाहिए।
यही अधिक मजबूत और नैतिक राजनीतिक लड़ाई होगी।
चुनाव आयोग से भी पूछे जाने चाहिए कठिन सवाल
यह संपादकीय चुनाव आयोग को भी किसी प्रकार की क्लीन चिट नहीं देता।
चुनाव आयोग देश की सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं में से एक है। इसलिए उससे पारदर्शिता की अपेक्षा सबसे अधिक है।
यदि करोड़ों नाम हटे हैं तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि कितने नाम किस कारण से हटाए गए।
क्या प्रत्येक मतदाता को सूचना दी गई?
क्या आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त समय दिया गया?
क्या BLO ने वास्तव में घर-घर जाकर सत्यापन किया?
क्या गरीब और प्रवासी मतदाताओं के लिए विशेष व्यवस्था हुई?
क्या जिन लोगों के नाम छूट गए हैं, उनके नाम जोड़ने की प्रक्रिया आसान है?
इन सवालों के जवाब चुनाव आयोग को सार्वजनिक रूप से देने चाहिए।
क्योंकि चुनाव आयोग पर भरोसा केवल उसकी संवैधानिक शक्ति से नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता से बनता है।
उत्तराखंड में बदला मतदाता गणित—राजनीतिक दलों के लिए बड़ा संकेत
उत्तराखंड की स्थिति इस पूरे विवाद को और महत्वपूर्ण बनाती है।
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश में मतदाताओं की संख्या करीब 81.72 लाख थी। SIR के बाद उपलब्ध आंकड़ों में यह संख्या काफी नीचे आई है। देहरादून जिले की दस विधानसभा सीटों में तो 2022 की तुलना में लगभग तीन लाख मतदाताओं का अंतर सामने आया है।
धर्मपुर में करीब 60 हजार, देहरादून कैंट में 45 हजार से अधिक, ऋषिकेश में 41 हजार से अधिक और रायपुर में करीब 40 हजार का अंतर सामने आना सामान्य चुनावी आंकड़ा नहीं है।
2022 में भाजपा ने देहरादून की दस में से नौ सीटों पर जीत हासिल की थी और चकराता कांग्रेस के खाते में गई थी। ऐसे में 2027 के संभावित विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता आधार में इतना बड़ा परिवर्तन राजनीतिक दलों के बूथ समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है।
लेकिन उत्तराखंड के मामले में एक दूसरा पक्ष भी है।
पलायन।
उत्तराखंड के पहाड़ों से लंबे समय से लोग रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं के लिए बाहर जा रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति स्थायी रूप से दूसरे शहर में बस चुका है तो उसका नाम पुराने स्थान की मतदाता सूची में बना रहना भी सही नहीं है।
इसलिए उत्तराखंड में मतदाता संख्या में कमी को केवल राजनीतिक साजिश कहना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पलायन के नाम पर वास्तविक मतदाता का नाम नहीं काटा जा सकता।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध क्या है?
हमारे विचार से लोकतंत्र में दो गलतियां गंभीर हैं।
पहली—ऐसे व्यक्ति को वोट देने देना जो पात्र मतदाता नहीं है।
दूसरी—ऐसे नागरिक को वोट देने से रोक देना जो वास्तव में पात्र है।
इन दोनों में से किसी एक को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यदि चुनाव आयोग अपात्र नाम हटाता है तो उसका स्वागत होना चाहिए।
यदि किसी पात्र मतदाता का नाम हटता है तो उसका विरोध होना चाहिए।
और यदि राजनीतिक दल बिना प्रमाण के हर कटे हुए नाम को वैध बताकर राजनीति करते हैं तो उनसे भी सवाल पूछा जाना चाहिए।
देशहित में रास्ता क्या है?
अब समय आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ने का है।
चुनाव आयोग को चाहिए कि वह राज्यवार और बूथवार आंकड़े सार्वजनिक करे। कितने नाम मृत होने के कारण हटे, कितने डुप्लीकेट थे, कितने स्थानांतरित मतदाता थे और कितने नाम दस्तावेज या सत्यापन की कमी के कारण विवादित हैं—यह पूरी जानकारी जनता के सामने आनी चाहिए।
राजनीतिक दलों को भी अपने बूथ एजेंटों के माध्यम से स्वतंत्र सत्यापन करना चाहिए।
जिस नागरिक का नाम छूटा है, उसे सरल और समयबद्ध तरीके से वापस जोड़ा जाए।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—मतदाता सूची को राजनीतिक हथियार नहीं, लोकतंत्र की रीढ़ माना जाए।
अंतिम सवाल
कांग्रेस आंदोलन कर रही है। उसे आंदोलन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन कांग्रेस को यह भी प्रमाणित करना होगा कि जिन नामों को हटाने का विरोध किया जा रहा है, उनमें कितने वास्तविक मतदाता हैं।
चुनाव आयोग SIR कर रहा है। उसे भी यह साबित करना होगा कि उसकी प्रक्रिया में एक भी पात्र नागरिक अन्याय का शिकार नहीं हुआ।
देश को न तो अंधा विरोध चाहिए, न अंधा समर्थन।
देश को चाहिए साफ मतदाता सूची, निष्पक्ष चुनाव और हर पात्र नागरिक का वोट।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का स्पष्ट मत है कि मतदाता सूची की सफाई देशहित में आवश्यक है, लेकिन लोकतंत्र की सफाई के नाम पर किसी नागरिक का मतदान अधिकार नहीं छीना जाना चाहिए।
राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि वोटर कोई संख्या नहीं है। वह लोकतंत्र का मालिक है।
एक गलत नाम हटना प्रशासनिक सुधार है, लेकिन एक सही मतदाता का नाम हटना लोकतांत्रिक संकट है।
इसलिए SIR पर अंतिम कसौटी केवल यही होनी चाहिए—
“सूची कितनी साफ हुई” नहीं, बल्कि “कितने पात्र नागरिक सुरक्षित बचे?”
यही सवाल चुनाव आयोग से भी पूछा जाना चाहिए और विपक्ष से भी।
अवतार सिंह बिष्ट
संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
