संपादकीय: बर्खास्त सिपाही, अथाह दौलत और सिस्टम की असहज चुप्पी

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उत्तराखंड,सुलतानपुर रोड स्थित स्वास्तिक सिटी में बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह की महलनुमा कोठी पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी केवल एक व्यक्ति विशेष की जांच नहीं है, बल्कि यह उस सड़ांध का संकेत है जो वर्षों से सिस्टम के भीतर पनपती रही है। करोड़ों के लग्जरी इंटीरियर, जमीन की अलग से मूल्यांकन प्रक्रिया, दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बरामदगी—यह सब बताता है कि मामला सिर्फ आय से अधिक संपत्ति का नहीं, बल्कि संगठित अवैध नेटवर्क का हो सकता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

ईडी को इस कोठी में प्रवेश तक के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है। जब कानून का प्रतिनिधि दरवाजे पर खड़ा हो और भीतर से दरवाजे न खुलें, तो सवाल केवल कानूनी नहीं, नैतिक और संस्थागत भी हो जाते हैं। आखिर ऐसी हिम्मत कहां से आती है? क्या यह हिम्मत केवल धन की है या फिर उस अदृश्य संरक्षण की, जो ऐसे मामलों में अक्सर दिखाई देता है?

वाराणसी में शुभम जायसवाल के ठिकानों से मिले डेढ़ करोड़ से अधिक के विदेशी ब्रांड्स, करोड़ों का फर्नीचर और आलीशान साज-सज्जा इस बात को और पुख्ता करती है कि यह एक अकेली कहानी नहीं है। 40 वाहनों में 25 टीमों का पहुंचना बताता है कि एजेंसियां भी अब इस गठजोड़ की गंभीरता को समझ रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि इतनी संपत्ति आखिर बनी कैसे?

उत्तराखंड का संदर्भ: पहाड़ में भी मैदान जैसी कहानी

यह मामला उत्तर प्रदेश का है, लेकिन इसकी परछाईं उत्तराखंड पर भी उतनी ही गहरी है। उत्तराखंड में बीते वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहां बर्खास्त  पुलिसकर्मी अचानक “संपन्न” हो जाते हैं। जमीन, होटल, ढाबे, ट्रांसपोर्ट, खनन, अवैध शराब, नशे का कारोबार—सूची लंबी है।

राज्य निर्माण के बाद उत्तराखंड ने जिस पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन का सपना देखा था, उसमें ऐसे मामलों ने बार-बार सेंध लगाई है। बर्खास्त सिपाही का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि वह कानून से बाहर चला गया। लेकिन व्यवहार में कई बार देखा गया है कि बर्खास्तगी के बाद ही अवैध साम्राज्य खुलकर सांस लेने लगता है।

अंडरवर्ल्ड से लोकल गुरुओं तक

यह कोई रहस्य नहीं है कि ऐसे तत्व अंडरवर्ल्ड से लेकर स्थानीय “गुरुओं”, प्रभावशाली नेताओं, बिल्डरों और माफिया नेटवर्क का सहारा लेते हैं। पुलिस की ट्रेनिंग, नेटवर्क और स्थानीय जानकारी उनके लिए हथियार बन जाती है। यही वजह है कि वे जानते हैं—कहां से पैसा आएगा, कैसे उसे घुमाया जाएगा और किस दरवाजे पर जाकर मामला “सेट” हो सकता है।

उत्तराखंड जैसे सीमांत राज्य में यह खतरा और बड़ा है। यहां सीमाएं, पर्यटन, धार्मिक स्थल और प्राकृतिक संसाधन—सब कुछ अवैध कमाई के लिए मुफीद माहौल बनाते हैं। अगर समय रहते जांच न हो, तो छोटे अपराध बड़े सिंडिकेट में बदल जाते हैं।

सवाल सिस्टम से भी

केवल बर्खास्त सिपाही को कटघरे में खड़ा करना पर्याप्त नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि जब वह सेवा में था, तब निगरानी क्यों नहीं हुई? आय-व्यय का मिलान, संपत्ति का समय-समय पर सत्यापन और गुप्त सूचनाओं पर कार्रवाई—ये सब कागजों में तो हैं, लेकिन जमीन पर क्यों नहीं दिखते?

उत्तराखंड में कई बार विजिलेंस जांचें शुरू तो होती हैं, लेकिन नतीजे तक पहुंचते-पहुंचते फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं। राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रशासनिक सुस्ती और “आपसी समझ” की संस्कृति जांच की धार कुंद कर देती है।

बर्खास्तगी अंत नहीं, शुरुआत हो

ईडी की यह कार्रवाई एक संदेश देती है—बर्खास्तगी अंत नहीं, बल्कि असली जांच की शुरुआत होनी चाहिए। उत्तराखंड में भी ऐसे सभी मामलों की पुनर्समीक्षा की जरूरत है, जहां बर्खास्त या निलंबित पुलिसकर्मियों की संपत्तियां असामान्य रूप से बढ़ी हैं।

सवाल यह भी है कि क्या इन संपत्तियों को कुर्क करने, अवैध धन की रिकवरी और नेटवर्क को ध्वस्त करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है? अगर नहीं, तो हर छापा सिर्फ सुर्खी बनकर रह जाएगा।

जनता की नजर और जिम्मेदारी

अंत में, यह लड़ाई केवल एजेंसियों की नहीं है। जनता की नजर, मीडिया की निर्भीकता और न्यायपालिका की सक्रियता—तीनों मिलकर ही इस गठजोड़ को तोड़ सकते हैं। उत्तराखंड देवभूमि है, लेकिन देवभूमि को लूट का मैदान बनने से बचाना होगा।

बर्खास्त सिपाही की महलनुमा कोठी हमें आईना दिखाती है—अगर आज नहीं चेते, तो कल ऐसे “महल” पूरे सिस्टम को बौना कर देंगे। अब वक्त है कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दोनों में यह सवाल जोर से पूछा जाए: यह दौलत आई कहां से, और किसकी शह पर?


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