संपादकीय: उत्तराखंड की राजनीति में ‘महिला सशक्तिकरण’ या ‘व्यक्तिगत समीकरण’? मिशन 2027 की आहट में दल-बदल का खेल

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उत्तराखंड की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ विचारधारा, जनहित और राज्य निर्माण की मूल भावना पीछे छूटती जा रही है, और व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार तथा राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई आगे निकलती दिख रही है। हाल ही में रुद्रपुर की चर्चित नेता मीना शर्मा सहित कई महिला नेताओं का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना इसी बदलते राजनीतिक चरित्र का ताजा उदाहरण है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


पहली नजर में इसे महिला सशक्तिकरण और महिला आरक्षण के मुद्दे से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। भाजपा नेतृत्व इसे महिलाओं के अधिकारों की जीत बता रहा है, तो वहीं कांग्रेस पर महिलाओं की आवाज दबाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत और राजनीतिक गलियारों की फुसफुसाहट कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
क्या यह सच में महिला सशक्तिकरण है?
यदि इस पूरे घटनाक्रम को गहराई से देखा जाए, तो सवाल उठता है कि क्या यह निर्णय वास्तव में महिला उत्पीड़न या महिला अधिकारों के लिए लिया गया है? या फिर यह केवल व्यक्तिगत असहजता और राजनीतिक टकराव का परिणाम है?
मीना शर्मा का कांग्रेस छोड़ने का निर्णय उस समय सामने आता है, जब भाजपा के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल को कांग्रेस में शामिल किया गया। यह सर्वविदित है कि मीना शर्मा और ठुकराल के बीच लंबे समय से राजनीतिक विरोध रहा है। ऐसे में यह कहना कि यह निर्णय केवल महिला सशक्तिकरण के लिए लिया गया, वास्तविकता से थोड़ा दूर प्रतीत होता है।
सोशल मीडिया का सवाल: अंकिता भंडारी को न्याय?
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम को और भी जटिल बना रही है। आम जनता सवाल उठा रही है कि क्या मीना शर्मा के भाजपा में आने के बाद बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में न्याय की प्रक्रिया तेज होगी? क्या इस मामले में शामिल सभी आरोपियों को सख्त सजा मिलेगी?
ये सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जनभावनाओं से जुड़े हुए हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब अभी भी अनिश्चितता के घेरे में है।
मिशन 2027: विचारधारा नहीं, समीकरण अहम
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरण साधने में जुट गए हैं। इस प्रक्रिया में नेताओं का दल-बदल अब एक सामान्य राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।
आज कांग्रेस से भाजपा में जाना, कल भाजपा से कांग्रेस में आना—यह सिलसिला बताता है कि विचारधारा अब प्राथमिकता नहीं रही। नेताओं के लिए “कौन सा मंच उनके राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करेगा”, यही सबसे बड़ा प्रश्न बन चुका है।
राज्य आंदोलन की मूल भावना से भटकाव
उत्तराखंड राज्य का गठन केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं हुआ था। यह राज्य बना था—जल, जंगल, जमीन, रोजगार, पलायन रोकने और स्थानीय अस्मिता को बचाने के लिए। लेकिन आज की राजनीति इन मूल मुद्दों से भटकती नजर आ रही है।
जब नेता व्यक्तिगत असहमति या राजनीतिक असहजता के कारण दल बदलते हैं, तो यह केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा नहीं होती, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक संस्कृति को भी प्रभावित करती है।
जनता के लिए संदेश क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे घटनाक्रम से जनता क्या संदेश ले?
क्या यह माना जाए कि महिला सशक्तिकरण केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह गया है?
या फिर यह कि उत्तराखंड की राजनीति अब पूरी तरह “व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं” के इर्द-गिर्द घूमने लगी है?
राजनीतिक ईमानदारी की जरूरत
यह समय है जब उत्तराखंड की जनता और राजनीतिक नेतृत्व दोनों को आत्ममंथन करने की जरूरत है। यदि राजनीति केवल व्यक्तिगत समीकरणों और अवसरवाद तक सीमित रह गई, तो राज्य की मूल अवधारणा पूरी तरह कमजोर पड़ जाएगी।
महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल दल बदलना नहीं, बल्कि नीतियों, न्याय और समान अवसरों के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाना है।
मिशन 2027 की तैयारी के बीच यह स्पष्ट होता जा रहा है कि उत्तराखंड की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है—जहाँ असली लड़ाई विचारधारा की नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व और प्रभाव की है। अब यह जनता पर निर्भर करता है कि वह इस बदलाव को स्वीकार करती है या फिर राजनीतिक दलों को उनकी मूल जिम्मेदारियों की याद दिलाती है।


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