संपादकीय:सुपरहीरो सीएम धामी और बर्बाद होता पहाड़: आपदा, राजनीति और पर्यावरण का सच”

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धराली में दर्द बाँटने पहुंचे मुख्यमंत्री धामी, पीड़ितों के आंसू पोंछने का किया प्रयास

धराली आपदा के मंजर ने पूरे उत्तराखंड को हिला दिया है। आज मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बिना किसी औपचारिकता और सरकारी तामझाम के सीधे आपदा पीड़ितों के बीच पहुंचे। जैसे ही वे गांव में दाखिल हुए, वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं। किसी ने उन्हें भाई की तरह गले लगाया, तो किसी ने बेटे की तरह आंसू बहाते हुए अपना दर्द सुनाया।अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स मुख्य संपादक उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी रुद्रपुरउत्तराखंड

मुख्यमंत्री धामी का चेहरा साफ बता रहा था कि वे भी इस त्रासदी से भीतर तक टूट गए हैं। उनके शब्दों में संवेदना और चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी। वे हर पीड़ित के पास जाकर उनकी बात सुनते रहे, ढांढस बंधाते रहे और भरोसा दिलाते रहे कि सरकार की पूरी ताकत राहत और बचाव में लगी है।

उन्होंने कहा, “आपका दर्द मेरा अपना दर्द है। हर संभव कोशिश की जाएगी कि लापता लोगों को ढूंढा जाए और आपको जल्द से जल्द राहत मिले।” मुख्यमंत्री ने मौके पर मौजूद अधिकारियों को भी निर्देश दिए कि कोई भी प्रभावित परिवार मदद से वंचित न रहे।

धराली के लोग शायद पहली बार किसी मुख्यमंत्री को इस तरह नज़दीक से अपना दुःख बांटते देख रहे थे। वहां न मंच था, न भाषण, सिर्फ इंसानियत और संवेदना का साथ था। मुख्यमंत्री का यह भावनात्मक दौरा पीड़ितों के लिए मनोबल बढ़ाने वाला रहा, जिसने उन्हें यह भरोसा दिलाया कि वे इस आपदा में अकेले नहीं हैं, बल्कि पूरा प्रदेश उनके साथ खड़ा है।



भूमिका: आपदा के बीच उम्मीद का चेहरा?उत्तराखंड की धरती पर जब-जब प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया है, तब-तब यहां के लोग लहूलुहान हुए हैं। पहाड़ों के गांवों से लेकर तराई के कस्बों तक, बरसात का मौसम किसी त्योहार की तरह नहीं बल्कि चिंता के मौसम के रूप में आता है। इस बार भी ऐसा ही हुआ—धराली, हर्षिल, पौड़ी गढ़वाल का सैंजी गांव, थलीसैंण और बाकुड़ा, सब जगह कुदरत ने कहर बरपाया।✍️अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी

मूसलधार बारिश, भूस्खलन, गदेरे का उफान और बादल फटने जैसी घटनाओं ने दर्जनों परिवारों को उजाड़ दिया। सड़कें टूटीं, पुल ढहे, लोग मलबे में दब गए, मवेशी बह गए। हर तरफ से मदद की पुकार उठ रही थी। लेकिन इस हताशा और भय के बीच एक चेहरा उम्मीद बनकर सामने आया—मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी।

जहां बाकी नेता और मंत्री सुरक्षित इमारतों में बयान जारी करने तक सीमित रहे, वहीं धामी ने अपना आंध्र प्रदेश दौरा बीच में छोड़कर सीधा राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र का रुख किया। उन्होंने फोन पर नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर राहत कार्यों की बागडोर संभाली। यह दृश्य उस उत्तराखंड में दुर्लभ है, जहां नेताओं का आपदा-प्रबंधन आमतौर पर फोटो सेशन और हेलीकॉप्टर सर्वे तक ही सीमित रहता है।


रेस्क्यू ऑपरेशन की गाथा?05 अगस्त को शाम तक 130 से अधिक लोगों को सुरक्षित रेस्क्यू किया जा चुका था, लेकिन मुख्यमंत्री ने यहीं रुकने का नाम नहीं लिया। उन्होंने सेना, NIM, SDRF और पुलिस को मिलाकर एक संयुक्त अभियान चलाया।

  • शासन स्तर पर तीन नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
  • 300 से अधिक पुलिसकर्मी, दो IG, तीन SP और 11 DSP मौके पर भेजे गए।
  • 20 करोड़ रुपये की आपदा राहत राशि तत्काल जारी हुई।
  • हेलीकॉप्टर शटल सेवा शुरू की गई—UCADA के 8 हेलीकॉप्टरों ने 274 लोगों को सुरक्षित पहुंचाया।
  • राहत शिविरों में भोजन, आश्रय, चिकित्सा की व्यवस्था का आदेश तत्काल दिया गया।
  • सेना के MI-17 और चिनूक हेलीकॉप्टर चंडीगढ़, सरसावा और आगरा से बुलाए गए।

इन सभी निर्णयों में सबसे अहम यह था कि मुख्यमंत्री स्वयं दो दिन तक धराली और हर्षिल में कैंप करते रहे। इससे न केवल प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय रही, बल्कि प्रभावितों में यह भरोसा भी जगा कि सरकार सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि उनके साथ खड़ी है।


बाकी जनप्रतिनिधियों की चुप्पी?यह सवाल टालना मुश्किल है कि जब मुख्यमंत्री खुद पहाड़ के दूरदराज इलाकों में राहत कार्य देख सकते हैं, तो अन्य मंत्री और विधायक क्यों नहीं? आपदा के वक्त जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि सिर्फ टीवी पर बयान देते दिखते हैं या फिर सोशल मीडिया पर संवेदनाएं प्रकट करते।

उत्तरकाशी, पौड़ी और चमोली जैसे जिलों में हाल की आपदाओं में शायद ही किसी बड़े मंत्री की现场 मौजूदगी दिखी हो। यह निष्क्रियता बताती है कि प्रदेश में आपदा प्रबंधन अब भी ‘सीएम सेंट्रिक’ है, जबकि इसे ‘सिस्टम सेंट्रिक’ होना चाहिए।


उत्तराखंड: एक आपदा हॉटस्पॉट?पिछले 9 वर्षों के आंकड़े डरावने हैं:

  • अतिवृष्टि और त्वरित बाढ़: 12,758 घटनाएं
  • भूस्खलन: 4,654
  • हिमस्खलन: 92
  • आंधी-तूफान: 634
  • व्रजपात: 259
  • बादल फटना: 67

इनमें सबसे अधिक घटनाएं पौड़ी में दर्ज हुईं, जबकि उत्तरकाशी दूसरे नंबर पर रहा। यह स्थिति बताती है कि पूरा राज्य एक ‘आपदा प्रयोगशाला’ बन चुका है, जहां प्रकृति का हर वार पहले से ज्यादा गहरा लगता है।


विकास के नाम पर विनाश?उत्तराखंड में विकास का अर्थ अब ‘सड़क चौड़ीकरण’, ‘बड़े होटल’, ‘हाइड्रो प्रोजेक्ट’ और ‘रियल एस्टेट कॉलोनियां’ बन चुका है। लेकिन इस विकास के पीछे जो कीमत चुकाई जा रही है, उस पर शायद ही कोई चर्चा करता है।

  • पहाड़ की ढलानों पर ब्लास्टिंग से कटान और भूस्खलन बढ़ा।
  • जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने मिट्टी को बांधने वाली जड़ों को खत्म किया।
  • नदियों के किनारों पर अतिक्रमण ने बाढ़ के बहाव को तेज किया।
  • बाहरी राज्यों के ठेकेदारों ने मुनाफे के लिए पर्यावरणीय मानकों की धज्जियां उड़ाईं

गुजरात और हरियाणा के ठेकेदारों का वर्चस्व यहां नया नहीं है। सड़क निर्माण से लेकर टनल प्रोजेक्ट तक, इन कंपनियों ने ‘डेडलाइन’ और ‘प्रॉफिट’ के आगे पहाड़ की नाजुक पारिस्थितिकी को नजरअंदाज किया।


पर्यावरण चेतावनियों की अनसुनी पुकार?वाडिया इंस्टीट्यूट, NGT और कई वैज्ञानिक संस्थाएं सालों से चेतावनी देती रही हैं कि हिमालयी क्षेत्र में भारी मशीनरी और बड़े पैमाने पर कटान से आपदाओं का खतरा कई गुना बढ़ रहा है। लेकिन हर रिपोर्ट फाइलों में दब जाती है।

कई जगहों पर तो EIA (Environmental Impact Assessment) रिपोर्ट को भी ठेकेदारों के पक्ष में मोड़ा गया, ताकि परियोजना में कोई अड़चन न आए।


जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आपदाएं?ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, मानसून का पैटर्न बदल रहा है और पर्वतीय जल स्रोत सूख रहे हैं। नतीजा—बारिश या तो बिल्कुल नहीं होती, या फिर इतनी होती है कि पूरा गांव बहा ले जाए।उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का असर अब आंकड़ों से नहीं, बल्कि हर साल के ‘ग्राउंड जीरो’ अनुभव से समझा जा सकता है।


समाधान की राह

  • पूर्व चेतावनी प्रणाली को गांव स्तर तक मजबूत करना।
  • स्थानीय आपदा प्रबंधन दल को प्रशिक्षित करना।
  • ईको-फ्रेंडली विकास—छोटे, टिकाऊ और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप प्रोजेक्ट।
  • ठेकेदार-राजनीति गठजोड़ पर कानूनी कार्रवाई
  • स्कूल और पंचायत स्तर पर आपदा प्रशिक्षण अनिवार्य करना।
  • पर्यटन और उद्योग में पर्यावरणीय प्रमाणन प्रणाली लागू करना।

एक नेता, एक चेतावनी, एक रास्ता?मुख्यमंत्री धामी ने दिखा दिया कि संकट के समय तेज फैसले, जमीनी उपस्थिति और मानवीय संवेदना कितनी अहम है। लेकिन यह भी सच है कि उनका यह जज्बा पूरे सिस्टम में उतरे बिना कोई स्थायी बदलाव नहीं आएगा।उत्तराखंड के पहाड़ आज विकास और विनाश के चौराहे पर खड़े हैं। अगर अभी भी हमने ठेकेदारों और राजनीतिक मुनाफाखोरी को रोककर प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बैठाया, तो आने वाले वर्षों में ‘आपदा’ हमारी नई पहचान बन जाएगी।

मुख्यमंत्री धामी ने इस बार ‘सुपरहीरो’ की तरह संकट को संभाला—अब जरूरत है कि बाकी सिस्टम भी जागे और पहाड़ को बचाने की जंग में साथ खड़ा हो। क्योंकि पहाड़ बचेंगे, तभी उत्तराखंड बचेगा।



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