संपादकीय | अवैध कॉलोनियों पर बुलडोजर नहीं, कानून की दस्तक — धामी सरकार की निर्णायक पहल सराहनीय

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उत्तराखंड के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षों से पनप रही अवैध कॉलोनियों की बीमारी अब उस मुकाम पर पहुँच चुकी थी, जहाँ आम आदमी की गाढ़ी कमाई भी दांव पर लग रही थी और राज्य का राजस्व भी। ऊधमसिंह नगर जिले में 900 से अधिक कॉलोनियों को अवैध घोषित कर जिला विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा निर्माण पर रोक लगाना एक कठोर लेकिन अत्यंत आवश्यक कदम है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच उठ रहा जनाक्रोश, राजनीतिक बयानबाजी और कॉलोनाइजरों की चालबाज़ रणनीति — सब कुछ आज उत्तराखंड की शहरी व्यवस्था के असली चेहरे को बेनकाब कर रहा है। ऐसे में धामी सरकार और प्रशासन का यह रुख कि “अब अवैध कॉलोनियों का खेल नहीं चलेगा”, न सिर्फ स्वागत योग्य है बल्कि ऐतिहासिक भी है।

“ग्रामीणों” के भेष में कॉलोनाइजर, असली पीड़ित आम जनता

डीडीए के खिलाफ जो नारेबाजी हो रही है, उसमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं जो खुद प्लॉट काटने वाले, भूमाफिया या कॉलोनाइजर हैं। ये वही लोग हैं जो वर्षों से ग्रामीण इलाकों की कमजोर कानूनी व्यवस्था का फायदा उठाकर 15-20-22 फीट की नकली सड़कों पर प्लॉट बेचते रहे, पार्क भी बेच डाले, न निकासी छोड़ी, न पानी और बिजली की कोई स्थायी व्यवस्था की। जब सब कुछ बेच दिया जाता है, तब सड़क और मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों और सरकार पर छोड़ दी जाती है।

असल पीड़ित वह आम आदमी है जिसने अपनी जीवनभर की कमाई एक प्लॉट में लगा दी — बिना यह जाने कि वह जमीन कल “अवैध” करार दे दी जाएगी। यह सामाजिक त्रासदी सिर्फ रुद्रपुर की नहीं, पूरे उत्तराखंड की है।

धामी सरकार का सख्त रुख: देर से सही, दुरुस्त

यह सच है कि जब ये कॉलोनियां कट रही थीं, तब स्थानीय स्तर पर आंखें बंद थीं। लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि अब धामी सरकार ने इस पूरे गोरखधंधे पर लगाम लगाने की ठान ली है। पहले 143 की बेतरतीब कॉलोनियों पर रोक, फिर ग्रामीण क्षेत्रों में भी कानून का विस्तार, और अब अवैध कॉलोनियों पर सीधी कार्रवाई — यह सब इस बात का संकेत है कि सरकार अब “सेटिंग सिस्टम” के बजाय “कानून के सिस्टम” को प्राथमिकता दे रही है।

हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स में पहले भी इस स्टांप घोटाले, रास्तों की फर्जी दिखावट, और दाखिल-खारिज की मिलीभगत पर खबरें प्रकाशित होती रही हैं। सरकार द्वारा उन पर संज्ञान लेना और अब ज़मीनी कार्रवाई शुरू होना इस बात का प्रमाण है कि मीडिया की भूमिका और सरकार की मंशा, दोनों सही दिशा में हैं।

हाईकोर्ट का सख्त रुख: सरकारी जमीन की लूट पर करारा तमाचा

रुद्रपुर की नजूल भूमि से जुड़ा मामला, जिसमें 4.07 एकड़ तालाब भूमि को फर्जी तरीके से फ्रीहोल्ड कर सैकड़ों करोड़ के मॉल की तैयारी थी — उस पर हाईकोर्ट की रोक एक ऐतिहासिक फैसला है। यह आदेश सीधा संदेश देता है कि:

सरकारी जमीन अब किसी माफिया की निजी जागीर नहीं रहेगी।”

यह केवल एक मामले की सुनवाई नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए एक चेतावनी है कि जल निकायों, नजूल भूमि और सरकारी संपत्तियों से अब समझौता नहीं होगा।

जनता का आक्रोश बनाम माफिया का दबाव

आज सड़कों पर जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें वास्तविक पीड़ा भी है और सुनियोजित दबाव भी। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की समस्याओं का समाधान निकाला जाना चाहिए — इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन इसके आड़ में कॉलोनाइजरों को खुली छूट देना राज्य के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।

राजकुमार ठुकराल, भुवन कापड़ी, मीना शर्मा जैसे नेताओं की टिप्पणियाँ अपने-अपने राजनीतिक नजरिये से सही हो सकती हैं, लेकिन असली सवाल यह है —

क्या राज्य को अवैधता के साथ समझौता करना चाहिए?उत्तर स्पष्ट है — नहीं।

संतुलन जरूरी, लेकिन कानून सर्वोपरि

धामी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि:

  • आम आदमी को न्याय मिले,
  • और कॉलोनाइजरों को संरक्षण न मिले।

इसके लिए आवश्यक है कि—

  • प्लॉट खरीद चुके लोगों के लिए वन टाइम सेटलमेंट, सरल मानचित्र स्वीकृति जैसी मानवीय नीतियाँ बनें।
  • लेकिन अवैध कॉलोनियों पर भविष्य में शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) नीति लागू हो।
  • अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई नहीं, यह राज्य को बचाने की लड़ाई है
  • भूमाफिया बेनकाब होंगे
    हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स की लगातार खबरों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। ग्रामीण कॉलोनियों के नाम पर गरीब, मध्यमवर्गीय और पर्वतीय परिवारों को ढाल बनाकर वर्षों से पनप रहे भूमाफियाओं की जड़ें हिलने लगी हैं। डीडीए की कार्रवाई के पीछे असली खेल कौन खेल रहा है, यह सवाल अब पूरे जिले में गूंज रहा है। हमारी अगली रिपोर्ट में “भूमाफिया का सरगना कौन?” इसका नाम, चेहरा और नेटवर्क सामने लाया जाएगा। जनता के अधिकारों से खिलवाड़ करने वाले अब किसी भी कीमत पर बख्शे नहीं जाएंगे। यह सिर्फ शुरुआत है, अंजाम अभी बाकी है।

डीडीए और जिला प्रशासन की वर्तमान कार्रवाई को केवल “नोटिस और सीलिंग” की कार्रवाई कहकर खारिज करना न्यायसंगत नहीं होगा। यह उत्तराखंड के भविष्य को अराजक शहरीकरण से बचाने की लड़ाई है। यह लड़ाई उस सिस्टम के खिलाफ है जो वर्षों से—

  • आम आदमी को ठगता रहा,
  • सरकारी जमीन लूटता रहा,
  • और कानून को कागज़ बनाकर बेचता रहा।
  • हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का असर | भू-माफिया की नकाबपोशी, कानून का पाठ पढ़ा गया
    रुद्रपुर जिला विकास प्राधिकरण में हाल ही में पहुंचे पूर्व प्रजापति हरीश पटेल व उसके समर्थक खुद को ग्रामीण, गरीब और पीड़ित बताकर प्रशासन पर दबाव बनाने पहुंचे थे। लेकिन जांच में यह साफ हो गया कि वहां मौजूद अधिकांश लोग न तो ग्रामीण थे और न ही प्लॉट खरीदार, बल्कि वे पुराने भू माफिया और नए भू-माफिया नेटवर्क से जुड़े लोग थे। हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित खबरों के बाद प्राधिकरण हरकत में आया और शीर्ष अधिकारी ने उन्हें साफ शब्दों में कानून का पाठ पढ़ा दिया। चेतावनी दी कि अवैध गतिविधियों पर अब सीधी कार्रवाई होगी। इससे भू-माफिया खेमे में हड़कंप मच गया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने जिस राजनीतिक जोखिम के साथ इस गोरखधंधे पर हाथ डाला है, वह साहसिक भी है और दूरदर्शी भी। अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार मानवीय समाधान और कानूनी सख्ती — दोनों के बीच संतुलन बनाए, ताकि न गरीब उजड़े, न माफिया बचे।

उत्तराखंड की जनता अब यही चाहती है —
कानून सबके लिए बराबर हो, और माफिया कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून से बड़ा न हो।


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