

बोरागाढ़, चमोली जिले के चेपड़ों गांव में आई आपदा ने एक बार फिर उत्तराखंड की असहाय स्थिति को सामने ला खड़ा किया है। गांव के लोगों की सतर्कता और टुनरी गांव से मिली चेतावनी इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय जनता अपनी सुरक्षा को लेकर सजग थी, लेकिन हमारे प्रशासन और आपदा प्रबंधन तंत्र की कमजोरी ने पूरे क्षेत्र को तबाही के हवाले कर दिया।

चमोली जिले के बोरागाढ़ क्षेत्र के चेपड़ों गांव में आई आपदा ने एक बार फिर उत्तराखंड की असहाय स्थिति को उजागर कर दिया है। टुनरी गांव से चेतावनी मिलने के बाद ग्रामीणों ने खतरे को भांपकर बाजार की ओर रुख किया, लेकिन अचानक आए सैलाब ने उनकी जिंदगी की कमाई—वाहन, दुकानें और जरूरी कागजात—सबको बहा दिया। देवी जोशी और अन्य पीड़ितों की दास्तान दिल दहला देने वाली है। गंगादत्त जोशी अब भी लापता हैं, जो यह साबित करता है कि प्रशासनिक लापरवाही को सिर्फ “कुदरत का कहर” कहकर नहीं टाला जा सकता।

पंचायत घर, पुल और दुकानों का बहना यह दर्शाता है कि विकास कार्य स्थानीय भूगोल की अनदेखी कर किए गए। हर आपदा के बाद की तरह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राहत राशि की घोषणा की है—मृतकों के परिजनों को 5 लाख और मकान क्षतिग्रस्त होने पर सहायता। लेकिन असली सवाल है कि रोकथाम पर ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जाते?
स्थानीय महिलाएं——ने अपनी आजीविका उजड़ते देखी। उनके छोटे कारोबार और किराए के कमरे अब मलबे में बदल चुके हैं। यह त्रासदी बताती है कि आपदा सबसे ज्यादा गरीब और मेहनतकश वर्ग को प्रभावित करती है।

जरूरत है कि आपदा प्रबंधन विभाग केवल कागजी योजनाओं से आगे बढ़े। स्थानीय चेतावनियों को तकनीकी प्रणाली से जोड़ा जाए, नदी-नालों के किनारे अंधाधुंध निर्माण रोका जाए और स्थायी पुनर्वास नीति लागू हो। चेपड़ों का सबक साफ है—प्रकृति की अनदेखी हर साल तबाही लाएगी। अब वक्त है कि सरकार जमीनी हकीकत में आपदा प्रबंधन को उतारे।
चेपड़ों गांव की इस त्रासदी का वीडियो स्थानीय निवासी रणजीत सिंह भंडारी ने हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स परिवार को भेजा है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि उत्तराखंड सरकार शीघ्र त्रासदी से पीड़ित लोगों को मुआवजा व आर्थिक सहायता करें।
गांव के 30 से अधिक लोग समय रहते खतरे को भांप कर बाजार की ओर भागे। वे अपने जीवन की कमाई—वाहनों, दुकानों का सामान और जरूरी कागजात—को सुरक्षित करना चाहते थे। लेकिन अचानक आए सैलाब ने उनकी सारी कोशिशों को ध्वस्त कर दिया। यह दृश्य केवल एक प्राकृतिक त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत विफलताओं का आईना है।
देवी जोशी और अन्य ग्रामीणों की दास्तान हमें भीतर तक झकझोर देती है। उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने परिवार और गांव को बहते देखा। गंगादत्त जोशी अब भी लापता हैं और यह लापरवाही केवल “कुदरत का कहर” कहकर टाली नहीं जा सकती। सवाल उठता है कि अगर गांववालों को खतरे की आहट हो सकती थी, तो प्रशासनिक मशीनरी को क्यों नहीं?

पुल, पंचायत घर और दुकानों का बह जाना केवल भौतिक नुकसान नहीं है, यह उस विकास मॉडल की भी पोल खोलता है जिसमें स्थानीय भूगोल और जलधाराओं को नजरअंदाज कर निर्माण किए जाते हैं। हर आपदा के बाद सरकार राहत पैकेज और मुआवजे की घोषणा कर देती है—मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मृतकों के परिजनों को 5 लाख और क्षतिग्रस्त मकानों के लिए सहायता का ऐलान किया है। लेकिन क्या कभी यह सोचा गया कि राहत के बजाए रोकथाम पर गंभीरता से काम क्यों नहीं किया जाता?
स्थानीय महिलाएं—कमला जोशी और आशा देवी—की पीड़ा यह दर्शाती है कि आपदा सबसे पहले गरीब और मेहनतकश लोगों की आजीविका को लील जाती है। उनके छोटे-छोटे कारोबार और किराए के कमरे ही जीवन-निर्वाह का आधार थे, जो अब मलबे में बदल गए हैं।
आज जरूरत है कि उत्तराखंड की सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग आपदाओं को केवल “प्राकृतिक” कहकर पल्ला न झाड़ें। हमें स्थानीय चेतावनियों को तकनीकी चेतावनी प्रणाली से जोड़ना होगा, नदी-नालों के किनारे अनियंत्रित निर्माण को सख्ती से रोकना होगा और आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लिए एक स्थायी पुनर्वास नीति बनानी होगी।
चेपड़ों की त्रासदी हमें यही सिखाती है कि यदि हम प्रकृति को नजरअंदाज करेंगे तो हर बरसात, हर बादलफटाव और हर सैलाब उत्तराखंड के गांवों को तबाह करता रहेगा। अब वक्त है कि सरकार आपदा प्रबंधन को कागजी घोषणाओं से बाहर निकाल कर जमीनी हकीकत में बदल दे। तभी सचमुच कहा जा सकेगा कि हम अपने पहाड़ और अपने लोगों के साथ खड़े हैं।




