संपादकीय | स्वामी इंद्रमणि बडोनी जयंतीइंद्रमणि बडोनी: उत्तराखंड राज्य आंदोलन की आत्मा, ‘पहाड़ के गांधी’ को विनम्र श्रद्धांजलि

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उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में यदि किसी एक व्यक्तित्व को उसकी आत्मा कहा जाए, तो वह नाम स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी का है। सादगी, त्याग, सत्याग्रह और अहिंसा के प्रतीक बडोनी ने पहाड़ के स्वाभिमान को आवाज़ दी और अलग राज्य की अवधारणा को जन-जन का आंदोलन बनाया। उनकी जयंती पर संपूर्ण उत्तराखंड उन्हें कोटिशः श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


इंद्रमणि बडोनी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे पहाड़ की पीड़ा, उपेक्षा और संघर्ष की जीवित चेतना थे। सत्ता, पद और सुविधाओं से दूर रहकर उन्होंने जिस नैतिक राजनीति की परंपरा स्थापित की, वह आज भी प्रेरणा का स्रोत है। इसी कारण उन्हें श्रद्धापूर्वक “पहाड़ का गांधी” कहा गया।
प्रारंभिक जीवन और वैचारिक आधार
24 दिसंबर 1925 को टिहरी जनपद के मलेथा क्षेत्र में जन्मे इंद्रमणि बडोनी का जीवन पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और अभावों के बीच बीता। बचपन से ही उन्होंने पहाड़ के लोगों के साथ हो रहे अन्याय, पलायन, बेरोजगारी और विकास की असमानता को नजदीक से देखा। यही अनुभव उनके वैचारिक निर्माण की नींव बने।
वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान मैदानों से संचालित शासन व्यवस्था से संभव नहीं है। अलग राज्य ही पहाड़ की अस्मिता, संसाधनों और भविष्य की रक्षा कर सकता है।
उत्तराखंड क्रांति दल और आंदोलन की दिशा
वर्ष 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाकर इंद्रमणि बडोनी ने आंदोलन को संगठित स्वर दिया। यह दल केवल एक राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि पहाड़ के आत्मसम्मान का प्रतीक बना।
उनके साथ बिपिन चंद्र त्रिपाठी, प्रो. देवी दत्त पंत, काशी सिंह ऐरी, भुवन चंद्र जोशी, बीना बहुगुणा, जसवंत सिंह बिष्ट, नारायण सिंह जंतवाल, उधम सिंह नगर से दीवान सिंह बिष्ट, आनंद सिंह असगोला,अवतार सिंह बिष्ट, ललित कांडपाल, विक्की पाठक, पूरन सिंह परिहार, ब्रजवीर चौधरी, कन्हैयालाल, आदि हरिदत्त बहुगुणा, रंजीत विश्वकर्मा सहित अनेक चिंतक और आंदोलनकारी जुड़े, जिन्होंने आंदोलन को वैचारिक मजबूती और जनसमर्थन दिया।
105 दिन की ऐतिहासिक पदयात्रा
1988 की 105 दिन लंबी पदयात्रा उत्तराखंड राज्य आंदोलन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। गांव-गांव, घर-घर जाकर बडोनी ने लोगों को समझाया कि अलग राज्य कोई राजनीतिक सौदा नहीं, बल्कि पहाड़ के अस्तित्व की आवश्यकता है। इस पदयात्रा ने उत्तराखंड के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित किया।
गैरसैंण और आमरण अनशन
1992 में गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी घोषित करने की उनकी वैचारिक घोषणा दूरदर्शिता का प्रतीक थी। 1994 में किया गया उनका आमरण अनशन आंदोलन का नैतिक शिखर बना, जिसने शासन-प्रशासन को गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया और राज्य निर्माण की प्रक्रिया को गति मिली।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
बडोनी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने आंदोलन के दिनों में थे। पलायन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और संसाधनों की लूट से जूझ रहे उत्तराखंड को उनके विचार फिर से दिशा दे सकते हैं। इसी क्रम में 2 अक्टूबर 2025 को पिथौरागढ़ जिले के कनालीछीना और डीडीहाट विकासखंड के स्कूलों में उनकी तस्वीर लगाए जाने का निर्णय नई पीढ़ी को उनके संघर्ष और मूल्यों से जोड़ने की सार्थक पहल है।
निष्कर्ष
स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी केवल एक नाम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की चेतना हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्चे जनआंदोलन सत्ता से नहीं, बल्कि संकल्प, सत्य और त्याग से जीते जाते हैं।
उत्तराखंड भले आज अपने मूल उद्देश्यों से भटकता दिखे, लेकिन जब भी राज्य को सही दिशा की आवश्यकता होगी, इंद्रमणि बडोनी का विचार उसे रास्ता दिखाएगा।
इंद्रमणि बडोनी अमर हैं—
संघर्ष में, विचार में और पहाड़ की आत्मा में।


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