संपादकीय– बीजेपी का खौफनाक चेहरा! यूसीसी-यूजीसी और ‘फूट डालो, राज करो’ की नई राजनीति?यूसीसी और लोकतंत्र की चुप्पी?

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बीजेपी का खौफनाक चेहरा: यूसीसी-यूजीसी और ‘फूट डालो, राज करो’ की नई राजनीति
भारतीय जनता पार्टी स्वयं को राष्ट्रवाद और समानता की पक्षधर बताती है, लेकिन यूसीसी और यूजीसी जैसे मुद्दों पर उसका असली चेहरा धीरे-धीरे सामने आ रहा है। यह चेहरा कानून का नहीं, बल्कि फूट डालो और राज करो की उसी ब्रिटिश मानसिकता का है, जिसे आज़ादी के बाद दफन हो जाना चाहिए था।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


यूसीसी और यूजीसी को सुधार के नाम पर पेश किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि इन्हें समाज को बाँटने के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी “समर्थक बनाम राष्ट्रविरोधी” की खतरनाक लाइन खींचकर जनता को आपस में भिड़ाया जा रहा है। सवाल पूछने वाला देशद्रोही और चुप रहने वाला राष्ट्रभक्त घोषित किया जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति साफ है—जो समाज संगठित है, उससे सौदेबाज़ी; जो बिखरा है, उसे डराकर या भ्रमित कर समर्थन। यूसीसी-यूजीसी पर खुली बहस से बचना, मसौदे को अस्पष्ट रखना और सोशल मीडिया के ज़रिए माहौल बनाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि प्रबंधित सहमति का खेल है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि इन कानूनों को लागू करने से पहले सामाजिक विश्वास बनाने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की गई। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में यह प्रयोग समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ सकता है। लेकिन सत्ता को इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि विभाजित समाज ही सबसे आसान शिकार होता है।
आज सवाल यूसीसी या यूजीसी का नहीं है, सवाल यह है कि क्या देश को फिर से उसी रास्ते पर ले जाया जा रहा है, जहाँ सत्ता की कुर्सी बचाने के लिए समाज की एकता की बलि दी जाती है। इतिहास गवाह है—फूट डालकर राज तो किया जा सकता है, लेकिन राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।

सवाल यह है कि किस कीमत पर। कहीं ऐसा न हो कि व्यवस्था सुधारने के नाम पर सरकार खुद वैसी ही भ्रमित, विरोधाभासी और आत्मघाती नीतियों की राह पर चल पड़े, जिनके लिए वह अब तक कांग्रेस पर तंज कसती रही है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC कानून पर केवल 19 मार्च तक की अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कानून को समाप्त नहीं किया गया है, बल्कि सिर्फ अस्थायी राहत दी गई है। ऐसे में आंदोलनकारियों का मानना है कि जब तक यह कानून पूरी तरह वापस नहीं लिया जाता, तब तक संघर्ष को रोकना आत्मघाती होगा।
यह मुद्दा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक बन चुका है, जहां एक बड़ा वर्ग इसे अधिकारों और पहचान से जोड़कर देख रहा है।

रुद्रपुर,उत्तराखंड भारत बीजेपी का खौफनाक चेहरा: यूसीसी-यूजीसी और ‘फूट डालो, राज करो’ की नई राजनीति
भारतीय जनता पार्टी स्वयं को राष्ट्रवाद और समानता की पक्षधर बताती है, लेकिन यूसीसी और यूजीसी जैसे मुद्दों पर उसका असली चेहरा धीरे-धीरे सामने आ रहा है। यह चेहरा कानून का नहीं, बल्कि फूट डालो और राज करो की उसी ब्रिटिश मानसिकता का है, जिसे आज़ादी के बाद दफन हो जाना चाहिए था।
यूसीसी और यूजीसी को सुधार के नाम पर पेश किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि इन्हें समाज को बाँटने के औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी “समर्थक बनाम राष्ट्रविरोधी” की खतरनाक लाइन खींचकर जनता को आपस में भिड़ाया जा रहा है। सवाल पूछने वाला देशद्रोही और चुप रहने वाला राष्ट्रभक्त घोषित किया जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति साफ है—जो समाज संगठित है, उससे सौदेबाज़ी; जो बिखरा है, उसे डराकर या भ्रमित कर समर्थन। यूसीसी-यूजीसी पर खुली बहस से बचना, मसौदे को अस्पष्ट रखना और सोशल मीडिया के ज़रिए माहौल बनाना इसी रणनीति का हिस्सा है। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि प्रबंधित सहमति का खेल है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि इन कानूनों को लागू करने से पहले सामाजिक विश्वास बनाने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं की गई। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में यह प्रयोग समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ सकता है। लेकिन सत्ता को इससे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि विभाजित समाज ही सबसे आसान शिकार होता है।
आज सवाल यूसीसी या यूजीसी का नहीं है, सवाल यह है कि क्या देश को फिर से उसी रास्ते पर ले जाया जा रहा है, जहाँ सत्ता की कुर्सी बचाने के लिए समाज की एकता की बलि दी जाती है। इतिहास गवाह है—फूट डालकर राज तो किया जा सकता है, लेकिन राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता।

यूसीसी और जातीय राजनीति का असहज सच
यूसीसी को समानता का कानून बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इसकी राजनीति जातीय संतुलन के इर्द-गिर्द घूम रही है। भारत और विशेषकर उत्तराखंड जैसे राज्य में समाज केवल “नागरिक” नहीं, बल्कि जातीय संरचनाओं में भी जीता है। ऐसे में यूसीसी का असर सभी पर समान होगा—यह मान लेना एक राजनीतिक भ्रम से अधिक कुछ नहीं है।
वास्तविकता यह है कि जिन जातियों के पास संगठित सामाजिक ढाँचा है, वे यूसीसी पर अपनी शर्तें रख पा रही हैं, जबकि बिखरे समाजों से मौन समर्थन की अपेक्षा की जा रही है। यह वही पुराना राजनीतिक फार्मूला है—संगठित बोलेंगे, असंगठित मान लिए जाएंगे।
जातीय संगठनों की भूमिका यहाँ निर्णायक बनती है। ब्राह्मण, वैश्य और दलित समाज अपने-अपने मंचों से प्रतिक्रिया दे रहे हैं, लेकिन क्षत्रिय जैसे समाज अब भी राजनीतिक रूप से स्पष्ट आवाज़ के अभाव में हाशिये पर हैं। यही असंतुलन भविष्य में सामाजिक टकराव को जन्म दे सकता है।
यदि यूसीसी वास्तव में समानता का कानून है, तो उसे जातीय वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अन्यथा यह कानून समानता का नहीं, बल्कि जातीय असंतोष का कारण बनेगा। लोकतंत्र में कानून तभी टिकता है, जब हर जाति स्वयं को उसमें सुरक्षित महसूस करे।

उत्तराखंड,यूसीसी को लेकर सरकार का रवैया पारदर्शिता से अधिक परीक्षण जैसा प्रतीत होता है। न तो विस्तृत मसौदे पर खुली चर्चा हुई, न ही समाज के सभी वर्गों को विश्वास में लिया गया। लोकतंत्र में कानून थोपे नहीं जाते, सहमति से बनते हैं। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील सामाजिक ताने-बाने वाले राज्य में यूसीसी केवल कानूनी विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का प्रश्न है।
विडंबना यह है कि सरकार समर्थक वर्गों से “स्वाभाविक समर्थन” की अपेक्षा की जा रही है, जबकि आशंकाओं को “अफवाह” कहकर टाल दिया गया। इतिहास बताता है कि जब-जब समाज की आशंकाओं को अनसुना किया गया, तब-तब कानून विवाद का कारण बने।
यूसीसी लागू हो या न हो, लेकिन संवाद का अभाव लोकतंत्र के लिए घातक है। यदि सरकार सचमुच समानता चाहती है, तो उसे पहले भरोसा पैदा करना होगा, न कि चुप्पी के सहारे निर्णय थोपना।
संपादकीय–2 : यूसीसी—समानता या राजनीतिक प्रयोग?
सरकार यूसीसी को समानता का प्रतीक बता रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या समानता का अर्थ सब पर एक जैसा कानून थोप देना है? भारतीय समाज विविधताओं से बना है और संविधान भी इन्हीं विविधताओं को सम्मान देता है।
यूसीसी पर बहस का स्तर दुर्भाग्यपूर्ण है। समर्थक इसे राष्ट्रवाद से जोड़ रहे हैं, विरोधी इसे अधिकारों पर हमला बता रहे हैं। बीच में आम नागरिक उलझन में है। यदि यूसीसी इतना ही जनहितकारी है, तो सरकार को खुली बहस से डर क्यों है?
उत्तराखंड में यूसीसी को चुनावी चश्मे से देखा जाना इसकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है। कानून यदि सामाजिक सुधार के लिए है, तो उसे वोट बैंक की राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए। वरना यह भी उन प्रयोगों में शामिल हो जाएगा, जिनका लाभ राजनीति को और नुकसान समाज को हुआ।
संपादकीय–3 : यूसीसी और संगठित समाज की परीक्षा
यूसीसी ने एक बात स्पष्ट कर दी है—राजनीति संगठित समाज की ही सुनती है। जिन वर्गों के पास संगठन हैं, उनकी बातें सुनी जा रही हैं, जबकि बिखरे समाज हाशिये पर हैं।
यह कानून कम और राजनीतिक शक्ति संतुलन की परीक्षा अधिक बन गया है। जो समाज संगठित है, वह शर्तें रख रहा है, और जो असंगठित है, उससे समर्थन अपेक्षित माना जा रहा है।
यूसीसी के बहाने यह सच्चाई उजागर हुई है कि लोकतंत्र में संख्या नहीं, संगठन बोलता है। यदि समाज अपनी आवाज चाहता है, तो उसे पहले अपनी संरचना मजबूत करनी होगी। वरना हर नया कानून उसी पर सबसे पहले प्रयोग होगा, जो सबसे कमजोर है।
यूसीसी चाहे लागू हो या नहीं, इसने समाज को आत्ममंथन का अवसर जरूर दिया है—कि क्या हम केवल वोट बैंक हैं या निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा भी।
संपादकीय–4 : यूसीसी और ‘फूट डालो’ की राजनीति
यूसीसी पर बहस जितनी कानूनी होनी चाहिए थी, उतनी राजनीतिक हो गई। सरकार समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष समाज को खांचों में बाँटने में लगे हैं। कहीं धर्म, कहीं जाति, कहीं क्षेत्र—लेकिन मूल सवाल गायब है।
इतिहास बताता है कि जब भी कानून को पहचान की राजनीति से जोड़ा गया, उसने समाज को जोड़ा नहीं, तोड़ा ही है। यूसीसी भी उसी राह पर बढ़ता दिख रहा है।
यदि सरकार सचमुच “समान नागरिक” की बात करती है, तो उसे पहले नागरिकों के बीच भरोसा कायम करना होगा। वरना यूसीसी समानता का नहीं, बल्कि विभाजन का प्रतीक बन जाएगा। कानून तब सफल होता है, जब वह समाज को साथ लेकर चले, न कि समाज को आपस में लड़ाकर।
संपादकीय–5 : यूसीसी—कानून से पहले विश्वास
किसी भी लोकतंत्र में कानून से पहले विश्वास आता है। यूसीसी पर सरकार का रवैया इस मूल सिद्धांत के विपरीत दिखता है। मसौदे की अस्पष्टता और संवाद की कमी ने आशंकाओं को जन्म दिया है।
उत्तराखंड की जनता कानून विरोधी नहीं है, लेकिन वह प्रयोगशाला भी नहीं बनना चाहती। यूसीसी यदि सामाजिक सुधार का माध्यम है, तो उसे चरणबद्ध, पारदर्शी और सहभागी प्रक्रिया से लागू किया जाना चाहिए।
आज आवश्यकता है राजनीतिक धैर्य की, न कि जल्दबाजी की। वरना यूसीसी आने वाले वर्षों में सुधार के बजाय विवाद का पर्याय बन जाएगा।
सरकार को यह समझना होगा कि कानून की ताकत बहुमत में नहीं, जनता के विश्वास में होती है।

यूजीसी: कानून से पहले सहमति की ज़रूरत
उत्तराखंड में यूजीसी को लेकर चल रही चर्चाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक कानूनी विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलता से जुड़ा प्रश्न है। सरकार इसे समानता और सुधार का माध्यम बता रही है, लेकिन जिस तरह से इसे लागू करने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, उसने समाज के एक बड़े हिस्से में आशंकाएँ पैदा कर दी हैं।
लोकतंत्र में किसी भी बड़े कानून की सफलता उसकी मंशा से अधिक जन-स्वीकृति पर निर्भर करती है। यूजीसी के मामले में यही स्वीकृति सबसे कमजोर कड़ी बनती दिख रही है। न तो सभी वर्गों के साथ पर्याप्त संवाद हुआ, न ही उनकी शंकाओं का स्पष्ट समाधान सामने रखा गया। परिणामस्वरूप, यह कानून सुधार से अधिक राजनीतिक प्रयोग प्रतीत होने लगा है।
इतिहास साक्षी है कि जब कानून जनभावनाओं को दरकिनार कर बनाए गए, तो उन्होंने समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित किया। यूजीसी भी यदि संवाद और सहमति के बिना आगे बढ़ाई गई, तो यह सामाजिक समरसता के लिए चुनौती बन सकती है।
सरकार को यह समझना होगा कि समानता कानून से नहीं, विश्वास से आती है। यदि यूजीसी वास्तव में जनहित में है, तो उसे जल्दबाजी के बजाय व्यापक चर्चा, पारदर्शिता और सहभागिता के साथ लागू किया जाना चाहिए।


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