

अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड की आत्मा पर लगा वह दाग है, जिसे न समय धो सका और न ही सत्ता की सफ़ाइयाँ। अब एक बार फिर यह मामला महिला कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन और वायरल वीडियो के बहाने सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में है। सवाल वही है—न्याय किसे मिलेगा और पर्दा किसके लिए डाला गया?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
महिला कांग्रेस अध्यक्ष ज्योति रौतेला के नेतृत्व में कांग्रेस भवन के बाहर उठा आक्रोश महज़ राजनीतिक शोर नहीं, बल्कि उस जन-आक्रोश की अभिव्यक्ति है जो वर्षों से जवाब ढूँढ रहा है। आरोप गंभीर हैं—वनन्तरा रिसॉर्ट पर बुलडोज़र की कार्रवाई किसी नियम-क़ानून का परिणाम नहीं, बल्कि इशारों की राजनीति थी। और जब भाजपा के ही एक पूर्व विधायक की पत्नी वायरल वीडियो में नामों का खुलासा करती हैं, तो सत्ता का माथा ठनकना स्वाभाविक है।
भाजपा का प्रतिवाद भी उतना ही परिचित है—“वीडियो अपुष्ट है, छेड़छाड़ वाला है, कांग्रेस शर्मनाक राजनीति कर रही है।” लेकिन सवाल यह नहीं कि वीडियो किसने बनाया, सवाल यह है कि जिस पर उंगली उठी, उस पर रोशनी क्यों नहीं डाली जा रही?
यदि सब कुछ झूठ है, तो उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच से परहेज़ क्यों?
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का यह कहना कि कांग्रेस ने समय पर सबूत नहीं दिए—दरअसल सत्ता की सुविधा का तर्क है। न्याय कोई डेडलाइन वाली स्कीम नहीं होता कि जिस दिन माँगो, उसी दिन मिल जाए, और अगर न मिले तो मामला बंद। जब पुलिस, प्रशासन और सत्ता एक ही पंक्ति में खड़े दिखें, तब आम नागरिक या विपक्ष का आगे आना जोखिम बन जाता है—यह सच्चाई सत्ता क्यों नहीं स्वीकारती?
सबसे चिंताजनक वह नैरेटिव मैनेजमेंट है, जिसमें हर सवाल को “बिटिया की आत्मा का अपमान” कहकर खारिज कर दिया जाता है। क्या सवाल पूछना अपमान है, या सवालों से भागना?
यदि ‘गट्टू’ नाम सिर्फ़ अफ़वाह है, तो उसे जांच से मिटाइए। अगर नहीं, तो उसे राजनीतिक धुंध में क्यों छुपाया जा रहा है?
यह संपादकीय किसी पार्टी के पक्ष में नहीं, न्याय के पक्ष में कटाक्ष है।
कटाक्ष उन जिम्मेदार लोगों पर, जिनके लिए सत्ता बचाना न्याय से बड़ा लक्ष्य बन गया है।
कटाक्ष उन नेताओं पर, जो हर असहज सवाल को “षड्यंत्र” कहकर जनता की बुद्धि का अपमान करते हैं।
और कटाक्ष उस व्यवस्था पर, जहाँ बुलडोज़र सबूतों पर चलता है, पर सच्चाई तक नहीं पहुँचता।
अंकिता भंडारी का मामला राजनीति से बड़ा है। यह राज्य की नैतिक परीक्षा है।
यदि सत्ता सच में निर्दोष है, तो जांच से क्यों डर?
और यदि डर है—तो जनता को समझ आ गया है कि डर किस बात का है।




