

अगस्त्यमुनि,प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुआ घटनाक्रम और उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद स्थित अगस्त्यमुनि में अगस्त्य ऋषि की डोली यात्रा को रोके जाने की घटना, अलग-अलग स्थानों की होते हुए भी एक ही मानसिकता को उजागर करती हैं। यह वह सोच है जो आस्था और परंपराओं को सम्मान की दृष्टि से नहीं, बल्कि “व्यवस्थागत समस्या” मानकर केवल आदेश, प्रतिबंध और नियंत्रण के नजरिये से देखती है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
जब शंकराचार्य यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या अब माँ गंगा में स्नान करने के लिए भी प्रशासनिक अनुमति लेनी पड़ेगी, और जब 15 वर्षों बाद निकली अगस्त्य ऋषि की डोली यात्रा को गेट बंद कर मैदान में प्रवेश से रोक दिया जाता है, तब यह मामला केवल प्रशासनिक व्यवस्था का नहीं रह जाता। यह सीधा-सीधा आस्था के सम्मान और धार्मिक परंपराओं के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
शंकराचार्य की पालकी में गंगा स्नान कोई नई या तात्कालिक परंपरा नहीं है। यह सदियों से चली आ रही सनातन परंपरा है, जिसे अचानक “भीड़ प्रबंधन” या “सुरक्षा” के नाम पर रोक देना न केवल असंवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि ऐतिहासिक और धार्मिक चेतना के प्रति अज्ञान भी। उसी प्रकार, अगस्त्य ऋषि की डोली यात्रा हिमालयी समाज की जीवित सांस्कृतिक विरासत है—एक ऐसी परंपरा, जो लोक, आस्था और इतिहास को एक सूत्र में बांधती है।
यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि दोनों आयोजनों की जानकारी प्रशासन को पूर्व से थी। इसके बावजूद कहीं संतों, बटुकों और श्रद्धालुओं के साथ कठोर व्यवहार किया गया, तो कहीं श्रद्धालुओं पर मुकदमे तक दर्ज कर दिए गए। यह रवैया व्यवस्था नहीं, बल्कि अविश्वास और दमन का संकेत देता है।
आज शंकराचार्य के शब्दों को जानबूझकर विवाद का रूप दिया जा रहा है, जबकि उनके वक्तव्य के मूल में समाज को आत्ममंथन के लिए झकझोरने की पीड़ा है। जब धर्म, परंपरा और आस्था को बार-बार बाधित किया जाता है और समाज चुप्पी साध लेता है, तब संतों की वाणी का कठोर होना स्वाभाविक है। यह कठोरता विद्रोह नहीं, चेतावनी होती है।
सनातन परंपराएं टकराव से नहीं, सम्मान और संवाद से चलती हैं। प्रशासन का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं है, बल्कि उस समाज की आस्थाओं का सम्मान करना भी है, जिसकी सेवा का दायित्व उसने लिया है। धर्म और परंपरा को अपराध की तरह देखना न तो लोकतांत्रिक सोच है और न ही भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप।
हम स्पष्ट रूप से मांग करते हैं कि प्रयागराज और अगस्त्यमुनि—दोनों प्रकरणों में संतों और श्रद्धालुओं पर दर्ज किए गए सभी मुकदमे तत्काल वापस लिए जाएं। परंपरागत धार्मिक आयोजनों को सम्मान, सहयोग और संरक्षण मिले तथा भविष्य में आस्था और प्रशासन के बीच टकराव नहीं, संवाद का मार्ग अपनाया जाए। धर्म किसी सरकार की अनुमति से नहीं चलता—वह समाज की चेतना, विश्वास और संस्कारों से जीवित रहता है।
जय माँ गंगा
जय अगस्त्य ऋषि
जय सनातन धर्म




