

उत्तराखंड राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी जनता का सपना अधूरा है। शहीदों के बलिदान और आंदोलनकारियों की तपस्या से बने इस राज्य का चेहरा आज भय, भ्रष्टाचार, लूट और अराजकता से विकृत हो चुका है। पुलिस, जो जनता की सुरक्षा की गारंटी होनी चाहिए, वह स्वयं सवालों के घेरे में है। अधिकारी बचाव की मुद्रा में हैं और जनता आक्रोशित। यह स्थिति तभी जन्म लेती है जब शासन भ्रष्ट, प्रशासन बेलगाम और जनता लाचार हो।पुलिस पर सवाल और बढ़ता अविश्वास

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
रुद्रपुर सिडकुल की KPI कंपनी में महिला उत्पीड़न का मामला हो या फिर टिहरी गढ़वाल में इंस्पेक्टर धर्मेंद्र रौतेला द्वारा किए गए शर्मनाक कृत्य — ये घटनाएँ पुलिस की साख पर बट्टा लगा रही हैं। जिस पुलिस को न्याय और सुरक्षा का प्रहरी कहा जाता है, वही यदि आमजन को अपमानित करे, पेशाब पिलाए या थूक चटवाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी तरह स्पा सेंटरों में देह व्यापार और महिलाओं का शोषण खुलेआम हो रहा है। स्थानीय पुलिस की मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं। जब जनता देखती है कि थाने-चौकी संरक्षण में ऐसे काले कारोबार फल-फूल रहे हैं तो भरोसा किस पर करे?
भूमाफिया, पेपर माफिया और भ्रष्टाचार का शिकंजा
आज उत्तराखंड की नियति भूमाफिया और पेपर माफिया के शिकंजे में जकड़ी हुई है।
नजूल की जमीनों पर अवैध कब्जे कर रिजॉर्ट, मॉल और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े हो रहे हैं।
दूसरी ओर गरीबों की झुग्गियों पर बुलडोजर चलाकर “कानून-व्यवस्था” का दिखावा किया जाता है।
रोजगार की राह देखते युवाओं को बार-बार पेपर लीक का दंश झेलना पड़ रहा है।
ऐसा लगता है मानो भ्रष्टाचार यहाँ व्यवस्था नहीं, बल्कि शासक धर्म बन चुका है।
शिक्षा और रोजगार : अधूरा सपना
पढ़ाई कर नौकरी पाओ” — यह सरल वाक्य अब उत्तराखंड के युवाओं के लिए मजाक बन गया है।
स्कूल बंद हो रहे हैं, आईटीआई ताले में जकड़े पड़े हैं।
उच्च शिक्षा संस्थानों में घोटाले और फर्जी डिग्रीधारियों का बोलबाला है।
भर्ती परीक्षाएँ या तो रद्द होती हैं या पेपर माफिया की भेंट चढ़ जाती हैं।
जब बेरोजगार युवक सड़क पर उतरते हैं तो उन पर लाठी बरसाई जाती है। सवाल यह है कि सरकार आखिर किसकी है — जनता की या दलालों और माफियाओं की?
स्वास्थ्य और जनजीवन की बदहाली
अस्पतालों को पीपीपी मोड पर चलाने की नीति ने गरीबों की कमर तोड़ दी है। डॉक्टरों की भारी कमी है, औषधियाँ उपलब्ध नहीं। गाँवों में शराब के ठेके खोलकर सरकार ने नशे की जड़ें और गहरी कर दी हैं। कुपोषण और सामाजिक बुराइयाँ बढ़ रही हैं।
ग्रामीण इलाकों में बाघ और भालू का आतंक है, लेकिन वन विभाग और सरकार मौन साधे बैठी है। यह मौन ही साबित करता है कि शासन जनता के दुःख-दर्द से कटा हुआ है।
शहीदों का न्याय अब भी अधूरा
राज्य आंदोलन के दौरान शहीद हुए लोगों को आज तक न्याय नहीं मिला। सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदलते रहे, पर शहीदों के परिवारों को सिर्फ आश्वासन मिला। सवाल उठता है कि क्या इस राज्य का निर्माण सिर्फ सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए हुआ था? शहीदों का बलिदान यदि न्याय और सम्मान नहीं दिला सका तो रजत जयंती वर्ष मनाने का औचित्य ही क्या है?
जनता की मजबूरी और नेताओं का दृष्टिहीन विजन
जनप्रतिनिधियों की सोच नाली-गड्ढ़े और सड़क तक सिमटकर रह गई है। बड़े विजन, स्थायी राजधानी, लोकायुक्त, रोजगार और पारदर्शिता जैसे मुद्दे उनकी प्राथमिकता में ही नहीं। जनता को नदी-नालों के किनारे बसाकर चुनाव जीता जाता है और फिर उन्हें जीवनभर असुरक्षा में झोंक दिया जाता है।
बुलडोजर की राजनीति : गरीब बनाम अमीर
आज बुलडोजर गरीब की झोपड़ी पर चलता है, लेकिन भूमाफियाओं की कोठियाँ, अवैध मॉल और रिजॉर्ट जस के तस खड़े रहते हैं। यह दोहरा मापदंड जनता के मन में आक्रोश भर रहा है। न्याय यदि वर्ग के आधार पर बंटे तो अराजकता अवश्य पनपती है।
समाज में नैतिक संकट और महिला उत्पीड़न
रुद्रपुर, हल्द्वानी और देहरादून जैसे शहरों में स्पा सेंटरों के नाम पर देह व्यापार और आर्थिक शोषण खुला रहस्य है। KPI कंपनी में महिला के साथ उत्पीड़न, और अन्य जगहों पर युवतियों को ब्लैकमेलिंग व शोषण का शिकार बनाना, यह बताता है कि समाज किस गहरी खाई में गिर रहा है।
सरकार और प्रशासन का मौन
चाहे अंकित भंडारी हत्याकांड हो, या पिथौरागढ़ की कशिश का मामला — जनता को हर बार यह अनुभव हुआ कि वीआईपी और ताकतवरों को संरक्षण मिलता है जबकि आम आदमी को न्याय पाने के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। यही कारण है कि आज उत्तराखंड की जनता सरकार से ज्यादा अदालतों और सोशल मीडिया पर भरोसा करती है।
आंदोलन की सुगबुगाहट
लेते हैं। उत्तराखंड की धरती ने 90 के दशक में यह देखा और आज फिर सुगबुगाहट तेज हो रही है। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महिला उत्पीड़न, माफियाओं का बोलबाला और नेताओं की दृष्टिहीनता ने जनता को मजबूर कर दिया है कि वह फिर से सड़कों पर उतरे।
उत्तराखंड की रजत जयंती वर्ष में भी सवाल जस के तस हैं।
न स्थायी राजधानी बनी,
न लोकायुक्त आया,
न भ्रष्टाचार पर लगाम लगी,
न युवाओं को रोजगार मिला।
इसके बजाय राज्य में पुलिस का दुरुपयोग, माफियाओं का कब्जा, स्वास्थ्य-शिक्षा की बदहाली और सामाजिक संकट ने जनता का भविष्य अंधकारमय कर दिया है।
अब वक्त है कि जनता आवाज उठाए और सत्ता को कटघरे में खड़ा करे। लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है। यदि मालिक सोया रहा तो भ्रष्ट शासक और बेलगाम अफसर राज्य को रसातल में ले जाएंगे।
यह संपादकीय जनता की पीड़ा और व्यवस्था के खोखलेपन को सामने लाने का प्रयास है। उत्तराखंड को बचाने का समय अब भी है, बशर्ते जनता फिर से एकजुट होकर सवाल पूछे और जवाब मांगे।




