संपादकीय:भोजन की पवित्रता और गु मूत मिलावट पदार्थ से मानसिक असंतुलन — सावधानी ही सुरक्षा

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आध्यात्मिक चेतावनी समाज में बढ़ती मानसिक असंतुलन, आक्रामकता और परिवारों में कलह को लेकर आध्यात्मिक चिंतन सामने आया है। जानकारों का कहना है कि भोजन की शुद्धता का सीधा संबंध मन और विचारों से होता है। यदि खाद्य पदार्थ किसी भी प्रकार से दूषित या अपवित्र हो जाए, तो उसका असर शरीर ही नहीं, मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


आध्यात्मिक दृष्टि से लोगों से अपील की जा रही है कि फल, जूस, चाय और अन्य खाद्य पदार्थ खरीदते समय स्वच्छता और विश्वसनीयता का ध्यान रखें। परिवार की सुख-शांति और मानसिक संतुलन के लिए शुद्ध, सात्विक और साफ भोजन ही ग्रहण करना सबसे बड़ा उपाय माना गया है।

भोजन की पवित्रता और मानसिक संतुलन — सावधानी ही सुरक्षा
समाज में इन दिनों एक चिंताजनक चर्चा तेजी से फैल रही है कि कई स्थानों पर खाने-पीने की वस्तुओं—जैसे फल, सब्ज़ी, जूस, चाय या अन्य खाद्य पदार्थों—को जानबूझकर अपवित्र करने की घटनाएँ सामने आ रही हैं। कहीं थूकने की बात कही जाती है, कहीं गंदगी मिलाने की। चाहे ये घटनाएँ सच हों या अफवाह, लेकिन इतना निश्चित है कि भोजन की शुद्धता और पवित्रता का विषय केवल स्वास्थ्य का ही नहीं, बल्कि हमारी मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति से भी जुड़ा हुआ है।
भारतीय परंपरा में भोजन को “अन्न देवता” कहा गया है। हमारे शास्त्र बताते हैं कि जैसा अन्न हम ग्रहण करते हैं, वैसा ही हमारे मन और विचारों पर प्रभाव पड़ता है। यदि भोजन शुद्ध, सात्विक और स्वच्छ हो तो मन शांत रहता है, विचार सकारात्मक होते हैं और जीवन में संतुलन बना रहता है। लेकिन यदि भोजन अशुद्ध, दूषित या अपवित्र हो जाए तो उसका असर धीरे-धीरे शरीर और मन दोनों पर पड़ सकता है।
आजकल कई अभिभावक यह शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे अचानक आक्रामक हो जाते हैं, पढ़ाई में मन नहीं लगता, नशे की ओर झुकाव बढ़ जाता है, या व्यवहार में असंतुलन दिखने लगता है। निश्चित रूप से इसके पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं, लेकिन भोजन की शुद्धता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आध्यात्मिक दृष्टि से माना जाता है कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि वह ऊर्जा का स्रोत भी है। जिस भाव से भोजन बनाया और परोसा जाता है, वही ऊर्जा खाने वाले तक पहुँचती है। इसलिए हमारे बुजुर्ग हमेशा सलाह देते थे कि घर का बना भोजन खाएँ, बाहर का खाना कम लें और भोजन बनाते समय स्वच्छता और सकारात्मक भाव बनाए रखें।
त्योहारों और गर्मियों के मौसम में बाजारों में जूस, फल और अन्य खाद्य पदार्थों की बिक्री बढ़ जाती है। ऐसे समय में लोगों को और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। किसी भी खाद्य पदार्थ को खरीदने से पहले उसकी स्वच्छता, विक्रेता की साफ-सफाई और गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। जहां शक हो, वहां खरीदारी से बचना ही बेहतर है।
साथ ही यह भी जरूरी है कि समाज में अनावश्यक भय या नफरत फैलाने के बजाय स्वच्छता और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाए। यदि कहीं भी भोजन को जानबूझकर दूषित करने जैसी घटना सामने आती है, तो प्रशासन को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
परिवार की सुख-शांति, मानसिक संतुलन और स्वास्थ्य के लिए हमें तीन बातों का विशेष ध्यान रखना होगा—स्वच्छ भोजन, सतर्कता और सकारात्मक सोच। जब समाज जागरूक होगा और लोग शुद्धता के प्रति सजग रहेंगे, तभी आने वाली पीढ़ी का स्वास्थ्य और संस्कार दोनों सुरक्षित रह सकेंगे।
इसलिए यह समय है कि हम सब मिलकर भोजन की पवित्रता को समझें, स्वच्छता को अपनाएँ और अपने परिवार को सुरक्षित तथा स्वस्थ रखने के लिए सजग नागरिक बनें।

यदि कोई भोजन या खाद्य पदार्थ अपवित्र हो जाए, तो उसे कितना ही धोया या साफ किया जाए, उसकी शुद्धता वापस नहीं आती। हिंदू धर्म में अन्न को देवता माना गया है, इसलिए ऐसे दूषित भोजन से बचना ही बुद्धिमानी है। परिवार की मानसिक और आध्यात्मिक शांति के लिए शुद्ध और स्वच्छ भोजन ही ग्रहण करें।

यदि आप आध्यात्मिक जीवन, पूजा-पाठ और सात्विकता में विश्वास रखते हैं, तो भोजन की शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। भारतीय परंपरा में माना गया है कि दूषित या अपवित्र भोजन शरीर ही नहीं, मन और ऊर्जा को भी प्रभावित करता है। इसलिए ऐसे फल-फूल या खाद्य पदार्थ जिनकी स्वच्छता संदिग्ध हो, उनसे दूर रहना चाहिए। घर-परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए स्वच्छ, सात्विक और विश्वासयोग्य स्रोत से लिया गया भोजन ही ग्रहण करें। सावधानी और जागरूकता ही परिवार की सुरक्षा का सबसे बड़ा उपाय है।

अक्सर माता-पिता कहते हैं कि उनका बेटा या बेटी पहले बहुत अच्छे थे, लेकिन अचानक उनका व्यवहार बदल गया, बुद्धि भ्रमित हो गई और वे गलत रास्ते पर चलने लगे। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—संगति, नशा, वातावरण और खान-पान। भारतीय परंपरा में माना गया है कि यदि भोजन अशुद्ध या दूषित हो, तो उसका असर मन और विचारों पर भी पड़ सकता है। इसलिए स्वच्छ, सात्विक और विश्वसनीय भोजन ही ग्रहण करना चाहिए।


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