अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर औचक निरीक्षण सराहनीय, लेकिन रुद्रपुर के 40 वार्डों में खुलेआम बिक रहा ‘मौत का सामान’ — कब जागेगा स्वास्थ्य विभाग?

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रुद्रपुर/गदरपुर, 24 अप्रैल 2026।
गदरपुर क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग और तहसील प्रशासन की संयुक्त टीम द्वारा पंजीकृत अल्ट्रासाउंड केंद्रों का औचक निरीक्षण किया जाना निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहल है। पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत दस्तावेजों की जांच, रिकॉर्ड की समीक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की कार्रवाई स्वागत योग्य है। तहसीलदार देवेंद्र सिंह बिष्ट, एसीएमओ डॉ. एस.पी. सिंह, जिला समन्वयक प्रदीप मेहर और अधिशासी सहायक गोपाल आर्य द्वारा की गई यह कार्रवाई यह संदेश देती है कि प्रशासन स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही चाहता है।
निरीक्षण के दौरान तराई हॉस्पिटल और महाजन हॉस्पिटल में व्यवस्थाएं संतोषजनक पाई गईं, जबकि अल्फा हॉस्पिटल में रिकॉर्ड में ओवरराइटिंग, कटिंग और मरीजों के अधूरे पते जैसी खामियां सामने आईं। विभाग ने नोटिस जारी करने की बात कही है। यह कार्रवाई अपने स्थान पर उचित है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता केवल पंजीकृत संस्थानों तक सीमित रहनी चाहिए?
रुद्रपुर के 40 वार्डों में खुला जहर का कारोबार
रुद्रपुर के लगभग हर वार्ड, गली और बाजार में ऐसे मेडिकल स्टोर संचालित हो रहे हैं जहां बिना किसी वैध चिकित्सकीय पर्चे के नशीली गोलियां, कफ सिरप, दर्द निवारक इंजेक्शन और प्रतिबंधित दवाइयां खुलेआम बेची जा रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि करीब 90 प्रतिशत मेडिकल स्टोरों पर नियमों का पालन नहीं हो रहा।
कई स्थानों पर नाबालिग और युवा आसानी से नशे वाली दवाइयां खरीद रहे हैं। इससे नशे की लत तेजी से बढ़ रही है। स्कूल और कॉलेज के छात्रों तक इन दवाइयों की पहुंच चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुकी है।
झोलाछाप डॉक्टरों का साम्राज्य
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद भयावह है। रुद्रपुर और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में ऐसे क्लिनिक चल रहे हैं जहां:
डॉक्टरों के पास वैध डिग्री नहीं है
कई लोग कंपाउंडर रह चुके हैं और अब खुद डॉक्टर बन बैठे हैं
बिना जांच के भारी मात्रा में एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती हैं
मरीजों को गलत इलाज देकर उनकी जान जोखिम में डाली जा रही है
गली-मोहल्लों में बोर्ड लगाकर “विशेषज्ञ चिकित्सक” बनने वाले ऐसे लोगों ने गरीब जनता को अपना आसान शिकार बना रखा है।
फर्जी आयुर्वेदिक दवाओं का काला खेल
कुछ समय पहले ऐसे मामलों का खुलासा हुआ था जहां कथित आयुर्वेदिक चिकित्सक एक्सपायरी एलोपैथिक दवाइयों को पीसकर उसमें चूर्ण मिलाकर नई “हर्बल दवा” के रूप में बेच रहे थे।
इन तथाकथित दवाओं का प्रचार इस तरह किया जाता है:
शुगर का स्थायी इलाज
कैंसर की गारंटी दवा
पुरुष शक्ति बढ़ाने की दवा
मोटापा खत्म करने की दवा
महिलाओं की सभी बीमारियों का समाधान
मरीजों से हजारों रुपये वसूले जाते हैं और उन्हें कई बार अत्यधिक डोज वाली गोलियां दी जाती हैं। कई लोगों की तबीयत बिगड़ने और मौत तक की शिकायतें सामने आती रही हैं।
दवा लैब जांच क्यों नहीं?
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि स्वास्थ्य विभाग ऐसे उत्पादों की नियमित लैब जांच क्यों नहीं कराता?
यदि बाजार में बिक रही तथाकथित आयुर्वेदिक दवाओं के सैंपल लिए जाएं तो संभव है कि बड़े स्तर पर मिलावट, एक्सपायरी दवाओं का इस्तेमाल और अवैध निर्माण का खुलासा हो।
गरीब जनता सबसे ज्यादा शिकार
महंगे निजी अस्पतालों के कारण गरीब लोग सस्ते इलाज की तलाश में झोलाछाप डॉक्टरों और फर्जी वैद्यों के पास पहुंच जाते हैं। वहीं से उनकी बीमारी और बढ़ जाती है।
कई परिवार इलाज के नाम पर अपनी जमा पूंजी गंवा चुके हैं। कुछ मामलों में गलत दवा के कारण लोगों की जान भी चली गई।
स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता क्या हो?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पंजीकृत अस्पतालों में कागजी जांच करना पर्याप्त नहीं है। विभाग को चाहिए कि वह:
रुद्रपुर के सभी मेडिकल स्टोरों का औचक निरीक्षण करे
नशीली दवाओं की बिक्री पर तत्काल रोक लगाए
झोलाछाप क्लीनिकों को सील करे
फर्जी आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं पर एफआईआर दर्ज करे
दवा नमूनों की लैब जांच कराए
जनता के लिए हेल्पलाइन शुरू करे
धामी सरकार के लिए चेतावनी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था में कई गंभीर छेद मौजूद हैं। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और बड़ा रूप ले सकता है।
जनता पूछ रही है जवाब
जब पंजीकृत अस्पतालों की छोटी तकनीकी खामियों पर नोटिस जारी हो सकता है, तो फिर खुलेआम नशे की दवाइयां बेचने वालों, फर्जी डॉक्टरों और नकली दवा माफिया पर कार्रवाई क्यों नहीं?
रुद्रपुर ही नहीं, पूरे उत्तराखंड में यह एक गंभीर खतरा बन चुका है।
स्वास्थ्य विभाग को अब सिर्फ फाइलों में कार्रवाई दिखाने के बजाय जमीन पर उतरकर असली बीमारी पहचाननी होगी—वरना आने वाली पीढ़ियां इसकी भारी कीमत चुकाएंगी।


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