

उत्तराखंड को अस्तित्व में आए 25 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन प्रदेश की सबसे प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षा—पीसीएस—आज भी अव्यवस्था, लापरवाही और न्यायिक हस्तक्षेप के सहारे चल रही है। हाल ही में नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा पीसीएस मुख्य परीक्षा 2025 पर लगाई गई रोक ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रदेश की परीक्षा प्रणाली कितनी कमजोर और अविश्वसनीय हो चुकी है। छह से नौ दिसंबर के बीच प्रस्तावित मुख्य परीक्षा को रोकते हुए कोर्ट ने प्रारंभिक परीक्षा के एक गलत प्रश्न को हटाकर संशोधित परिणाम व नई मेरिट सूची जारी करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह मामला केवल एक प्रश्न की गलती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है, जिसके भरोसे हजारों युवाओं का भविष्य टिका होता है। याचिकाकर्ताओं द्वारा चार प्रश्नों को गलत बताया गया, जिनमें से एक को कोर्ट ने पूरी तरह हटाने का आदेश दिया और बाकी तीन की जांच विशेषज्ञ समिति से कराने के निर्देश दिए। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब परीक्षा पत्रों की गुणवत्ता ही संदिग्ध हो, तो चयन प्रक्रिया पर जनता कैसे भरोसा करे?
इसी संदर्भ में उत्तराखंड कांग्रेस प्रवक्ता एवं दर्जा राज्य मंत्री डॉ. गणेश उपाध्याय का बयान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने सही कहा कि पीसीएस की मुख्य परीक्षा का अचानक रुकना परीक्षार्थियों के लिए मानसिक, आर्थिक और सामाजिक संकट का कारण बना है। वर्षों की मेहनत, तैयारी और सपनों पर एक झटके में प्रश्नचिह्न लग जाना किसी भी युवा के आत्मविश्वास को तोड़ सकता है।
डॉ. उपाध्याय ने मांग की है कि जिन एजेंसियों की लापरवाही से बार-बार परीक्षाओं में गड़बड़ी हो रही है, उन्हें तत्काल ब्लैकलिस्ट किया जाए और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए कड़ा कानून बनाया जाए। यह मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रदेश के लाखों युवाओं की आवाज है, जो बार-बार परीक्षा रद्द होने, परिणाम बदलने और न्यायालयों के चक्कर काटने से टूट चुके हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उत्तराखंड का तेज़-तर्रार और प्रतिभाशाली युवा आज निराश होकर पलायन के लिए मजबूर हो रहा है। समय पर परीक्षा न होना, परिणामों में देरी और चयन प्रक्रिया में अनिश्चितता युवाओं को प्रदेश से बाहर जाने के लिए मजबूर कर रही है। यदि परीक्षाएं समय पर हों, परिणाम जल्दी आएं और प्रक्रिया पारदर्शी हो, तो यही युवा उत्तराखंड के विकास की रीढ़ बन सकता है।
25 वर्षों की राज्य यात्रा के बाद भी यदि सरकार युवाओं को एक स्थिर और भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली नहीं दे पाई, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है। हाईकोर्ट का यह आदेश केवल एक कानूनी कार्यवाही नहीं, बल्कि सरकार और लोक सेवा आयोग के लिए कड़ी चेतावनी भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार इसे केवल न्यायालयी बाधा न समझे, बल्कि अवसर माने—व्यवस्था को सुधारने का, एजेंसियों की जवाबदेही तय करने का और युवाओं का टूटा भरोसा लौटाने का। यदि अब भी सुधार नहीं हुआ, तो यह संकट केवल परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य पर स्थायी प्रश्नचिह्न बन जाएगा।




