रुद्रपुर–किच्छा का सौरभ राज बेहड़ प्रकरण अब केवल एक कथित हमले या पारिवारिक विवाद तक सीमित नहीं रहा। यह मामला अब चिकित्सा व्यवस्था, राजनीतिक प्रभाव और नैतिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। जिस सौरभ राज बेहड़ को मीडिया रिपोर्टों में “गंभीर रूप से घायल”, “फ्रैक्चर पीड़ित” बताकर फुटेला हॉस्पिटल में लंबे समय तक भर्ती दिखाया गया, उसी को लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या वह वास्तव में उतना ही चोटिल था, जितना बताया गया?
यदि यह मान लिया जाए कि हमला खुद सौरभ द्वारा रचाई गई साजिश का हिस्सा था, तो फिर सबसे अहम सवाल यह है कि फुटेला हॉस्पिटल ने किस आधार पर उन्हें इतने दिनों तक भर्ती रखा? क्या वाकई मेडिकल जांच में फ्रैक्चर या गंभीर चोटें पाई गई थीं, या फिर यह भी उस साजिश का हिस्सा था, जिसमें सहानुभूति, राजनीतिक दबाव और मीडिया नैरेटिव गढ़ा गया?
यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अस्पताल परिसर में पुलिस के शीर्ष अधिकारी और बड़े राजनेताओं का लगातार जमावड़ा लगा रहा। क्या यह महज एक संयोग था या फिर प्रभावशाली लोगों की मौजूदगी ने अस्पताल के निर्णयों को प्रभावित किया? यदि कोई व्यक्ति गंभीर रूप से घायल नहीं है और फिर भी उसे लंबे समय तक भर्ती रखा जाता है, तो यह मेडिकल एथिक्स का सीधा उल्लंघन है।
निस्संदेह, पिता-पुत्र का विवाद उनका निजी मामला हो सकता है, लेकिन जब उस विवाद में चिकित्सा संस्थान, पुलिस और राजनीति शामिल हो जाए, तब मामला सार्वजनिक हित का बन जाता है। अगर सौरभ राज बेहड़ वास्तव में “फिट” थे और चोटें वास्तविक नहीं थीं, तो फिर फुटेला हॉस्पिटल की भूमिका भी दोषियों की श्रेणी में आती है। ऐसे में अस्पताल प्रबंधन से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या उन्होंने मेडिकल रिपोर्ट्स में बढ़ा-चढ़ाकर चोटें दर्शाईं? क्या अस्पताल को राजनीतिक संरक्षण का लाभ मिला?
यह प्रकरण उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। यदि प्रभावशाली लोगों के लिए अस्पताल साजिश का औजार बन जाएं, तो आम जनता का भरोसा कैसे बचेगा? अब जरूरत है कि फुटेला हॉस्पिटल की भूमिका की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो, ताकि सच सामने आए और भविष्य में चिकित्सा संस्थान किसी राजनीतिक या व्यक्तिगत खेल का हिस्सा न बनें।

फुटेला हॉस्पिटल : साजिश, लालच और कानून के कटघरे में,सौरभ राज बेहड़ प्रकरण में अब फुटेला हॉस्पिटल की भूमिका गंभीर सवालों के घेरे में है। यदि कोई व्यक्ति वास्तविक रूप से गंभीर रूप से घायल नहीं था, तो उसे किस चिकित्सकीय आधार पर इतने लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रखा गया? क्या यह चिकित्सा आवश्यकता थी या फिर पैसों की भूख और साजिश का हिस्सा? अस्पताल समाज की मुख्यधारा में सेवा के लिए होते हैं, न कि राजनीतिक प्रभाव और निजी ड्रामे का मंच बनने के लिए।
यदि चोटें मामूली थीं या थीं ही नहीं, तो मेडिकल रिपोर्ट्स किस आधार पर बनाई गईं? यह सीधे-सीधे मेडिकल एथिक्स, कानून और जनविश्वास का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में केवल आरोपी ही नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन भी कानून के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।
साथ ही, स्वास्थ्य विभाग पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है—किसने और किन शर्तों पर ऐसे अस्पताल को लाइसेंस दिया? क्या समय-समय पर जांच हुई? यदि नहीं, तो यह चुप्पी भी अपराध के बराबर है। अब जरूरी है निष्पक्ष जांच, ताकि स्वास्थ्य सेवा को साजिश और लालच से मुक्त किया जा सके।
रुद्रपुर/किच्छा क्षेत्र से जुड़ा सौरभ राज बेहड़ मामला जनवरी 2026 में उस समय सुर्खियों में आया, जब कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ के बेटे सौरभ राज बेहड़ पर तीन नकाबपोश युवकों द्वारा जानलेवा हमला किए जाने की खबर सामने आई। बताया गया कि हमलावरों ने डंडों से पिटाई की, जिससे सौरभ को गंभीर चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। घटना के बाद पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, जिससे मामला प्रारंभिक तौर पर आपराधिक प्रतीत हुआ।
यह हमला वास्तव में सौरभ राज बेहड़ ने खुद ही साजिश के तहत करवाया था। मामला लेन-देन विवाद, पारिवारिक कारण और राजनीतिक सहानुभूति बटोरने की मंशा का उल्लेख किया गया।
🛑 SSP मणिकांत मिश्रा का अपराधियों के विरुद्ध सख्त रुख—पार्षद द्वारा खुद पर हमला कराने की साजिश का हुआ पर्दाफाश।
अवैध हथियारों के साथ तीन हमलावर व साजिशकर्ता गिरफ्तार
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SSP मणिकांत मिश्रा ने स्पष्ट कहा है कि— “कानून को गुमराह करने और अवैध हथियारों के सहारे साजिश रचने वालों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी।”
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