

यही वह दौर था जब एक अनोखा सिंहासन बनकर तैयार हुआ था. जिसे हम तख्त-ए-ताऊस यानी मयूर सिंहासन के नाम से जानते हैं.

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह सिंहासन सिर्फ सत्ता का प्रतीक नहीं था, बल्कि मुगलों की असीम संपत्ति और कलाकारी का रूप माना जाता था. इसे बनाने में लगभग 1150 किलो शुद्ध सोने का इस्तेमाल किया गया था. सिंहासन की पूरी सतह पर रुबी, पन्ना, नीलम, हीरे और अनगिनत मोतियों की ऐसी सजावट की गई थी, जिसे देखकर कोई भी हैरान रह जाए.
बनाने में लगे थे 7 वर्ष
इस पर दो नाचते हुए मोर बनाए गए थे और मोरों के बीच 80-90 कैरेट का एक विशाल हीरा जड़ा था, जिसे इतिहासकारों ने कोहिनूर माना है. इसके अलावा इस पर दुनिया भर में फेमस दरिया-ए-नूर हीरा भी लगाया गया था. इस तख्त को तैयार करने में सात वर्ष लग गए थे और यह करीब छह फीट लंबा व चार फीट चौड़ा था.
नादिर शाह ने कैसे लूट ली मुगलों की शान?
साल 1739 दिल्ली में मुगल सत्ता काफी कमजोर हो चुकी थी. मुगलों के शासक मुहम्मद शाह रंगीला न तो युद्ध योग्य रहे और न ही रणनीति बनाने सक्षम रहे. इसी समय ईरान के शासक नादिर शाह ने भारत पर हमला किया था. करनाल की लड़ाई में हार के बाद मुगल शासक मुहम्मद शाह रंगीला ने हथियार डाल दिए. साथ ही सत्ता के जाने की मजबूरी में रंगीला ने नादिर शाह के लिए दिल्ली का खजाना खोल दिया था. लेकिन एक अफवाह ने सब कुछ बदल दिया. शहर में ये चर्चा फैल गई कि नादिर शाह की हत्या हो गई है. फिर क्या था उसने पूरे दिल्ली में कत्लेआम करावा दिया था.
कहा जाता है कि उसने एक ही दिन में 30 से 50 हजार लोगों की जान ले ली गई और दिल्ली का विशाल खजाना समेट लिया गया. उसके बाद नादिर शाह तख्त-ए-ताऊस को भी अपनी जीत की निशानी बनाकर साथ ले गया था. इतिहासकार मानते हैं कि वह भारत से इतनी दौलत लेकर गया कि कई सालों तक उसे अपने देश में टैक्स लगाने की जरूरत नहीं पड़ी थी.
अब कहां है तख्त-ए-ताऊस?
ईरान पहुंचने के बाद नादिर शाह ने सिंहासन से कोहिनूर और दरिया-ए-नूर को अलग कर दिया गया था. समय बीतने के साथ माना जाता है कि मयूर सिंहासन को तोड़ दिया गया या पूरी तरह नष्ट कर दिया गया था. इसके दोनों बड़े हीरे अभी भी मौजूद हैं, कोहिनूर हीरा इंग्लैंड की महारानी के मुकुट पर जड़ा है और दरिया ए नूर ईरान के एक म्यूजियम में मौजूद है.




