

उत्तराखंड में “न्याय आपके द्वार” अभियान को लेकर सरकार जिस तेजी से अपनी उपलब्धियों का बखान कर रही है, वह कागज़ों पर भले ही चमकदार दिखे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल और कड़वी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की यह पहल—210 स्थानों पर राजस्व लोक अदालतें, पहले ही दिन 5000 से अधिक वादों का निस्तारण—सुनने में प्रभावशाली लगती है, पर सवाल यह है कि क्या यह स्थायी न्याय है या केवल आंकड़ों की बाजीगरी?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
न्याय या आंकड़ों का खेल?
6933 वादों की सुनवाई और 5322 का निस्तारण—यह आंकड़े सरकार की “तेजी” दिखाते हैं, लेकिन क्या हर मामले में न्याय की गुणवत्ता सुनिश्चित हुई? लोक अदालतों में अक्सर समझौते के नाम पर मामलों को जल्द निपटाने का दबाव रहता है। ऐसे में गरीब और कमजोर पक्ष क्या वास्तव में न्याय पा रहा है या सिर्फ फाइलें बंद की जा रही हैं?
ऑनलाइन सिस्टम: सुविधा या नया जाल?
आरसीसीएमएस पोर्टल के जरिए घर बैठे केस दर्ज करने की बात कही जा रही है। लेकिन सवाल यह है—
क्या पहाड़ के दूरस्थ गांवों में इंटरनेट और तकनीकी समझ है?
क्या बुजुर्ग और अशिक्षित व्यक्ति इस प्रक्रिया को खुद पूरा कर पाएंगे?
कहीं ऐसा तो नहीं कि “डिजिटल न्याय” के नाम पर एक नया बिचौलिया तंत्र खड़ा हो जाएगा?
विरासत और नामांतरण: जमीनी हकीकत क्या?
तेहरवीं तक खतौनी देने का दावा सुनने में क्रांतिकारी लगता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि:
पटवारी और राजस्व कर्मियों के स्तर पर भ्रष्टाचार पुराना रोग है
बिना “चढ़ावे” के फाइलें आगे बढ़ती नहीं
क्या सरकार ने इस जड़ समस्या पर कोई ठोस कार्रवाई की है?
सबसे बड़ा सवाल—भू-माफिया पर खामोशी क्यों?
सरकार लोक अदालतों में छोटे-छोटे मामलों का निपटारा दिखा रही है, लेकिन:
सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वाले बड़े भू-माफिया कौन हैं?
क्या सत्ताधारी नेताओं और नौकरशाहों की मिलीभगत पर कार्रवाई होगी?
अवैध खनन माफिया, नकल माफिया, और विभागीय घूसखोरी पर कब प्रहार होगा?
यदि बड़े मगरमच्छ सुरक्षित हैं और छोटी मछलियों को पकड़ा जा रहा है, तो यह न्याय नहीं—सिस्टम का दिखावा है।
अपराध और अवैध धंधों का फैलता जाल
उत्तराखंड के मैदान से लेकर पहाड़ तक:
गांव-गांव में नशे का कारोबार
शहर-शहर में अवैध गतिविधियों का जाल
सत्ता संरक्षण की चर्चाएं आम
क्या “न्याय आपके द्वार” इन ज्वलंत मुद्दों को छू भी रहा है?
मिशन 2027 या मिशन इमेज बिल्डिंग?
2027 के चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में यह पहल कहीं “जनता को राहत” से ज्यादा “छवि सुधार अभियान” तो नहीं?
यदि सरकार वास्तव में गंभीर है, तो उसे चाहिए:
भू-माफिया और खनन माफिया पर बड़े स्तर पर कार्रवाई
राजस्व विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार
डिजिटल सिस्टम के साथ जमीनी सहायता तंत्र
न्याय की राह अभी लंबी है
“न्याय आपके द्वार” एक अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन जब तक:
सत्ता संरक्षित अपराध पर चोट नहीं होती
सिस्टम के भीतर बैठे भ्रष्ट तत्वों पर कार्रवाई नहीं होती
तब तक यह अभियान आधा-अधूरा ही रहेगा।
कहीं ऐसा न हो कि सरकार खुद ही अपने “समाधान” का उत्सव मनाने लगे और असली समस्याएं जस की तस बनी रहें।
उत्तराखंड की जनता अब आंकड़ों से नहीं, निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई से न्याय चाहती है।




