“क्या यही ‘कानून का राज’ है? ऋषिकेश के अवैध कैसीनो कांड पर सरकार की परीक्षा”

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उत्तराखंड ऋषिकेश, जिसे आध्यात्मिकता और शांति की नगरी कहा जाता है, वहां आइडीपीएल क्षेत्र के एक होटल में अवैध कैसीनो का भंडाफोड़ होना केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पुलिस की कार्रवाई में पार्षद समेत 40 लोगों की गिरफ्तारी, होटल का सील होना और भारी मात्रा में नकदी,

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

कैसीनो क्वाइन व शराब की बरामदगी यह दर्शाती है कि अवैध गतिविधियां कितनी संगठित और निर्भीक होकर चल रही थीं।
पहला सवाल यही उठता है—क्या इतनी बड़ी अवैध व्यवस्था बिना स्थानीय प्रशासन और पुलिस की जानकारी के चल सकती है? जिस तरह से एसएसपी द्वारा चौकी प्रभारी समेत 12 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया, वह यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं तंत्र की मिलीभगत या लापरवाही जरूर रही है। अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद यह नेटवर्क इतना बड़ा न बनता।
यह भी चिंताजनक है कि इस अवैध कैसीनो में दिल्ली और मेरठ से युवतियों को बुलाकर न केवल जुआ, बल्कि एक प्रकार का “मनोरंजन उद्योग” खड़ा किया गया था। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों पर भी गहरी चोट है। नकली नोटों का इस्तेमाल, शराब की खुलेआम उपलब्धता और राजनीतिक चेहरे की संलिप्तता इस पूरे मामले को और भी गंभीर बना देती है।
अब बड़ा सवाल—क्या इस कार्रवाई को सरकार की उपलब्धि माना जाए?
एक दृष्टिकोण यह कहता है कि हां, पुलिस ने कार्रवाई की, अपराधियों को पकड़ा और सिस्टम ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि जब अपराध इतने लंबे समय तक फलता-फूलता रहे और फिर अचानक पकड़ में आए, तो यह उपलब्धि कम और विफलता ज्यादा प्रतीत होती है।
सरकार यदि इसे उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि आखिर यह अवैध कैसीनो इतने दिनों तक क्यों चलता रहा? स्थानीय खुफिया तंत्र क्या कर रहा था? और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस रणनीति बनाई गई है?
ऋषिकेश जैसी धार्मिक नगरी में इस प्रकार की गतिविधियां केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रदेश की छवि का भी प्रश्न हैं। उत्तराखंड, जिसे “देवभूमि” कहा जाता है, वहां इस तरह के कांड यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि कहीं विकास और आधुनिकता के नाम पर हम अपनी मूल पहचान तो नहीं खो रहे।
इस पूरे प्रकरण में एक सकारात्मक पहलू यह जरूर है कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने तत्काल सख्त कार्रवाई करते हुए अपने ही विभाग के कर्मियों को निलंबित किया। यह संदेश देता है कि जवाबदेही तय हो रही है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इस नेटवर्क के पीछे के बड़े चेहरों तक भी कार्रवाई पहुंचेगी।
अंततः, यह घटना सरकार के लिए एक चेतावनी है—सिर्फ कार्रवाई कर देना काफी नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को पनपने से पहले रोकना ही असली सुशासन की पहचान है।
अगर सरकार इसे उपलब्धि बताना चाहती है, तो उसे यह साबित करना होगा कि यह केवल एक छापा नहीं, बल्कि सिस्टम में सुधार की शुरुआत है।


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