

अभिव्यक्ति की सज़ा या सत्ता की असहजता?उत्तराखंड एक बार फिर एक ऐसे प्रकरण के कारण राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है, जहाँ सवाल किसी एक महिला, किसी एक वीडियो या किसी एक एफआईआर का नहीं, बल्कि न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की प्राथमिकताओं का है। हल्द्वानी में 8 जनवरी 2025 को श्रीमती ज्योति अधिकारी की गिरफ्तारी ने समाज को आईना दिखा दिया है—कि हम किस ओर जा रहे हैं और किसे चुप कराना हमारी व्यवस्था के लिए सबसे आसान है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
ज्योति अधिकारी का अपराध क्या है?
सिर्फ इतना कि उन्होंने अंकिता भंडारी हत्याकांड में वर्षों से न्याय न मिलने की पीड़ा को आक्रोश में व्यक्त किया। एक वीडियो में दाराती हाथ में लेकर उन्होंने कुमाऊँ की महिलाओं और लोक-देवताओं से सवाल पूछा—“आपके होते हुए भी अंकिता को न्याय क्यों नहीं मिला?”
यह सवाल सत्ता के लिए असहज था, व्यवस्था के लिए चुभने वाला था—और शायद इसी कारण उसे “अपराध” बना दिया गया।
विडंबना देखिए—
जहाँ एक महिला की भावनात्मक अभिव्यक्ति पर धार्मिक आस्था आहत होने का दावा कर उसे जेल भेज दिया जाता है, वहीं प्रदेश और देश के कई हिस्सों में खुलेआम बंदूकें, तलवारें, त्रिशूल और अन्य हथियार लहराते जुलूस निकलते हैं।
कहीं “शक्ति प्रदर्शन” के नाम पर हथियार लहराए जाते हैं,
कहीं धार्मिक–राजनीतिक रैलियों में भय का वातावरण बनाया जाता है,
कहीं खुले मंचों से नफरत भरे भाषण दिए जाते हैं—
लेकिन उन पर न तो तत्काल गिरफ्तारी होती है, न ही न्यायिक हिरासत।
पिथौरागढ़ से वरिष्ठ समाजसेवी राजेंद्र भट्ट का सवाल सीधा और तीखा है—
“अंकिता के हत्यारों और वीआईपी संरक्षकों पर कार्रवाई क्यों नहीं? उल्टा चोर कोतवाल को डांटे—यह कहावत आज उत्तराखंड में सच होती दिख रही है।”
वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी प्रदेश कुकरेती, जो स्वयं अंकिता भंडारी मामले में सक्रिय भूमिका में रहे, स्पष्ट कहते हैं—
यह प्रकरण राजनीतिक रूप से प्रेरित है। वे न केवल ज्योति अधिकारी का समर्थन करते हैं, बल्कि यह भी कहते हैं कि यदि आज यह महिला हार गई, तो कल कोई और महिला अपने हक के लिए खड़ी होने का साहस नहीं जुटा पाएगी। यह समाज के मानसिक दिवालियेपन का प्रमाण होगा—और उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ी हार।
यहाँ एक और अहम बिंदु है—
जिस महिला द्वारा धार्मिक आस्था आहत होने की शिकायत की गई, यदि सच में आस्था इतनी गहरी होती, तो वह कुमाऊँ के न्याय के देवता गोलू देवता या कोटगड़ी देवी के दरबार में अर्जी लगाती।
सीधे पुलिस चौकी जाना, आस्था से अधिक राजनीतिक उद्देश्य की ओर इशारा करता है।
यह मामला साफ़ करता है कि यह धार्मिक भावना का नहीं, बल्कि
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
महिला पीड़ा,
और न्याय की मांग का प्रश्न है।
राज्य को तय करना होगा—
क्या वह उन आवाज़ों के साथ खड़ा होगा जो न्याय मांगती हैं,
या उन ताकतों के साथ जो हथियार लहराकर भी कानून से ऊपर बनी रहती हैं?
माननीय उच्च न्यायालय से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह इस प्रकरण का स्वतः संज्ञान लेकर यह स्पष्ट संदेश दे—
कि उत्तराखंड में सवाल पूछना अपराध नहीं है,
और बेटियों की आवाज़ को जेल की सलाखों के पीछे नहीं, न्याय के मंच पर सुना जाना चाहिए।
ज्योति अधिकारी कोई अपराधी नहीं, बल्कि उस समाज की आवाज़ हैं जो अंकिता के लिए आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है।
यदि यह आवाज़ दबाई गई, तो यह केवल एक महिला की नहीं—पूरे उत्तराखंड की हार होगी।
दाराती, देवता और लोकतंत्र
ज्योति अधिकारी प्रकरण: अभिव्यक्ति, आस्था और कानून के बीच फंसा उत्तराखंड
संपादकीय |संपादक अवतार सिंह बिष्ट, रुद्रपुर से निष्पक्ष विश्लेषण
उत्तराखंड एक संवेदनशील समाज है—यहाँ लोकदेवता हैं, गहरी सांस्कृतिक स्मृतियाँ हैं, स्त्री-सम्मान की परंपरा है और साथ ही एक युवा लोकतंत्र भी है, जो आज भी अपने मूल्यों को गढ़ने की प्रक्रिया में है। ऐसे समाज में जब कोई घटना घटती है, तो वह केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे राज्य की सामूहिक चेतना को झकझोर देती है।
हल्द्वानी में सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर ज्योति अधिकारी की गिरफ्तारी और 14 दिन की न्यायिक हिरासत ऐसी ही एक घटना है।
यह मामला न तो केवल “एक वीडियो” का है,
न ही केवल “धार्मिक भावनाओं” का,
और न ही केवल “कानून-व्यवस्था” का।
यह मामला न्याय, पीड़ा, भाषा की मर्यादा, अभिव्यक्ति की सीमा और राज्य की जिम्मेदारी—इन सबके टकराव का है।
घटना का तथ्यात्मक पक्ष
8 जनवरी 2025 को हल्द्वानी में मुखानी थाना पुलिस ने सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर ज्योति अधिकारी को गिरफ्तार किया। इससे पहले दिनभर उनसे पूछताछ हुई। गिरफ्तारी का आधार एक वीडियो और उससे जुड़ी शिकायत थी, जो सामाजिक कार्यकर्ता जूही चुफाल द्वारा दी गई।
एफआईआर में आरोप लगाया गया कि—
ज्योति अधिकारी ने अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान
कुमाऊँ की सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई,
लोकदेवताओं के अस्तित्व पर सवाल खड़े किए,
और एक वीडियो में दाराती (कृषि औज़ार) लहराई,
जिसे पुलिस ने आर्म्स एक्ट के अंतर्गत माना।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ
192, 196, 299, 302 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 27 के अंतर्गत मामला दर्ज किया।
अगले दिन मजिस्ट्रेट ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
आरोपों का एक पक्ष
पुलिस और शिकायतकर्ता के अनुसार—
वीडियो में प्रयुक्त भाषा आपत्तिजनक थी,
कुमाऊँ की महिलाओं को “नाचने वाली” कहना सामाजिक अपमान की श्रेणी में आता है,
लोकदेवताओं पर सवाल धार्मिक आस्था को ठेस पहुँचाते हैं,
और दाराती लहराना सार्वजनिक शांति के लिए खतरा माना जा सकता है।
कानून की दृष्टि से देखें तो— यदि कोई सार्वजनिक मंच पर ऐसी भाषा का प्रयोग करता है जिससे किसी समुदाय की भावनाएँ आहत हों,
या किसी वस्तु को भय पैदा करने के उद्देश्य से प्रदर्शित किया जाए,
तो राज्य को हस्तक्षेप का अधिकार है।
यह पक्ष कहता है कि—
“अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। उसकी भी सीमाएँ हैं।”
दूसरा पक्ष: पीड़ा और प्रश्न
लेकिन इस मामले का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ज्योति अधिकारी का वीडियो उस समय आया, जब—
अंकिता भंडारी हत्याकांड को तीन से चार वर्ष बीत चुके थे,
लेकिन पीड़ित परिवार और समाज को अभी भी पूर्ण न्याय का भरोसा नहीं था,
और राज्य में यह भावना गहरी हो रही थी कि “बड़े लोगों” पर कानून समान रूप से लागू नहीं होता।
इस पृष्ठभूमि में ज्योति अधिकारी ने एक भावनात्मक, आक्रोशपूर्ण प्रतिक्रिया दी।
यह प्रतिक्रिया शालीन भाषा में नहीं थी—यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन यह भी सच है कि उसका मूल भाव न्याय की मांग था, न कि हिंसा का आह्वान।
यहीं से सवाल उठता है—
क्या हर आक्रोश अपराध है?
क्या हर असहज सवाल देशद्रोह या धार्मिक अपमान है?
और क्या हर महिला की भावनात्मक प्रतिक्रिया को दंड के योग्य माना जाना चाहिए?
दाराती बनाम बंदूक: दोहरे मानदंड का प्रश्न
यह प्रकरण इसलिए भी बहस में आया क्योंकि समानांतर रूप से समाज में यह प्रश्न उठने लगा—
जब खुलेआम
बंदूकें,
तलवारें,
त्रिशूल,
और लाठी-भाले
धार्मिक या राजनीतिक जुलूसों में लहराए जाते हैं,
तो उन पर तुरंत आर्म्स एक्ट क्यों नहीं लगता?
उत्तराखंड ही नहीं, देश के कई हिस्सों में—
हथियारों के साथ शक्ति-प्रदर्शन,
डर पैदा करने वाले जुलूस,
और उकसाऊ भाषण
लंबे समय से होते रहे हैं।
यदि कानून समान है,
तो उसकी दृश्यता भी समान होनी चाहिए।
यही बिंदु इस मामले को “चयनित कार्रवाई” (Selective Action) की बहस में ले जाता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है,
लेकिन अनुच्छेद 19(2) उसके उचित प्रतिबंध भी तय करता है।
यानी—
आप बोल सकते हैं,
लेकिन नफरत नहीं फैला सकते,
आप सवाल उठा सकते हैं,
लेकिन हिंसा के लिए उकसा नहीं सकते।
ज्योति अधिकारी के मामले में प्रश्न यह नहीं है कि— क्या उन्होंने गलत भाषा का प्रयोग किया?
बल्कि प्रश्न यह है कि— क्या उस भाषा की सज़ा जेल होनी चाहिए, या संवाद?
लोकतंत्र में जेल अंतिम विकल्प होती है, पहला नहीं।
महिला स्वर और समाज की प्रतिक्रिया
यह भी एक तथ्य है कि जब—
कोई पुरुष आक्रामक भाषा बोलता है,
तो उसे “जोशीला” कहा जाता है,
लेकिन
जब कोई महिला वही करती है,
तो उसे “बड़बोली” कहा जाता है।
यह दोहरा सामाजिक पैमाना भी इस मामले में दिखाई देता है।
वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी प्रदेश कुकरेती का कथन इसी ओर इशारा करता है— कि यदि आज यह महिला दबा दी गई,
तो कल कोई और महिला सवाल उठाने से पहले दस बार सोचेगी।
यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।
धार्मिक आस्था का प्रश्न
शिकायत में धार्मिक भावनाओं के आहत होने की बात कही गई।
यह एक गंभीर विषय है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
लेकिन यहाँ भी प्रश्न उठता है— क्या हर देवता पर सवाल आस्था-विरोध है,
या कभी-कभी वह समाज को आईना दिखाने का तरीका भी हो सकता है?
इतिहास गवाह है— भक्ति आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधार आंदोलनों तक,
देवताओं से संवाद, प्रश्न और तर्क होते रहे हैं।
यह तय करना न्यायपालिका का काम है कि— यह प्रश्न अपमान था या पीड़ा की अभिव्यक्ति।
न्यायपालिका की भूमिका
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अब न्यायपालिका की है।
न्यायालय को यह देखना होगा कि—
क्या धाराएँ अनुपातिक हैं?
क्या हिरासत आवश्यक थी?
और क्या जमानत इस स्तर पर दी जानी चाहिए?
न्यायपालिका का हस्तक्षेप ही यह तय करेगा कि— यह मामला भविष्य में अभिव्यक्ति की मिसाल बनेगा या दमन की चेतावनी।
फैसला समाज के हाथ में
ज्योति अधिकारी न तो पूर्णतः निर्दोष साबित की जा सकती हैं,
न ही पूर्णतः अपराधी।
उन्होंने कठोर शब्द कहे—यह सच है।
लेकिन उन्होंने जो प्रश्न उठाया, वह भी उतना ही सच है।
उत्तराखंड को आज यह तय करना है— कि वह
सवाल पूछने वालों का राज्य बनेगा,
या
सवाल से डरने वाला।
न्याय तभी सार्थक होगा,
जब वह भावना और कानून,
दोनों को संतुलन में रखे।
यह मामला किसी एक महिला का नहीं,
बल्कि उत्तराखंड के लोकतांत्रिक चरित्र की परीक्षा है।
फैसला अदालत करेगी—
लेकिन इतिहास समाज




