जोश की विरासत: चंद्रमा देवी रावत को विनम्र संपादकीय श्रद्धांजलि? “लाठियों से न झुकीं, जोश से जलाईं आंदोलन की मशाल: चंद्रमा देवी रावत को नमन

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उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास केवल नारों, जुलूसों और ज्ञापनों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह अनगिनत ऐसे साधारण दिखने वाले असाधारण लोगों की गाथा है, जिन्होंने अपने जीवन की संध्या में भी राज्य की नींव मजबूत की। वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी चंद्रमा देवी रावत का 96 वर्ष की आयु में निधन इसी इतिहास का एक अमूल्य अध्याय बंद हो जाने जैसा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

चंद्रमा देवी रावत उन विरले व्यक्तित्वों में थीं, जिनके भीतर आंदोलन केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अस्तित्व का प्रश्न था। ग्राम उऐगी, पौड़ी गढ़वाल से लेकर ढंडेरा और रुड़की तक उन्होंने जिस तरह घर-घर जाकर लोगों को उत्तराखंड राज्य आंदोलन के लिए जागरूक किया, वह आज भी प्रेरणा देता है। एक ऐसे दौर में, जब महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी सीमित मानी जाती थी, चंद्रमा देवी ने आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर यह साबित किया कि राज्य निर्माण की लड़ाई में मातृशक्ति की भूमिका निर्णायक रही है।

रामपुर तिराहा जैसे दर्दनाक और निर्णायक मोड़ पर भी चंद्रमा देवी और उनके पति स्व. आनरेरी कैप्टन रामेश्वर सिंह रावत का साहस डिगा नहीं। लाठियां खाकर भी पीछे न हटना, यह दर्शाता है कि उत्तराखंड आंदोलन केवल युवाओं का नहीं, बल्कि बुजुर्गों की तपस्या और संकल्प का परिणाम था। यही कारण है कि पहाड़ की चिंगारी मैदानों तक पहुंची और अंततः उत्तराखंड एक पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।

आज जब उत्तराखंड अपने राज्य गठन के पच्चीस वर्ष पूरे कर चुका है, तब चंद्रमा देवी जैसी आंदोलनकारियों का जाना हमें एक कठोर प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या हमने उस सपने को पूरा किया, जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया था? क्या जिन मूल्यों, स्वाभिमान और अधिकारों के लिए उन्होंने सड़क पर लाठियां खाईं, वे आज की राजनीति और शासन में दिखाई देते हैं?

राजकीय सम्मान के साथ कनखल में हुआ उनका अंतिम संस्कार केवल एक औपचारिक विदाई नहीं, बल्कि यह स्मरण भी है कि राज्य की असली पूंजी उसके आंदोलनकारी हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उन्हें केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रखें, बल्कि उनके संघर्ष को नीति, प्रशासन और सामाजिक चेतना में जीवित रखें।

चंद्रमा देवी रावत भले ही हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनका जोश, उनका साहस और उनका समर्पण उत्तराखंड राज्य आंदोलन की आत्मा में सदैव जीवित रहेगा। यह हम सबकी


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