दारू में नींबू–नमक, और नीतियों में कड़वाहट—उत्तराखंड का बढ़ता नशा संकट”

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उत्तराखंड में शराब को लेकर बहस अब पुरानी हो चुकी है। अब यहां की जनता शराब के दामों, दुकान संख्या और भट्टियों की चर्चा नहीं करती—बल्कि अब चर्चा इस पर होती है कि शराब में ऐसा क्या मिलाया जाए कि कड़वाहट कम हो जाए, सांसों की बदबू मिट जाए और हैंगओवर ऐसे गायब हो जैसे सरकार की नीतियों से पारदर्शिता।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

पहले गांव-गांव में लोग खेती-किसानी पर बात करते थे, आजकल लोग नींबू–नमक–शराब के त्रिकोणीय सूत्र पर शोध कर रहे हैं। आप किसी ढाबे में चले जाइए, चर्चाएं सुनाई देंगी—
“भैंजी, दो चुटकी नमक डालो, थोड़ा रस टपकाओ, आज कलक्टर साहब की तरह कड़वा कड़वा नहीं पीना है…”

सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं, पर ‘दारु-प्रेम’ सरकारी धर्म बना रहा

हरीश रावत के दौर से बात शुरू करें। तब सरकार को लगा कि पहाड़ों का विकास सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य से नहीं होगा, बल्कि शराब की दुकानों के माध्यम से प्रदेश के आर्थिक चक्र को गति मिलेगी।
हुआ भी कुछ ऐसा—जहां सड़कें नहीं पहुंच पाईं, वहां शराब की दुकान पहुंच गई।
जंगलों में बंदरों से ज्यादा दिखने लगी थी दुकानें।

फिर समय बदला—और बदलते-बदलते धामी सरकार आ गई। आम जनता ने सोचा था कि अब शायद छिड़काव होगा संस्कारों का, लेकिन हुआ भट्टियों का।
हरीश रावत पहले नंबर पर थे, धामी जी ने सोचा—
“इतिहास में अपना नाम तभी चमकेगा जब आप प्रतिद्वंद्वी को कम से कम 10 कदम पीछे छोड़ दें।”
और फिर शराब नीति में ऐसा ब्रह्मास्त्र चला कि उत्तराखंड का हर कोना अब ‘डिस्टिलरी दर्शन स्थल’ बनने की दिशा में अग्रसर है।

तीर्थों में अब ‘तीर्थ-भट्टी परिक्रमा’ भी संभव

विश्व में शायद ही कोई प्रदेश होगा जहां तीर्थस्थलों के पास शराब भट्टियां खोलकर सरकार आध्यात्मिकता और ‘स्पिरिट’ के बीच की बारीक रेखा मिटाने का प्रयास कर रही हो।
हरिद्वार से 8 किलोमीटर दूर भट्टी—वाह! सौभाग्यशाली हैं हम।
ऋषिकेश, जिसे योग–ध्यान की राजधानी कहा जाता है, वहां पहली बार शराब की दुकान खुली—उस दिन हिमालय भी शायद शरमा गया होगा।

चारों धाम के पास—ध्यान की जगह नशा।
चिंतन की जगह चीयर्स!

अब तो बस इतना ही बाकी है कि सरकार यात्रियों के लिए नया पैकेज भी लॉन्च कर दे:
“चार धाम दर्शन + चार पेग प्रसादन”
या फिर
“स्पिरिचुअल स्पिरिट्स टूरिज्म – देवभूमि में देवदारु का स्वाद।”

जब पूरा प्रदेश नशे में हो, तो जनता की जरूरतें भी बदल जाती हैं

पहले लोग पूछते थे—
“पानी कब आएगा? सड़क कब बनेगी? डॉक्टर कब मिलेंगे? शिक्षा सुधरेगी या नहीं?”
आज पूछते हैं—
“कौन सा नींबू मिलाएं? काला नमक ठीक रहेगा या सादा?”

अब तो जिस तेजी से शराब के शौकीन लोग रिसर्च कर रहे हैं, ऐसा लगता है अगली पीढ़ी उत्तराखंड की संतोखिया पा जाएगी—
“पहाड़ में विकास नहीं हुआ, पर आर एंड डी जरूर हुई—दारु में मिलावट की कला में।”

नींबू–नमक: उत्तराखंड का नया ‘समाधान मॉडल’

रिपोर्ट्स और अफवाहों में दावा है कि शराब में नींबू-नमक मिलाने से स्वाद भी स्मूद होता है और हैंगओवर भी कम आता है।
वाह!
सरकारें शराब बढ़ाएं, जनता नींबू–नमक मिलाकर समस्या सुलझाए—
यह है उत्तराखंड का लोकतांत्रिक सहयोग मॉडल।

नींबू–नमक से कड़वाहट तो कम होती ही है, साथ ही पाचन में भी मदद मिलती है।
कितना सुंदर मेल है—शराब पेट खराब करे, नींबू पेट ठीक करे, और सरकार दोनों पर टैक्स ले।

अब तो “पेय–नीति” भी बनाई जा सकती है

जैसे पहाड़ों में कृषि नीति, पर्यटन नीति, पलायन रोकने की नीति बनती हैं, उसी तरह अब एक नई नीति भी बन सकती है—
“शराब स्वादन सुधार नीति 2025”
जिसमें यह बिंदु जरूर होंगे:

  1. राज्यभर में नींबू उत्पादन बढ़ाया जाए क्योंकि शराब बिक्री अब स्थायी है।
  2. नमक पर सब्सिडी दी जाए—क्योंकि जनता का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है, शराब के साथ स्वाद भी चाहिए।
  3. हर शराब की दुकान के बाहर सूचना बोर्ड लगाया जाए—
    “दो चुटकी नमक, आधा नींबू—कड़वाहट जीरो।”

जनता को आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है—शराब में भी और समाधान में भी

धामी सरकार शायद सोचती है—
“जब पूरा प्रदेश शराब पिएगा, तब रोजगार की जरूरत किसे पड़ेगी? नशे में लोग प्रश्न ही पूछना बंद कर देंगे!”

शायद इसीलिए नीति ऐसी बन रही है कि लोग जागरूक कम हों और नशे में वैज्ञानिक ज्यादा।
हर कोई अपना-अपना ‘मिक्सोलॉजी मास्टरक्लास’ चला रहा है:
“भैयाजी, आज ट्राई करो—नींबू 4 बूंद, नमक 2 चुटकी, पेग 60 ml, और जिंदगी झकास!”

व्यंग्य का दर्द भी उतना ही असली है जितना शराब का नशा

हम मजाक कर रहे हैं, पर सच्चाई यह है कि शराब ने उत्तराखंड को अंदर से खोखला कर दिया है—

पहाड़ी गांव खाली हो रहे हैं

नशा युवाओं को बर्बाद कर रहा है

अपराध बढ़ रहे हैं

शराब राजस्व के नाम पर शासन पूरी तरह निर्भर हो चुका है

और नीति ऐसी है जैसे प्रदेश को ‘नशा–समृद्ध’ बनाना लक्ष्य हो

आर्थिक तंगी दूर करने का सबसे आसान तरीका सरकारों ने यही सीख लिया—शराब बढ़ाओ, जनता को बहलाओ, राजस्व कमाओ।
प्रदेश एक खतरनाक सामाजिक मोड़ पर खड़ा है, और हम उसे व्यंग्य में इसलिए उभार रहे हैं—क्योंकि सच्चाई को सीधे कहने पर लोग नाराज हो जाते हैं।

लेकिन अंत में सवाल वही—कड़वाहट कम कैसे हो?

शराब की कड़वाहट कम करना चाहते हैं?
बदबू कम करना चाहते हैं?
हैंगओवर से बचना चाहते हैं?

हम आपको बड़ा ईमानदार सुझाव देंगे—
शराब में कुछ न मिलाइए—शराब ही न मिलाइए।
यस, यही असली उपाय है।
क्योंकि जो नशा सरकार की नीतियां दिलाती हैं, उसमें नींबू–नमक भी कम पड़ जाएंगे।

पर अगर प्रदेश को शराब के हवाले ही कर दिया गया है…
अगर हर तीर्थ के पास भट्टी खुलनी है…
अगर हर नीति का आधार ‘राजस्व’ ही है…

तो फिर जनता भी कहेगी—
“शराब तो दे दी सरकार ने, नींबू–नमक हमसे ले लो…
कड़वाहट कम करनी है—जिंदगी में भी और दारू में भी।”

उत्तराखंड में अब असली विकास यह है कि—
जहां सड़क नहीं, वहां शराब है।
जहां अस्पताल नहीं, वहां शराब है।
जहां रोजगार नहीं, वहां शराब है।
और जहां समाधान नहीं, वहां नींबू–नमक है।

जिस दिन जनता कड़वाहट कम करने के बजाय कारण पर ध्यान देगी,
उसी दिन देवभूमि फिर से देवभूमि बनेगी—
न कि “दारुभूमि उत्तराखंड”।


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