रुद्रपुर। शारदीय नवरात्रि के नौ दिवसीय पावन अनुष्ठान में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बाद कन्या पूजन और कलश विसर्जन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। श्रद्धालु कन्याओं में माँ भगवती का स्वरूप मानकर उनका पूजन करते हैं और श्रद्धा, भक्ति तथा कृतज्ञता के साथ नवरात्रि अनुष्ठान का समापन करते हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
सनातन परंपरा में कन्या पूजन को शक्ति स्वरूपा देवी के सम्मान, सेवा और आशीर्वाद प्राप्ति का प्रतीक माना गया है। वहीं, कलश विसर्जन के माध्यम से भक्त माँ भगवती से पूजा में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा माँगते हुए सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
कन्या पूजन की धार्मिक मान्यता
नवरात्रि में दो से दस वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करने की परंपरा प्रचलित है। अलग-अलग आयु की कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। सामान्य रूप से नौ कन्याओं के पूजन के साथ एक बालक को बटुक भैरव अथवा लांगूर के रूप में पूजने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
हालांकि, कन्या पूजन की संख्या, विधि और समय परिवार की परंपरा, क्षेत्रीय मान्यताओं तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
इस प्रकार करें कन्या पूजन
सबसे पहले कन्याओं और बालक को आदरपूर्वक आमंत्रित कर स्वच्छ स्थान पर आसन दें। परंपरा के अनुसार उनके चरण स्वच्छ जल से पखारें और साफ कपड़े से पोंछें। इसके बाद रोली, कुमकुम और अक्षत से तिलक लगाकर माँ दुर्गा का स्मरण करें।
कन्याओं को श्रद्धापूर्वक सात्विक भोजन कराया जाता है। पूरी, हलवा, काले चने, खीर, फल और मिठाई जैसे प्रसाद प्रचलित हैं। भोजन के बाद कन्याओं को उपहार, फल, वस्त्र या दक्षिणा अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट की जाती है।
पूजन के दौरान कन्याओं के प्रति सम्मान, स्नेह और आत्मीयता का भाव रखना सबसे महत्वपूर्ण है। अंत में माँ भगवती से परिवार की सुख-समृद्धि, आरोग्य और कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
व्रत के पारण का समय और विधि परिवार की परंपरा तथा संबंधित तिथि के अनुसार निर्धारित की जाती है।
कलश विसर्जन का पूजन विधान
नवरात्रि के समापन पर स्थापित कलश का पूजन कर विधिपूर्वक विसर्जन किया जाता है। कई परिवारों में यह कार्य नवमी के दिन होता है, जबकि कुछ परंपराओं में दशमी को कलश विसर्जन किया जाता है। इसलिए तिथि और मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग तथा अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करना उचित है।
कलश विसर्जन से पहले माँ दुर्गा की पूजा, आरती और क्षमा-प्रार्थना की जाती है। श्रद्धालु देवी मंत्रों का जाप कर माँ से परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
प्रचलित देवी मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।
या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
इसके बाद कलश, नारियल, चुनरी और पूजन सामग्री को श्रद्धापूर्वक संभालते हुए अपनी परंपरा के अनुसार पूजा संपन्न की जाती है। कलश के जल का उपयोग घर में छिड़काव, पौधों में अर्पण अथवा अन्य धार्मिक कार्यों के लिए स्थानीय रीति के अनुसार किया जा सकता है। जल को स्वच्छ स्थान पर ही अर्पित करना चाहिए।
कलश पर बँधे कलावे, नारियल, सिक्के और अन्य पूजन सामग्री के संबंध में भी अलग-अलग परिवारों की परंपराएं प्रचलित हैं। श्रद्धालु अपनी मान्यता के अनुसार उनका सम्मानपूर्वक उपयोग या विसर्जन कर सकते हैं।
अखंड ज्योति और माँ अपराजिता की आराधना
जिन घरों में नवरात्रि के दौरान अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है, वहाँ उसे निर्धारित अवधि तक सुरक्षित रखने की परंपरा है। दीपक को सुरक्षित स्थान पर रखें और आग से बचाव के सभी आवश्यक उपाय करें।
विजयादशमी पर माँ अपराजिता की पूजा की भी परंपरा है। यह पर्व धर्म की विजय, सदाचार और सकारात्मक संकल्पों का प्रतीक माना जाता है।
सनातन संस्कृति का संदेश
नवरात्रि केवल नौ दिनों की पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। यह पर्व नारी शक्ति के सम्मान, सेवा, संयम, सद्भाव और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। कन्या पूजन का वास्तविक संदेश भी यही है कि बेटियों का सम्मान केवल धार्मिक अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में भी किया जाए।
माँ जगदम्बा की आराधना करते हुए हमें जरूरतमंदों की सहायता, समाज में सद्भाव और मानवता के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।
माँ दुर्गा की कृपा सभी श्रद्धालुओं पर बनी रहे। जय माता दी!
— हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
