भ्रष्टाचार की नई जमीन : जब सत्ता और संपत्ति एक ही बिस्तर पर सोने लगें

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भारत में भ्रष्टाचार कोई नई बीमारी नहीं है, लेकिन अब यह महामारी बन चुका है। भूमि घोटाले — यानी जनता की जमीन को सत्ता के सौदागरों द्वारा औने-पौने दामों में अपने चहेतों को बाँट देना — आज देश के हर कोने में एक समान कहानी लिख रहा है। महाराष्ट्र से लेकर उत्तराखंड तक, सत्ता और पूंजी का गठजोड़ जिस तरह जनता की ज़मीन, हक़ और हिम्मत को निगल रहा है, वह लोकतंत्र की आत्मा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

हाल ही में दो घटनाएँ इस सड़े हुए तंत्र का चेहरा उजागर करती हैं — एक महाराष्ट्र में, जहाँ उपमुख्यमंत्री अजित पवार के पुत्र पार्थ पवार की कंपनी पर आरोप है कि उसने 1800 करोड़ रुपये की दलितों के लिए आरक्षित सरकारी ज़मीन मात्र 300 करोड़ में हड़प ली; और दूसरी घटना उत्तराखंड के रुद्रपुर में, जहाँ लगभग 500 करोड़ रुपये की सरकारी मछली तालाब भूमि को फर्जी तरीके से फ्री-होल्ड कर मॉल निर्माण के लिए बेच दिया गया।

दोनों ही मामलों में कहानी एक जैसी है — सत्ता के आशीर्वाद से ज़मीन पर कब्ज़ा, फाइलों में हेरफेर, सरकारी आदेशों की धज्जियाँ, और फिर सत्ताधारी नेताओं की “हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं” वाली सफाई। फर्क सिर्फ़ इतना है कि एक मामला देश के सबसे विकसित राज्य में है और दूसरा “देवभूमि” कहलाने वाले सबसे छोटे राज्य में।


महाराष्ट्र में ‘दलित ज़मीन’ का सौदा — राहुल गांधी का हमला और मोदी की चुप्पी

महाराष्ट्र के पिंपरी-चिंचवड़ इलाके में एक जमीन सौदे ने सियासत में भूचाल ला दिया है। यह जमीन मूलतः दलित समाज के लिए आरक्षित थी, लेकिन आरोप है कि सत्ता और पैसे के खेल में इसे महज ₹300 करोड़ में एक ऐसी कंपनी को बेच दिया गया, जिससे उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे पार्थ पवार का नाम जुड़ा हुआ है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे “ज़मीन चोरी” का नाम देते हुए तीखा हमला बोला है। उनके शब्दों में —

“महाराष्ट्र में ₹1800 करोड़ की सरकारी ज़मीन, जो दलितों के लिए आरक्षित थी, सिर्फ़ ₹300 करोड़ में मंत्री जी के बेटे की कंपनी को बेच दी गई। ऊपर से स्टाम्प ड्यूटी भी हटा दी गई — मतलब एक तो लूट, और उस पर कानूनी मुहर में भी छूट!”

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस मुद्दे पर चुप्पी बहुत कुछ कहती है — “क्या मोदी जी इसलिए चुप हैं क्योंकि उनकी सरकार उन्हीं लुटेरों पर टिकी है जो दलितों और वंचितों का हक़ हड़पते हैं?”

यह सवाल अब सिर्फ़ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है; यह पूरे देश के लिए आईना है। केंद्र सरकार, जो हर मंच पर ‘न्याय और सुशासन’ का दावा करती है, जब अपने सहयोगी राज्यों में होने वाले ऐसे सौदों पर चुप रहती है, तो यह चुप्पी खुद एक बयान बन जाती है — “भ्रष्टाचार अगर हमारे घर का है, तो वह अपराध नहीं, नीति है।”


देवभूमि में भ्रष्टाचार — रुद्रपुर का 500 करोड़ का तालाब घोटाला

इधर उत्तराखंड में, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ईमानदार छवि के लिए जाना जाता है, वहां भी भ्रष्टाचार की गंदगी तालाब से लेकर तहसील तक फैल चुकी है। रुद्रपुर में किच्छा बाईपास रोड पर झील के सामने स्थित 4.07 एकड़ सरकारी भूमि — जो मछली पालन के लिए आरक्षित थी — को नियमों को ताक पर रखकर फ्री-होल्ड कर दिया गया।

यह भूमि 1988 में नगर पालिका रुद्रपुर द्वारा मछली पालन हेतु नीलाम की गई थी, पर शासन की मंजूरी न मिलने से लीज़ कभी स्वीकृत नहीं हुई। बावजूद इसके, 2005 में कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों ने कथित रूप से सचिव आवास विभाग की मिलीभगत से इस भूमि को अपने नाम फ्री-होल्ड करा लिया।

2000 रुपये प्रति वर्गमीटर के सर्किल रेट पर बेची गई यह भूमि आज 1500 करोड़ रुपये से अधिक की मानी जा रही है। जांच में तत्कालीन जिलाधिकारी और अपर जिलाधिकारी ने इस फ्री-होल्ड को अवैध करार दिया था, लेकिन बाद में मामला “ऊपर से आए दबाव” में रफा-दफा कर दिया गया।

सूत्रों का कहना है कि इस सौदे में “शबाना इंफ्रास्ट्रक्चर” नामक बिल्डर, एक मंत्री का करीबी और कुछ प्रशासनिक अफसरों की भूमिका संदिग्ध है। जनता की मांग है कि इस पूरे मामले की सीबीआई जांच हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके।


दोनों राज्यों का एक ही चेहरा — सत्ता का कारोबार

अगर दोनों घटनाओं को ध्यान से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि राज्य कोई भी हो, सत्ता की प्रवृत्ति एक जैसी है।
जहाँ जनता की ज़मीन है, वहाँ सत्ता का लालच भी है।
जहाँ नियम हैं, वहाँ उनके तोड़ने के तरीके भी हैं।

महाराष्ट्र में जमीन दलितों की थी, उत्तराखंड में जनता की — दोनों जगह उसे “प्रभावशाली लोगों” ने कब्ज़ा लिया।
एक तरफ अजित पवार कहते हैं कि “हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं”, दूसरी ओर उत्तराखंड में अधिकारी कहते हैं “सारा काम नियमों के अनुसार हुआ”। लेकिन जनता सब समझती है — जब ज़मीन पर मॉल खड़ा हो रहा हो और फाइलें गायब हो रही हों, तो नियम नहीं, रिश्ते चल रहे होते हैं।


मोदी की चुप्पी और धामी सरकार की जिम्मेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा कहते हैं — “न खाऊँगा, न खाने दूँगा।” लेकिन जब उनके सहयोगी दल या उनके अपने मुख्यमंत्री के गृह जनपद में ऐसी घटनाएँ होती हैं, और केंद्र सरकार की तरफ से एक शब्द नहीं निकलता, तो यह नारा खोखला लगता है।

उसी तरह, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जो “भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड” की बात करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि रजत जयंती वर्ष में ऐसे घोटाले देवभूमि की आत्मा को कलंकित करते हैं। अगर सरकार वास्तव में ईमानदार है, तो उसे इस भूमि प्रकरण की सीबीआई जांच की सिफारिश करनी चाहिए — ताकि यह संदेश जाए कि “उत्तराखंड बिकाऊ नहीं, जवाबदेह है।”


राजनीति की नई परिभाषा — ज़मीन ही सत्ता है

भारत में ज़मीन सिर्फ़ संपत्ति नहीं, राजनीति की धुरी है।
जो ज़मीन पर काबिज़ है, वही सत्ता पर काबिज़ है।
दलितों, किसानों, गरीबों की ज़मीन धीरे-धीरे बिल्डरों, उद्योगपतियों और नेताओं के गठजोड़ के हवाले होती जा रही है।

आज दलितों की जमीन किसी मंत्रीपुत्र को जाती है, कल मछुआरों की जमीन किसी मॉल के नाम हो जाती है, और जनता चुप रहती है क्योंकि उसे भरोसा नहीं रहा कि न्याय मिलेगा। यही चुप्पी सत्ता की ताकत बन गई है।


सवाल जनता से भी है — क्या हम अब भी माफ करेंगे?

हम हर बार गुस्सा होते हैं, लेकिन फिर भूल जाते हैं।
हर चुनाव में वही चेहरे, वही भाषण, वही वादे, और वही भ्रष्टाचार दोहराया जाता है।
जब तक जनता भ्रष्टाचार को “स्वाभाविक” मानती रहेगी, तब तक यह भूमि घोटाले देश की नियति बने रहेंगे।


एक उम्मीद की आवाज़

भारत को आज ज़रूरत है एक ऐसी आवाज़ की, जो सत्ता के सामने झुके नहीं, जो दलितों, गरीबों और आम जनता की जमीन की रक्षा करे।
महाराष्ट्र हो या उत्तराखंड — दोनों घोटाले इस बात का संकेत हैं कि लोकतंत्र अब सिर्फ़ वोट से नहीं, सवालों से बचेगा।

अगर जनता सवाल नहीं पूछेगी, तो ज़मीन भी बिकेगी और उसका भविष्य भी।
यह वक्त है यह कहने का —




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