

उत्तराखंड के सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ बढ़ती बदतमीजी, गाली-गलौज और हिंसा की घटनाओं के बाद शासन ने सख्त रुख अपनाया है। विशेष रूप से शिक्षा निदेशालय में हुई हालिया मारपीट की घटना ने प्रशासन को झकझोर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी कर सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा कर दिया है। अब ड्यूटी पर तैनात लोक सेवकों के साथ दुर्व्यवहार करने वालों के खिलाफ सीधे भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) के तहत प्राथमिकी दर्ज की जाएगी और दोषियों को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा।
यह कदम केवल सुरक्षा प्रबंधन नहीं, बल्कि राजनीतिक कार्यशैली और कार्यालयीन संस्कृति पर भी सीधा प्रहार माना जा रहा है।
क्या है SOP का उद्देश्य?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
नई SOP का मुख्य उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को कार्यस्थल पर बाहरी आक्रामकता, अनावश्यक दबाव और हिंसा से भौतिक व विधिक सुरक्षा प्रदान करना है। यह व्यवस्था राज्य के सभी सरकारी कार्यालयों — निदेशालयों, जिलाधिकारी परिसरों, ब्लॉक कार्यालयों, शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों — में लागू होगी। सचिवालय और विधानसभा जैसे उच्च सुरक्षा वाले परिसरों को इससे बाहर रखा गया है।
नियमों के दायरे में आम नागरिक, ठेकेदार, समर्थक, जनप्रतिनिधि तथा उनके निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) भी समान रूप से शामिल होंगे।
एंट्री से लेकर बैठक तक सख्त नियम
नई व्यवस्था के तहत:
सभी कर्मचारियों को पहचान पत्र स्पष्ट रूप से धारण करना अनिवार्य होगा।
आम जनता के वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित रहेगा; केवल विशिष्ट अथवा दिव्यांगजनों के वाहनों को जांच के बाद अनुमति दी जाएगी।
प्रवेश द्वार पर डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर और शारीरिक जांच अनिवार्य होगी।
दुर्व्यवहार करने वालों की फोटोयुक्त “नो एंट्री” पंजिका रखी जाएगी।
विजिटर्स के लिए डिजिटल रजिस्ट्रेशन प्रणाली लागू की जाएगी। उच्च-रिज़ॉल्यूशन फोटो और वैध आईडी के सत्यापन के बाद क्यूआर कोड या RFID बैज जारी होगा, जिससे आगंतुक केवल निर्धारित ‘मीटिंग जोन’ तक सीमित रहेंगे। वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने के लिए पूर्व समय लेना अनिवार्य किया गया है।
प्रतिनिधिमंडल और राजनीतिक दबाव पर नियंत्रण
SOP के अनुसार किसी अधिकारी के कक्ष में एक समय में केवल दो व्यक्ति ही प्रवेश कर सकेंगे। यदि प्रतिनिधिमंडल दो से अधिक है, तो बैठक सीसीटीवी युक्त कॉन्फ्रेंस रूम में होगी। निर्वाचित प्रतिनिधि अधिकतम तीन लोगों के साथ ही प्रवेश कर सकेंगे।
वीआईपी के साथ आने वाले सशस्त्र सुरक्षा कर्मियों को अपने शस्त्र रिसेप्शन पर घोषित कर निर्धारित प्रतीक्षा कक्ष में ही रुकना होगा।
स्पष्ट है कि यह व्यवस्था उन स्थितियों को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई है, जहां बड़ी संख्या में समर्थकों के साथ पहुंचकर दबाव बनाने की प्रवृत्ति देखी जाती रही है।
गाली-गलौज और हिंसा पर सीधे FIR
लोक सेवक के साथ धक्का-मुक्की, मारपीट या अभद्र भाषा के प्रयोग पर तत्काल FIR दर्ज होगी। दोषियों को परिसर से निष्कासित कर भविष्य के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। जांच दो माह के भीतर पूरी करनी होगी और घटनास्थल को सील कर साक्ष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
राजनीतिक संस्कृति पर सीधा प्रश्न
यह SOP केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल है, जिसमें दफ्तरों में भीड़ लेकर जाना, नारेबाजी करना, अधिकारियों पर दबाव बनाना और कभी-कभी हिंसक व्यवहार तक पहुंच जाना “जनप्रतिनिधित्व” का हिस्सा समझ लिया गया था।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों का दायित्व जनता की समस्याओं को उठाना है, न कि प्रशासनिक प्रक्रिया को भय और दबाव के माध्यम से प्रभावित करना। यदि किसी भी दल के नेता या कार्यकर्ता मर्यादा में रहकर संवाद करते हैं, तो उन्हें इस SOP से कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए।
परंतु जिनकी राजनीति आक्रामक प्रदर्शन, भीड़तंत्र और व्यक्तिगत दबाव पर आधारित रही है, उनके लिए यह व्यवस्था असहज अवश्य साबित हो सकती है।
सवाल यह भी…
क्या यह सख्ती राजनीतिक शालीनता को बढ़ावा देगी?
या फिर इसे जनप्रतिनिधियों के अधिकारों पर अंकुश के रूप में देखा जाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में संवाद का स्थान सर्वोपरि है, लेकिन संवाद और दबाव की सीमा स्पष्ट होनी चाहिए। सरकारी कर्मचारी भी कानून द्वारा संरक्षित नागरिक हैं। यदि वे भयमुक्त वातावरण में कार्य नहीं कर पाएंगे, तो प्रशासनिक तंत्र कमजोर होगा।
उत्तराखंड सरकार की यह नई SOP एक प्रशासनिक सुधार के साथ-साथ राजनीतिक व्यवहार में परिवर्तन की मांग भी करती है। अब दफ्तरों में “दबंग छवि” से अधिक “संवाद की संस्कृति” को महत्व मिलेगा।
आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह कदम केवल कागजी सख्ती बनकर रह जाता है या वास्तव में सरकारी दफ्तरों की कार्यसंस्कृति और राजनीतिक मर्यादा दोनों में संतुलन स्थापित कर पाता




