

यह घटना केवल एक थप्पड़ की नहीं, बल्कि कानून के राज, लोकतांत्रिक अधिकारों और पुलिस की संवेदनशीलता पर करारा तमाचा है। देहरादून की सड़कों पर शांतिपूर्ण ढंग से अपनी नियुक्तियों की मांग कर रहीं नर्सिंग अभ्यर्थियों पर जिस तरह एक महिला पुलिसकर्मी ने महिला अभ्यर्थी को थप्पड़ मारा, वह बेहद शर्मनाक, असंवैधानिक और मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।

लोकतंत्र में विरोध अपराध नहीं
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का मौलिक अधिकार देता है। नर्सिंग अभ्यर्थी कोई अपराधी नहीं, बल्कि वे युवा हैं जो वर्षों की पढ़ाई के बाद अपने भविष्य की मांग कर रहे हैं। सवाल सरकार और सिस्टम से पूछा जाना चाहिए, लाठियों और थप्पड़ों से जवाब क्यों दिया जा रहा है?
नौकरी मांगना गुनाह नहीं है, गुनाह है युवाओं के सपनों को कुचलना।
पुलिस की वर्दी में कानून, न कि सत्ता का डर
पुलिस को यह याद रखना चाहिए कि वह सत्ता की नहीं, संविधान की रक्षक होती है। सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी पर हाथ उठाना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
थप्पड़ मारने वाली महिला कांस्टेबल ने न केवल अपने पद की गरिमा तोड़ी, बल्कि पूरी पुलिस व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है जब उत्तराखंड पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हों।
- कभी आंदोलनकारी युवाओं पर लाठीचार्ज,
- कभी महिलाओं के साथ अभद्रता,
- कभी पत्रकारों पर दबाव –
हर बार “जांच” और “कार्रवाई” का आश्वासन देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। सवाल यह है कि क्या पुलिस जवाबदेही से ऊपर हो चुकी है?
सरकार की चुप्पी भी अपराध के बराबर
इस पूरे मामले में सरकार की चुप्पी और प्रशासन की ढीली प्रतिक्रिया भी उतनी ही चिंताजनक है। अगर आज एक नर्सिंग छात्रा थप्पड़ खाती है और दोषी को बचा लिया जाता है, तो कल कोई भी बेटी सुरक्षित नहीं रहेगी।
सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वह युवाओं के साथ है या दमनकारी तंत्र के साथ।
कानून क्या कहता है?
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323, 352 और 354 के तहत मारपीट और महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाना गंभीर अपराध है। वर्दी किसी को कानून से ऊपर नहीं बनाती। अगर आम नागरिक ऐसा करता, तो तत्काल गिरफ्तारी होती—तो फिर वर्दीधारी पर अलग कानून क्यों?
यह समय लीपापोती का नहीं, निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई का है। आरोपी पुलिसकर्मी का:
- तत्काल निलंबन
- स्वतंत्र न्यायिक जांच
- और कड़ी दंडात्मक कार्रवाई जरूरी है।
नर्सिंग अभ्यर्थी भी इस देश के नागरिक हैं, उनका अपमान पूरे समाज का अपमान है। अगर आज पुलिस को आईना नहीं दिखाया गया, तो कल यह आईना किसी और की बेटी के सामने टूटेगा।
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है—यहां न्याय भी देवतुल्य होना चाहिए, दमन नहीं।




