

उत्तराखंड में महिलाओं और युवाओं के लिए प्रस्तावित Direct Benefit Scheme की चर्चाएं तेज हैं। बिहार की मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना और मुख्यमंत्री प्रतिज्ञा योजना की तर्ज पर यहां भी महिलाओं को स्वरोजगार के लिए शुरुआती आर्थिक मदद और युवाओं को इंटर्नशिप स्टाइपेंड देने की तैयारी की जा रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह की योजनाओं के संकेत मिलना स्वाभाविक रूप से कई सवाल भी खड़े करता है—क्या यह वास्तविक सशक्तिकरण है या फिर चुनावी बोर्ड पर खेला जा रहा एक और “राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक”?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के बयान से यह स्पष्ट है कि सरकार इस योजना को बजट और जरूरतों से जोड़कर देख रही है। महिलाओं को 10 प्रतिशत आरक्षण, स्वयं सहायता समूहों को ब्याजमुक्त ऋण जैसी योजनाएं पहले से चल रही हैं। अब सीधे खाते में पैसा डालने की तैयारी को महिला सशक्तिकरण और युवाओं के भविष्य से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नीति दीर्घकालिक रोजगार सृजन की मजबूत नींव रखेगी या फिर यह भी “फौरी राहत, स्थायी निर्भरता” का नया मॉडल साबित होगी?
राजनीति में यह कोई रहस्य नहीं है कि चुनाव से पहले सीधी कैश ट्रांसफर योजनाएं वोट बैंक को साधने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका बन चुकी हैं। हर दल अपने-अपने राज्यों में “फ्री स्कीम्स” का बोर्ड टांगकर जनता को लुभाने में लगा है। पैसों के दम पर बनाई गई ये योजनाएं कुछ समय के लिए राहत तो देती हैं, लेकिन क्या इससे पहाड़ों से पलायन रुकेगा, क्या स्थायी रोजगार पैदा होगा, क्या उद्योगों का ढांचा मजबूत होगा—इन सवालों का जवाब अब तक सरकारें नहीं दे पाई हैं।
युवाओं को 6000 रुपये स्टाइपेंड देकर इंटर्नशिप कराना अच्छा कदम हो सकता है, लेकिन उत्तराखंड के हजारों पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं के लिए यह स्थायी नौकरी का विकल्प नहीं बन सकता। इसी तरह महिलाओं को 10-10 हजार की शुरुआती राशि देकर स्वरोजगार का सपना दिखाना आकर्षक है, पर बाजार, प्रशिक्षण, रॉ मटेरियल और खरीद—इन सबकी ठोस व्यवस्था के बिना यह योजना कई बार कागजी साबित होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार चुनावी गणित से ऊपर उठकर वास्तविक आर्थिक सुधारों पर ध्यान दे। उत्तराखंड में छोटे उद्योग, पर्यटन, कृषि आधारित रोजगार, हथकरघा, दुग्ध उत्पादन, जड़ी-बूटी और होमस्टे जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक निवेश ही महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर बना सकता है। केवल बैंक खाते में पैसा डाल देना सशक्तिकरण नहीं कहलाता।
अगर प्रस्तावित Direct Benefit Scheme केवल चुनावी बोर्ड पर टंगी एक और लुभावनी घोषणा बन गई, तो यह भी समय के साथ “राजनीतिक पैसों का खेल” कहलाएगी। लेकिन यदि इसे पारदर्शिता, प्रशिक्षण, बाजार से जोड़कर और स्थायी रोजगार मॉडल के साथ लागू किया गया, तो यही योजना उत्तराखंड के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को सच में बदल सकती है। अब देखना यह है कि सरकार इसे वोट की पौध बनाती है या फिर विकास की जड़।




