सत्ता, सच और अंकिता की अस्मिता?जब अपराध सत्ता-संरक्षित हो जाए, तब न्याय की राह सबसे कठिन हो जाती है।

Spread the love


अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि सत्ता, पैसे और रसूख के उस गठजोड़ का भयावह प्रतीक है, जिसने देवभूमि की आत्मा को झकझोर दिया है। हालिया वायरल वीडियो और उससे जुड़े नए खुलासों ने इस मामले को फिर से सार्वजनिक विवेक के कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि वीडियो में कौन क्या कह रहा है, सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद सत्ता तंत्र अब भी क्यों मौन है?
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य की दो टूक इस सच्चाई की ओर इशारा करती है कि जब अपराध सत्ता-संरक्षित हो जाए, तब न्याय की राह सबसे कठिन हो जाती है। अंकिता ने अपनी अस्मिता से समझौता करने से इनकार किया और इसी का दंड उसे अपनी जान देकर चुकाना पड़ा—यह कथन भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यवस्था पर लगा एक कठोर अभियोग है। यदि यह हत्या दुर्घटना या किसी एक व्यक्ति की विकृति होती, तो सवाल इतने गहरे और इतने व्यापक न होते।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जिस कथित VVIP की भूमिका पर उंगलियाँ उठ रही हैं, उसे जांच के दायरे से बाहर रखा गया। क्या कानून भी पद और पहचान देखकर अपना रास्ता बदल लेता है? जाति की आड़ लेकर बचाव की राजनीति इस बात का प्रमाण है कि मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिशें जारी हैं। अपराध की कोई जाति नहीं होती—यह सिद्धांत सिर्फ भाषणों के लिए नहीं, न्याय की बुनियाद होना चाहिए।
उत्तराखंड में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ घटित घटनाओं की लंबी सूची सत्ता के सुशासन के दावों पर करारा तमाचा है। ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे माहौल की ओर इशारा करती हैं जहाँ अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण का भरोसा है। जब तक इस भरोसे को तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक “बेटी बचाओ” केवल नारा ही बना रहेगा।
पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का यह कहना कि मामले में गहराई तक जाना चाहिए, स्वागतयोग्य है—पर बयान तभी सार्थक होगा जब उसके बाद कार्रवाई भी हो। देवभूमि की जनता अब शब्दों से नहीं, ठोस कदमों से जवाब चाहती है।
अंकिता का मामला राजनीति से ऊपर इंसानियत का प्रश्न है। यदि सरकार वास्तव में निष्पक्ष है, तो स्वतंत्र और विश्वसनीय सीबीआई जांच से क्यों डर? आज देश पूछ रहा है—अंकिता को न्याय कब मिलेगा? और क्या कानून की नजर में VVIP भी उतना ही जवाबदेह होगा जितना एक आम नागरिक? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि देवभूमि में न्याय जीवित है या केवल सत्ता की छाया में दम तोड़ रहा है।


Spread the love