

रानीबाग (हल्द्वानी) केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उस आध्यात्मिक चेतना का सजीव प्रतीक है, जहाँ जीवन और मृत्यु एक-दूसरे से संवाद करते प्रतीत होते हैं। यह वही भूमि है जहाँ प्राचीन काल में ऋषि–मुनियों ने तपस्या की, जहाँ मार्कण्डेय ऋषि के तपोबल की गूंज आज भी अदृश्य रूप से बहती प्रतीत होती है और जहाँ वीरांगना जिया रानी—माता मौला देवी—की स्मृति श्रद्धा और बलिदान का अमिट प्रतीक बनकर स्थापित है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)
रानीबाग का श्मशान घाट जीवन की सबसे कठोर, परंतु सबसे सत्य तस्वीर सामने रखता है। यहाँ जलती चिताओं की अग्नि केवल शरीर को भस्म नहीं करती, बल्कि देखने वालों को जीवन की क्षणभंगुरता का गहरा बोध कराती है। रोते हुए परिजन, मौन खड़े मित्र, काँपते हाथों से अंतिम कर्म करते सगे-संबंधी—सब मिलकर यह स्मरण कराते हैं कि जन्म और मृत्यु ईश्वर की वही शाश्वत लीला है, जिससे कोई अछूता नहीं।
आज पुनः रानीबाग आना हुआ। अवसर था हमारे पारिवारिक मित्र, राजस्व विभाग में कार्यरत रहे अब्बल सिंह राणा जी की अंतिम यात्रा का। जैसे ही पुरानी बात (श्मशान क्षेत्र) पहुँचे, वातावरण में गहरी शांति और अदृश्य कंपन था। चिताओं की अग्नि जल रही थी, मंत्रोच्चार और सिसकियों के बीच जीवन का अंतिम अध्याय लिखा जा रहा था। उसी क्षण लगा कि रानीबाग केवल श्मशान नहीं, बल्कि एक जीवित आध्यात्मिक ग्रंथ है—जहाँ हर जलती चिता एक उपदेश देती है।
यहाँ मृत्यु भी भय नहीं देती, बल्कि वैराग्य सिखाती है। गंगा की धारा के समीप स्थित यह स्थल मानो कहता है—देह नश्वर है, आत्मा अमर। यही कारण है कि रानीबाग को लोग केवल अंतिम संस्कार का स्थान नहीं, बल्कि मोक्ष की ओर एक द्वार मानते हैं।
हमने उस क्षण को कैमरे में भी संजोया—किसी सनसनी के लिए नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक सत्य को शब्द और दृश्य देने के लिए, जो रानीबाग हर आगंतुक को मौन रूप से समझाता है।
स्वर्गीय अब्बल सिंह राणा जी को शत-शत नमन। उनका जीवन, उनका कर्म और आज उनकी अंतिम यात्रा—सब हमें यही सिखाकर गए कि मनुष्य का मूल्य उसके पद से नहीं, उसके संस्कारों से आँका जाता है।
रानीबाग आज भी साक्षी है—श्रद्धा का, बलिदान का, और उस सनातन सत्य का
“जो आया है, उसे जाना ही है; पर जो जीते-जी अर्थ समझ ले, वही वास्तव में धन्य है।”




