डिजिटल इंडिया की हकीकत: गैस बुकिंग के लिए फिर लाइन में खड़ी जनता”गैस का डर, साइबर ठगों का खेल — जब व्यवस्था की कमजोरी बन जाती है जनता की मुसीबत”

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“गैस का डर, साइबर ठगों का खेल — जब व्यवस्था की कमजोरी बन जाती है जनता की मुसीबत”
संपादकीय — अवतार सिंह बिष्ट, प्रधान संपादक, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
देश में इन दिनों एक अजीब सा माहौल बनता जा रहा है। एक तरफ दुनिया के कई हिस्सों में तनाव और युद्ध की खबरें हैं, दूसरी तरफ आम आदमी की रसोई में गैस सिलेंडर को लेकर बेचैनी बढ़ती दिखाई दे रही है। बाजार में कमर्शियल गैस सिलेंडरों की सप्लाई बाधित होने की खबरें आ रही हैं, होटल और रेस्टोरेंट संचालक परेशान हैं, और कई शहरों में घरेलू गैस सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी कतारें दिखाई देने लगी हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि आम जनता की इस चिंता और घबराहट को अब साइबर ठगों ने अपना नया हथियार बना लिया है।
दिल्ली पुलिस ने हाल ही में जो चेतावनी जारी की है, वह केवल एक साइबर अपराध की सूचना नहीं है, बल्कि यह उस कमजोर व्यवस्था का भी आईना है, जिसमें अफवाह और डर इतनी तेजी से फैल जाते हैं कि अपराधियों के लिए अवसर बन जाता है।
आज देश के कई हिस्सों में लोगों को फोन कॉल आ रहे हैं। कॉल करने वाला व्यक्ति खुद को गैस एजेंसी का कर्मचारी बताता है। वह कहता है कि जल्द ही गैस की भारी कमी होने वाली है, इसलिए तुरंत सिलेंडर बुक करा लें। वह अंतरराष्ट्रीय हालात, युद्ध और सप्लाई चेन टूटने जैसी बातें कहकर लोगों को डराता है।

डिजिटल इंडिया के चमकदार नारों के बीच गैस सिलेंडर की ऑनलाइन बुकिंग ठप पड़ जाना एक अजीब विडंबना है। दुनिया में कहीं Israel, United States और Iran के बीच तनाव और युद्ध की खबरें हैं, और इधर भारत में लोग गैस बुक करने के लिए लाइन में खड़े हैं। सवाल यह है कि जब सरकार डिजिटल व्यवस्था की इतनी बड़ी सफलता का दावा करती है, तो गैस जैसी बुनियादी सेवा ऑनलाइन क्यों नहीं हो पा रही? क्या यही है नया भारत, जहां ऐप और पोर्टल तो हैं लेकिन काम नहीं करते? यह स्थिति बताती है कि प्रचार की डिजिटल चमक और जमीन की सच्चाई के बीच अभी भी बड़ा अंतर है।


घबराया हुआ उपभोक्ता जब उसकी बातों पर भरोसा कर लेता है, तब असली खेल शुरू होता है।
फोन के बाद व्हाट्सएप पर एक लिंक भेजा जाता है। उस लिंक में लिखा होता है कि तुरंत सिलेंडर बुक करें या एडवांस पेमेंट करके अपनी डिलीवरी सुनिश्चित करें। यह लिंक दिखने में इतना असली लगता है कि सामान्य व्यक्ति को यह समझ ही नहीं आता कि यह नकली वेबसाइट है।
जैसे ही उपभोक्ता उस वेबसाइट पर जाकर अपनी बैंक डिटेल्स, कार्ड नंबर या OTP दर्ज करता है, उसका बैंक खाता साफ हो जाता है।
ना सिलेंडर आता है और ना पैसा वापस मिलता है।
यह केवल एक साइबर अपराध नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक और प्रशासनिक कमजोरी का परिणाम है, जहां जनता को सही समय पर स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती और अफवाहें सच से ज्यादा तेज़ दौड़ने लगती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकार और तेल कंपनियां लगातार यह दावा कर रही हैं कि घरेलू गैस सिलेंडरों की कोई कमी नहीं है, तो फिर ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था कई जगहों पर प्रभावित क्यों दिखाई दे रही है?
अगर वास्तव में गैस की आपूर्ति सामान्य है, तो लोगों को एजेंसियों के बाहर लाइन लगाने की नौबत क्यों आ रही है?
अगर सब कुछ व्यवस्थित है, तो जनता के मन में यह डर क्यों पैदा हो रहा है कि कहीं गैस खत्म न हो जाए?
यही वह खाली जगह है, जिसे साइबर ठग भर देते हैं।
आज डिजिटल इंडिया का नारा दिया जा रहा है। सरकार हर सेवा को ऑनलाइन करने का दावा करती है। लेकिन जब गैस जैसी बुनियादी जरूरत के मामले में ऑनलाइन बुकिंग ही सुचारू रूप से नहीं चल पा रही, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर डिजिटल व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है?
क्या यह केवल विज्ञापनों और घोषणाओं तक सीमित है?
सच्चाई यह है कि जब किसी व्यवस्था में पारदर्शिता और भरोसे की कमी होती है, तब अफवाहें जन्म लेती हैं। और जहां अफवाहें होती हैं, वहां अपराधियों के लिए अवसर पैदा हो जाता है।
आज जरूरत केवल साइबर अपराधियों से सावधान रहने की नहीं है, बल्कि सरकार और संबंधित विभागों को भी अपनी व्यवस्थाओं की समीक्षा करनी होगी।
अगर गैस की आपूर्ति वास्तव में पर्याप्त है, तो फिर जनता को यह विश्वास दिलाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम को मजबूत बनाना होगा, एजेंसियों की निगरानी करनी होगी और समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करनी होगी।
डिजिटल इंडिया का सपना तभी साकार होगा जब डिजिटल सेवाएं वास्तव में भरोसेमंद और सुचारू रूप से उपलब्ध हों।
अन्यथा जनता की मजबूरी, डर और अव्यवस्था का फायदा उठाकर साइबर ठग हर बार कोई नया जाल बिछाते रहेंगे।
और तब सवाल केवल अपराधियों पर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भी उठेगा जिसने अनजाने में उन्हें यह अवसर दिया।
आज जरूरत है जागरूकता की भी और जवाबदेही की भी।
क्योंकि जब रसोई की आग पर संकट की छाया पड़ती है, तब केवल गैस सिलेंडर नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता भी कसौटी पर आ जाती है।
— अवतार सिंह बिष्ट
प्रधान संपादक
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स


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