सड़क हादसों ने छीन ली चार घरों की खुशियाँ — उत्सव की रात मातम में बदल गई

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रुद्रपुर।शनिवार की रात चार परिवारों के लिए ऐसी काली साबित हुई, जिसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी। एक ओर घर में शहनाइयाँ बज रही थीं, वरमाला की तैयारियाँ चल रही थीं, रिश्तेदार आशीर्वाद दे रहे थे — वहीं कुछ ही घंटों में वही घर मातम के सन्नाटे में बदल गया। जिन घरों में संगीत और मुस्कान गूंज रही थी, वहाँ अब सिर्फ रोने की आवाजें, टूटे सपनों और अधूरे रिश्तों का दर्द बाकी है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

पहला दर्दनाक हादसा महतोष मोड़ के पास हुआ, जहाँ तेज गति और लापरवाही ने चार जिंदगियों को पल भर में निगल लिया।
ग्राम खेमेरी बिलासपुर निवासी 24 वर्षीय आयुष सिंह रिश्ते के भाई के विवाह में शामिल होने आए अपने दोस्त रोहित रावत को बस स्टेशन छोड़ने जा रहे थे। साथ में अंशुल बिष्ट और राजेंद्र सिंह पांडा भी कार में सवार थे। रात लगभग 11 बजे, कार संख्या UK 06 BJ 7675 जब महतोष मोड़ के पास पहुँची, तभी सामने से आ रही ट्रैक्टर-ट्राली से जोरदार भिड़ंत हो गई। टक्कर इतनी भयानक थी कि कार के परखच्चे उड़ गए।

हादसे के बाद सभी चार युवक गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने आयुष सिंह और अंशुल बिष्ट को मृत घोषित कर दिया।
राजेंद्र सिंह और रोहित रावत की हालत नाजुक बनी हुई है और उन्हें बेहतर इलाज के लिए रिफर किया गया है। बताया गया कि मृतक अंशुल अमेरिका की एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे और विशेष रूप से विवाह समारोह में शामिल होने भारत आए थे। कौन जानता था कि खुशियों की इस यात्रा का अंत मौत से होगा।


दूसरी ओर, लालपुर टोल प्लाज़ा के पास हुई सड़क दुर्घटना ने दो और परिवारों में चीख पुकार मचा दी।
ग्राम मोहम्मदपुर बहेड़ी, जिला बरेली निवासी अरबराज (22) और जीशान (25) बाइक संख्या UP 25 EE 9503 से रुद्रपुर से घर लौट रहे थे। रात करीब 12 बजे उनकी बाइक को तेज गति से आ रही निजी बस संख्या UK 06 PA 1963 ने जोरदार टक्कर मार दी।

दोनों युवक सड़क पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र किच्छा लाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने जीशान को मृत घोषित कर दिया।
अरबराज की नाजुक हालत देखते हुए उसे जिला अस्पताल रुद्रपुर भेजा गया, लेकिन अस्पताल पहुँचने से पहले ही उसने भी दम तोड़ दिया।

अरबराज चार भाइयों और तीन बहनों में सबसे छोटा था।
जीशान तीन भाइयों में मंझला था।
इनके घरों में सुबह लौटने की उम्मीद थी, लेकिन बदले में दो ताबूत लौटे — और लौट आई चीखें, बहनें बेहोश, माँ-बाप बेसुध और रिश्तेदार रोते-बिलखते।
सड़कें तेज रफ़्तार की कब्रगाह क्यों बनती जा रही हैं?इन दोनों हादसों ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है —
क्या हमारी सड़कें और यातायात व्यवस्था युवाओं की कब्रगाह बन चुकी हैं?

तेज रफ़्तार?ओवरटेकिंग की होड़,शराब व नशे के बाद वाहन चलाना,
भारी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही
पुलिस गश्त और जागरूकता की कमी

कितनी जिंदगियां और चली जाएँगी, तब जाकर किसी की नींद टूटेगी?
हर त्यौहार, हर शादी, हर मौक़ा — सड़क हादसों से तबाह हुआ एक परिवार अपने साथ इंसानी चेतावनी छोड़ जाता है। मगर कुछ ही दिनों में हम फिर भूलकर वही गलती दोहराने लगते हैं।
आज सवाल सिर्फ प्रशासन से नहीं, समाज से भी है
क्या तेज रफ़्तार हमारे युवाओं की पहचान बन चुकी है?
क्या लाइसेंस देना ही ट्रैफिक की जिम्मेदारी पूरी कर देना है?
क्या सड़क सुरक्षा अभियान सिर्फ पोस्टर तक सीमित रहेगा?
क्या ट्रक और बस चालकों पर कोई सख्त निगरानी नहीं होनी चाहिए?जीवन की कीमत कुछ लाख रुपये के मुआवजे या दो पंक्ति समाचार से कहीं ज्यादा है।
शनिवार की रात चार घरों के लिए अभिशाप बन गई।
एक पल में टूटी चार माएँ, चार बाप, आठ कंधों पर उठते जनाज़े और अनगिनत दोस्त, रिश्तेदार, सपने, करियर और भविष्य — सब खत्म।

लेकिन सवाल यह भी है —
क्या अगली काली रात किसी और घर का इंतज़ार कर रही है?

यदि अब भी समाज, प्रशासन और युवा नहीं जागे
तो अगला दुखद समाचार शायद किसी और परिवार नहीं — हमारे अपने घर से होगा।


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