

उत्तराखंड सरकार अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं को अपनी उपलब्धियों में गिनाती है। घोषणाओं के मंच से लेकर सरकारी प्रेस नोट्स तक यही कहा जाता है कि प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर लगातार बेहतर हो रहा है। लेकिन डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय और मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी की हकीकत सरकार के इन दावों की पोल खोलती है। यहां कार्यरत उपनल (उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड) के माध्यम से लगे कर्मचारियों को पिछले छह माह से वेतन तक नहीं मिला है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
वास्तविकता यह है कि ये कर्मचारी, जिन पर अस्पताल और मेडिकल कॉलेज का आधा बोझ टिका है, आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। परिवार पालना मुश्किल हो गया है, कई कर्मचारियों पर कर्ज चढ़ गया है, और कई रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उधार लेने को मजबूर हो गए हैं। यह स्थिति न केवल संवेदनहीनता दर्शाती है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की अक्षमता और गंभीर प्रशासनिक अनियमितताओं को भी उजागर करती है।
वेतन संकट की जड़: बजट और डीडीओ अधिकारों का खेल?कर्मचारियों का कहना है कि छह माह से वेतन लंबित है। 10 सितंबर 2025 को चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 22 करोड़ रुपये का बजट जारी किया है। इसके बावजूद पैसा कर्मचारियों तक नहीं पहुंचा। कारण यह बताया जा रहा है कि वर्तमान में प्राचार्य महोदय के पास डीडीओ (ड्रॉइंग एंड डिसबर्सिंग ऑफिसर) अधिकार नहीं हैं, इसलिए भुगतान अटका हुआ है।
यह सवाल उठता है कि जब सरकार जानती थी कि कर्मचारियों का वेतन छह महीने से रुका हुआ है, तो उसने समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की? क्या यह सरकारी तंत्र की नाकामी नहीं है कि फाइलों और अधिकारों के खेल में हजारों परिवारों का चूल्हा ठंडा हो गया?
सुशीला तिवारी अस्पताल: अनियमितताओं का गढ़?यह पहला मौका नहीं है जब हल्द्वानी का यह बड़ा चिकित्सा संस्थान विवादों में आया हो। कभी दवाइयों की खरीद पर सवाल उठते हैं, कभी डॉक्टरों की कमी पर, कभी उपकरण धूल फांकते रह जाते हैं तो कभी अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही से मरीजों को जान गंवानी पड़ती है।
अब यह मामला भी जुड़ गया है कि उपनल कर्मचारियों को महीनों वेतन नहीं दिया जा रहा। यह दर्शाता है कि संस्थान के भीतर गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अव्यवस्थाएं व्याप्त हैं।
- बजट का समय पर उपयोग न होना
- डीडीओ अधिकारों को लेकर टालमटोल
- कर्मचारियों की समस्याओं पर उदासीनता
- मरीजों और कर्मचारियों दोनों के साथ अन्याय
ये सब मिलकर सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज की छवि को धूमिल कर रहे हैं।
सरकार और विभाग की जिम्मेदारी?जब कोई कर्मचारी उपनल जैसे सरकारी माध्यम से नौकरी करता है, तो वह सरकार की नीतियों और फैसलों पर विश्वास करके ही काम करता है। लेकिन जब उसे महीनों वेतन ही नहीं मिलता, तो यह विश्वास डगमगाने लगता है।
प्रदेश सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है कि न केवल बजट जारी करें बल्कि यह सुनिश्चित भी करें कि समय पर कर्मचारियों के खातों में वेतन पहुंचे। महज बजट आदेश निकाल देने से जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती।
कुमाऊं मंडल आयुक्त दीपक रावत और नव नियुक्त निदेशक डॉ. अजय आर्य को इस मामले में तत्काल दखल देकर समाधान करना चाहिए।
कर्मचारियों की दयनीय हालत?आज उपनल कर्मचारी, जिनकी संख्या सैकड़ों में है, मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर टूट चुके हैं।
- घर का किराया देने के लिए पैसा नहीं है।
- बच्चों की फीस बकाया है।
- रोजमर्रा की जरूरतों के लिए उधारी बढ़ गई है।
- कई कर्मचारियों ने इलाज के लिए कर्ज लिया है।
ये सब एक सरकारी संस्थान से जुड़े कर्मचारियों के साथ हो रहा है, जो सीधे जनता की सेवा में लगे हुए हैं।
उत्तराखंड सरकार के दावों पर सवाल?उत्तराखंड सरकार “स्वस्थ उत्तराखंड, सशक्त उत्तराखंड” का नारा देती है। मुख्यमंत्री सेवा संकल्प और स्वास्थ्य पखवाड़े जैसे अभियान शुरू करते हैं। लेकिन जब उसी प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज के कर्मचारी वेतन को तरसते हैं, तो यह नारा खोखला साबित होता है।
सरकार को जवाब देना होगा:
- छह माह तक वेतन क्यों रोका गया?
- बजट आदेश के बाद भी भुगतान क्यों नहीं हुआ?
- डीडीओ अधिकारों का संकट पहले क्यों नहीं सुलझाया गया?
- कर्मचारियों को राहत कब तक मिलेगी?
उपनल प्रणाली पर भी सवाल?यह पूरा प्रकरण उपनल भर्ती प्रणाली की खामियों को भी उजागर करता है। कर्मचारियों की नियुक्ति तो उपनल से की जाती है, लेकिन उनकी जिम्मेदारी और वेतन भुगतान को लेकर कोई स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होती।
इससे कर्मचारी अक्सर असुरक्षा और शोषण के शिकार बनते हैं। अगर सरकार वास्तव में गंभीर है, तो उसे उपनल कर्मचारियों की सेवा शर्तें दुरुस्त करनी होंगी और नियमित वेतन भुगतान की गारंटी देनी होगी।
संपादकीय आह्वान?यह मामला महज वेतन का नहीं है, यह मामला सरकारी जवाबदेही और संवेदनशीलता का है। यदि सरकार और विभाग समय रहते समाधान नहीं करते, तो यह न केवल कर्मचारियों का विश्वास तोड़ेगा बल्कि जनता में भी सरकार की नीयत और नीतियों पर सवाल खड़े करेगा।
आज आवश्यकता है कि –
- उपनल कर्मचारियों का बकाया वेतन तत्काल जारी किया जाए।
- प्राचार्य या किसी सक्षम अधिकारी को डीडीओ अधिकार सौंपे जाएं।
- अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में व्याप्त अनियमितताओं की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
- भविष्य में इस तरह की स्थिति न दोहराई जाए, इसके लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।
डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय और मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी प्रदेश का एक प्रतिष्ठित संस्थान है। यहां हर दिन हजारों मरीज इलाज के लिए आते हैं। अगर यहां काम करने वाले कर्मचारी ही उपेक्षित रहेंगे, तो मरीजों को बेहतर सेवा देने की उम्मीद करना बेमानी है।
सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द कार्रवाई करे और कर्मचारियों को उनका अधिकार दिलाए। वरना यह वेतन संकट प्रदेश के स्वास्थ्य तंत्र पर जनता के विश्वास को और गहरा आघात पहुंचाएगा।
यह संपादकीय उत्तराखंड सरकार और चिकित्सा शिक्षा विभाग के लिए चेतावनी है कि यदि संवेदनशील मुद्दों पर उदासीनता जारी रही, तो जनता और कर्मचारी दोनों मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करेंगे।




