

रुद्रपुर।देवभूमि उत्तराखंड की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होने जा रही है। आगामी 7 दिसंबर 2025, रविवार को रुद्रपुर में आयोजित होने जा रही शिवसेना की महत्वपूर्ण प्रदेश स्तरीय बैठक को लेकर राजनीतिक हलकों में जबरदस्त हलचल है। इस बैठक को सीधे तौर पर ‘मिशन 2027’ के आगाज़ के रूप में देखा जा रहा है। बैठक की अध्यक्षता शिवसेना उत्तराखंड अभियान के प्रमुख पुरनचंद्र भट्ट करेंगे, जबकि इसमें शिवसेना के प्रदेश अध्यक्ष सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहेंगे।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, (अध्यक्ष उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
यह बैठक केवल एक संगठनात्मक सभा नहीं, बल्कि उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दों पर निर्णायक संघर्ष की रूपरेखा तय करने वाला मंच मानी जा रही है।
रुद्रपुर। उत्तराखंड में शिवसेना के विस्तार अभियान के तहत वरिष्ठ समाजसेवी एवं संगठन से जुड़े पुरन चंद भट्ट की मुलाकात महाराष्ट्र के शिवसेना संगठन मंत्री श्रीमान राम भाऊ रपाले जी से हुई। यह स्पष्ट किया गया कि पुरन चंद भट्ट की ,शिवसेना के शीर्ष संगठनात्मक पदाधिकारी राम भाऊ रपाले से हुई है। उल्लेखनीय है कि पुरन चंद भट्ट वर्ष 1992 से 2004 तक वर्तमान उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे साहेब के सहयोगी के रूप में कार्य कर चुके हैं, जिससे वे शिवसेना की नीतियों, संगठनात्मक कार्यशैली और जमीनी रणनीति से पूरी तरह वाकिफ हैं।
शिवसेना का लक्ष्य: देवभूमि की अस्मिता, सुरक्षा और स्वाभिमान
शिवसेना नेतृत्व का स्पष्ट मानना है कि उत्तराखंड आज राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, पलायन, भूमि माफियाओं, अपराध, धर्मांतरण और सांस्कृतिक क्षरण के गंभीर दौर से गुजर रहा है। राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी जनता को वह स्वप्न साकार होते नहीं दिख रहा, जिसके लिए आंदोलन हुआ था।
पुरनचंद्र भट्ट का कहना है कि—
“उत्तराखंड सीमावर्ती और सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील राज्य है। यदि इसे कमजोर किया गया तो इसका सीधा असर राष्ट्र की सुरक्षा पर पड़ेगा। देवभूमि को विधर्मियों, माफियाओं, भू-कारोबारियों और भ्रष्ट तंत्र से मुक्त कराना ही शिवसेना का लक्ष्य है।”
उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दे होंगे केंद्र में
रुद्रपुर बैठक में जिन प्रमुख मुद्दों पर रणनीति बनने जा रही है, वे इस प्रकार हैं:
1. स्थायी राजधानी का सवाल – गैरसैंण अब भी अधर में
राज्य निर्माण के 25 वर्ष बाद भी उत्तराखंड की स्थायी राजधानी घोषित नहीं हो पाना सरकारों की सबसे बड़ी विफलता मानी जा रही है। जनता की प्रबल मांग है कि गैरसैंण को स्थायी राजधानी घोषित किया जाए क्योंकि वह भौगोलिक और भावनात्मक रूप से राज्य का केंद्र है।
आज भी गैरसैंण में विधानसभा भवन होने के बावजूद इसे स्थायी राजधानी का दर्जा नहीं दिया गया, जिस कारण पहाड़ की जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है। शिवसेना इस मुद्दे को आंदोलन के रूप में उठाने की रणनीति बना रही है।
2. पहाड़ी क्षेत्रों को 5वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं, लेकिन आज भी इन्हें संविधान की 5वीं अनुसूची का संरक्षण प्राप्त नहीं है।
इसका परिणाम यह है कि:
- जल, जंगल, जमीन पर स्थानीय लोगों का अधिकार कमजोर होता जा रहा है
- बाहरी भूमाफिया बड़े पैमाने पर जमीनें खरीद रहे हैं
- संस्कृति और जनसंख्या संतुलन प्रभावित हो रहा है
शिवसेना इस मुद्दे को केंद्र सरकार तक मजबूती से उठाने की तैयारी में है।
3. वन अधिनियम 1980 – किसानों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप
वन अधिनियम 1980 पहाड़ के किसानों के लिए एक कानूनी जाल बन चुका है।
किसान अपनी ही जमीन पर:
- पेड़ नहीं काट सकता
- नया पेड़ नहीं लगा सकता
- पशुओं के लिए चारा नहीं जुटा सकता
शिवसेना का मानना है कि इस कानून में संशोधन किए बिना पहाड़ का विकास संभव नहीं।
4. आवारा गोवंश – गांव, नगर और किसानों के लिए गंभीर संकट
गोहत्या पर रोक के बाद आवारा गोवंश, सांड और बैल पहाड़ से लेकर मैदान तक भारी समस्या बन चुके हैं:
- किसानों की फसलें तबाह
- सड़क दुर्घटनाएं बढ़ीं
- बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की जान खतरे में
- गंदगी और बीमारी का स्रोत
शिवसेना का प्रस्ताव:
- हर ब्लॉक में सरकारी सहायता से गौशालाओं का निर्माण
- स्थानीय लोगों को गौसेवक के रूप में रोजगार
- गोबर से जैविक खाद और गोबर गैस परियोजनाएं
- इससे रोजगार भी मिलेगा और गोवंश की रक्षा भी होगी
5. पहाड़ी क्षेत्रों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं
राज्य गठन के बाद भी आज तक:
- पहाड़ी जिलों में सुविधायुक्त अस्पताल नहीं
- डॉक्टरों की भारी कमी
- मरीजों को इलाज के लिए मैदानी जिलों में जाना मजबूरी
इसके कारण गांव के गांव खाली हो रहे हैं। शिवसेना मांग कर रही है कि:
- हर तहसील स्तर पर उन्नत अस्पताल बने
- डॉक्टरों की स्थायी तैनाती हो
- हेली मेडिकल सेवा को नियमित किया जाए
6. शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और पलायन
पर्वतीय क्षेत्रों में:
- स्कूल भवन जर्जर
- शिक्षक नहीं
- सुविधाएं शून्य
इसका सीधा परिणाम यह है कि लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए गांव छोड़ रहे हैं। शिवसेना इसे राज्य की सबसे बड़ी विफलताओं में गिन रही है।
7. पलायन, बेरोजगारी और स्वरोजगार का संकट
उत्तराखंड का पहाड़:
- खेतों में फसल नहीं
- युवाओं को रोजगार नहीं
- उद्योग नहीं
- प्रशिक्षण नहीं
शिवसेना की मांग:
- एकल खिड़की औद्योगिक व्यवस्था
- स्थानीय युवाओं को उद्योग लगाने हेतु भूमि और भवन
- सूक्ष्म, लघु और कुटीर उद्योगों को विशेष पैकेज
8. धार्मिक स्थलों का विकास और रोजगार
- देवभूमि की रक्षा
- पलायन रोकने
- गोवंश संरक्षण
- शिक्षा–स्वास्थ्य सुधार
- भूमि माफिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष
को लेकर लंबी लड़ाई की तैयारी में है।
चारधाम, शक्तिपीठ, पौराणिक स्थल और पर्यटन स्थल— यदि इनका संरक्षण और वैज्ञानिक विकास किया जाए, तो:
- लाखों युवाओं को सीधा रोजगार
- पलायन पर रोक
- देवभूमि की धार्मिक पहचान मजबूत
9. समान नागरिक संहिता 2024 और लिव-इन विवाद
राज्य में लागू समान नागरिक संहिता के तहत 21 वर्ष की आयु में लिव-इन रिलेशन को अनुमति देने का निर्णय जनता के बड़े वर्ग में आक्रोश का कारण बना हुआ है। शिवसेना इसे:
- भारतीय संस्कृति के विरुद्ध
- सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ
- युवाओं के नैतिक पतन का कारण मानती है
7 दिसंबर 2025 को रुद्रपुर में होने वाली यह बैठक केवल एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति की दिशा तय करने वाली ऐतिहासिक बैठक साबित हो सकती है।
इस मुद्दे पर भी रुद्रपुर बैठक में बड़ा निर्णय संभव है।
25 साल में 7 जीवित पूर्व मुख्यमंत्री – जनता का पैसा भत्तों में खर्च
उत्तराखंड में आज 7 जीवित पूर्व मुख्यमंत्री हैं, जिन पर:
- सुरक्षा
- बंगले
- गाड़ियाँ
- स्टाफ
- पेंशन
पर करोड़ों रुपये हर साल खर्च हो रहे हैं, जबकि गांवों में अस्पताल, स्कूल और सड़कें नहीं हैं।
शिवसेना इसे राज्य के आर्थिक शोषण का प्रतीक बता रही है।
भू-माफिया, जनसांख्यिकी परिवर्तन और अपराध का बढ़ता खतरा
मैदानी क्षेत्रों में:
- पहाड़ की जमीन औने-पौने दामों में बिक रही
- उस पर अवैध कॉलोनियां बन रही
- बाहरी अपराधी, माफिया और अवैध घुसपैठ बढ़ रही
इससे:
- देवभूमि की पहचान खतरे में
- कई क्षेत्रों में हिंदू आबादी अल्पसंख्यक बनती जा रही
बालासाहेब ठाकरे और आनंद दिघे की विचारधारा पर चलेगा आंदोलन
शिवसेना नेतृत्व का स्पष्ट कहना है कि:
“उत्तराखंड को केवल हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, और जमीन से जुड़े नेतृत्व की जरूरत है। बालासाहेब ठाकरे और आनंद दिघे की कार्यशैली ही इस राज्य को बचा सकती है।”
7 दिसंबर रुद्रपुर बैठक में होंगे ये बड़े निर्णय
सूत्रों के अनुसार बैठक में:
- उत्तराखंड कार्यकारिणी का विस्तार
- कई नए पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी
- जिला व ब्लॉक स्तर पर इकाइयों का गठन
- मिशन 2027 के लिए चुनावी रणनीति
- आंदोलन कार्यक्रमों की रूपरेखा
- राजधानी, 5वीं अनुसूची, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन– इन मुद्दों पर राज्यव्यापी आंदोलन की घोषणा
हाल ही में पुरनचंद्र भट्ट की एकनाथ शिंदे से मुलाकात
हाल में पुरनचंद्र भट्ट ने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शिवसेना प्रमुख एकनाथ संभाजी शिंदे से मुलाकात की, जिसमें:
- उत्तराखंड में शिवसेना विस्तार
- संगठनात्मक सहयोग
- आने वाले चुनावों में रणनीतिक समर्थन
पर विस्तार से चर्चा हुई है।
शिवसेना की राष्ट्रीय ताकत (शिंदे गुट की स्थिति)
वर्तमान में शिंदे गुट के पास:
- लोकसभा में दर्जनभर से अधिक सांसद
- महाराष्ट्र विधानसभा में लगभग 40 से अधिक विधायक
- मुंबई, ठाणे, ठाणे ग्रामीण, पालघर, नाशिक जैसे क्षेत्रों में मजबूत जनाधार
इससे उत्तराखंड में भी संगठन को राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक संबल मिल रहा है।
रुद्रपुर बैठक बनेगी उत्तराखंड की राजनीति का टर्निंग पॉइंट
सिडकुल के श्रमिकों के शोषण उत्पीड़न उत्तराखंड कें स्थायी युवक युवतियों क़ो स्थायी रोजगार दिलाने. शुक्षम लागु उधमीयों क़ो सरकारी योजना का. लाभ दिलाने के लड़ाई लड़ेगी।
शिवसेना:
अब देखना यह है कि क्या यह आंदोलन जनता के दिल तक पहुंच पाता है, और क्या 2027 में उत्तराखंड की सियासत एक नया मोड़ लेती है।




