बुरी नज़र:भारतीय समाज में “बुरी नज़र” की अवधारणा सदियों पुरानी है। आज भी जब कोई बच्चा अचानक पढ़ाई से मन हटाने लगे, जिद्दी हो जाए, गलत संगत या नशे की ओर बढ़े, तो परिवार इसे नज़र का प्रभाव मानता है। यह विश्वास केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक अनुभवों की लंबी परंपरा जुड़ी हुई है। गाँव से लेकर शहर तक, लाखों परिवारों ने अचानक आए व्यवहारिक बदलावों को नज़र से जोड़कर देखा है और पारंपरिक उपायों से मानसिक राहत भी पाई है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
वहीं यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मनोविज्ञान स्पष्ट करता है कि भय, तनाव, नकारात्मक वातावरण और सामाजिक दबाव मानव मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जब व्यक्ति या परिवार किसी नकारात्मक स्थिति को “नज़र” से जोड़ता है, तो उसका अवचेतन मन उसी दिशा में प्रतिक्रिया देने लगता है। यही कारण है कि धार्मिक उपायों से कई बार मानसिक संतुलन लौट आता है और व्यवहार में सुधार दिखता है।
संपादकीय दृष्टि से सत्य यह है कि बुरी नज़र को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं और इसे हर समस्या का एकमात्र कारण मान लेना भी गलत है। आस्था मन को शक्ति देती है, लेकिन बच्चों के भटकाव, नशे और पढ़ाई से दूरी के मूल कारणों—जैसे सामाजिक परिवेश, मोबाइल संस्कृति और भावनात्मक उपेक्षा—पर गंभीरता से काम करना ज़रूरी है। आस्था और विज्ञान का संतुलन ही सुरक्षित भविष्य की सही राह है।
भारतीय समाज में “बुरी नज़र” की अवधारणा सदियों पुरानी है। आज भी जब कोई बच्चा अचानक पढ़ाई से मन हटाने लगे, जिद्दी हो जाए, गलत संगत या नशे की ओर बढ़े, तो परिवार इसे नज़र का प्रभाव मानता है। यह विश्वास केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे सामाजिक अनुभवों की लंबी परंपरा जुड़ी हुई है। गाँव से लेकर शहर तक, लाखों परिवारों ने अचानक आए व्यवहारिक बदलावों को नज़र से जोड़कर देखा है और पारंपरिक उपायों से मानसिक राहत भी पाई है।
वहीं यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मनोविज्ञान स्पष्ट करता है कि भय, तनाव, नकारात्मक वातावरण और सामाजिक दबाव मानव मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जब व्यक्ति या परिवार किसी नकारात्मक स्थिति को “नज़र” से जोड़ता है, तो उसका अवचेतन मन उसी दिशा में प्रतिक्रिया देने लगता है। यही कारण है कि धार्मिक उपायों से कई बार मानसिक संतुलन लौट आता है और व्यवहार में सुधार दिखता है।
मेरी व्यक्तिगत दृष्टि से सत्य यह है कि बुरी नज़र को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं और इसे हर समस्या का एकमात्र कारण मान लेना भी गलत है। आस्था मन को शक्ति देती है, लेकिन बच्चों के भटकाव, नशे और पढ़ाई से दूरी के मूल कारणों—जैसे सामाजिक परिवेश, मोबाइल संस्कृति और भावनात्मक उपेक्षा—पर गंभीरता से काम करना ज़रूरी है। आस्था और विज्ञान का संतुलन ही सुरक्षित भविष्य की सही राह है।
आज का समाज एक गंभीर और चिंताजनक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। अनेक परिवार इस पीड़ा से जूझ रहे हैं कि उनके होनहार बच्चे अचानक पढ़ाई से मन हटा लेते हैं, माँ-बाप की बात मानना छोड़ देते हैं और जिद्दी स्वभाव अपनाकर गलत रास्तों की ओर बढ़ने लगते हैं। कई मामलों में यह भटकाव नशे, गलत संगत और अपराध की दहलीज़ तक पहुँच जाता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में माता-पिता इस बदलाव को “बुरी नज़र” या नकारात्मक शक्ति का प्रभाव मानते हैं, क्योंकि परिवर्तन अक्सर अचानक और बिना किसी स्पष्ट कारण के दिखाई देता है।
धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, नकारात्मक ऊर्जा बच्चे की मानसिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है, जिससे उसका ध्यान पढ़ाई से हटने लगता है और वह गलत संकटों की ओर आकर्षित होने लगता है। वहीं दूसरी ओर मनोविज्ञान इस स्थिति को किशोरावस्था के हार्मोनल बदलावों, भावनात्मक असंतुलन, सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रभाव और अनुशासनहीन मित्र मंडली से जोड़ता है। वास्तविकता यह है कि कारण चाहे जो भी हों, परिणाम बेहद खतरनाक होते हैं—एक उभरता हुआ भविष्य धीरे-धीरे अँधेरे की ओर खिसकने लगता है।
यह स्थिति केवल किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतावनी है। यदि माता-पिता समय रहते बच्चों के व्यवहार में आए बदलावों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो छोटी-सी लापरवाही बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। संवाद की कमी, अत्यधिक कठोरता या पूर्ण उदासीनता—तीनों ही बच्चों को और अधिक भटका सकते हैं।
संपादकीय दृष्टि से स्पष्ट है कि समस्या का समाधान केवल टोटकों या धार्मिक उपायों तक सीमित नहीं होना चाहिए और न ही इसे केवल आधुनिक जीवनशैली का स्वाभाविक परिणाम मानकर छोड़ देना चाहिए। आवश्यक है कि माता-पिता बच्चों के मित्रों, दिनचर्या, ऑनलाइन गतिविधियों और मानसिक स्थिति पर सतत नज़र रखें। आवश्यकता पड़ने पर काउंसलिंग, स्कूल-स्तरीय मार्गदर्शन और आध्यात्मिक संस्कार—तीनों का संतुलित उपयोग ही भटकते बचपन को सही राह पर वापस ला सकता है। तभी समाज एक सुरक्षित और सशक्त भविष्य की ओर बढ़ पाएगा।

